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जामिया प्रोटेस्ट का चेहरा बनी लड़कियों के बारे में ये बातें आपको पता होनी चाहिए

चलिए एक छोटा सा खेल खेलते हैं. आंख बंद करके एक दफा अनार के बारे में सोचिए. आपके दिमाग में अनार का पहला चित्र उस अनार का नहीं उभरेगा जो आपने हाल ही खाया है. बल्कि उस अनार का उभरेगा जो आपने बचपन में देखा है. वर्णमाला की पोथी पर छपा हुआ. हमारा दिमाग हर चीज के साथ एक छवि या इमेज नत्थी कर लेता है. दिमाग के काम करने यह तरीका प्रोपगैंडा चलाने वालों के लिए बड़े काम का साबित हुआ.

साल 1943. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी और उसके कब्जे के यूरोप के दूसरे हिस्सों में यहूदियों का कत्ल अपने चरम पर था. जर्मनी के हर घर से या कोई न कोई या तो मोर्चे पर था या मारा जा चुका था. तीन साल लम्बे युद्ध से लोग उकता चुके थे. ऐसे में जर्मनी की सड़कों पर एक पीले-लाल रंग का पोस्टर दिखाई देने लगा. इस पर एक यहूदी शख्स की तस्वीर बनी हुई थी और जर्मन में लिखा था, ‘ये आदमी इस युद्ध का जिम्मेदार है.’ मियोंएर की कूंची से निकले इस पोस्टर ने जर्मनी में युद्ध के खिलाफ बन रहे माहौल को जादुई तौर पर ठंडा कर दिया. कागज के चंद रंगीन टुकड़ों ने साठ लाख लोगों की बेरहम हत्या को जायज ठहरा दिया. कोई सवाल नहीं पूछा गया. यह एक सबक है कि सवाल पूछे जाने चाहिए. हमारे सामने पेश हर तस्वीर से. ताकि कोई तस्वीर जज़्बातों की तस्करी न कर पाए.

हिटलर के दौर का पोस्टर जिसने युद्ध के खिलाफ कड़ी आवजों को चुप करवा दिया था.
हिटलर के दौर का पोस्टर जिसने युद्ध के खिलाफ कड़ी आवाजों को चुप करवा दिया था.

12 दिसंबर, 2019. शाम के सात बजे. सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल पास होने के 24 घंटे बाद दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से प्रदर्शनों की खबर आने लगती है. देखते ही देखते सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल होने लगती है. तस्वीर जिसमें एक हिजाब पहने हुए एक लड़की अपनी तर्जनी उठाकर नारा लगा रही है. नाम लादीदा सखालून. बगल में हिजाब पहने हुए एक और लड़की खड़ी है. मोटे फ्रेम के चश्मे में. नाम आयशा रेना. दोनों केरल की रहने वाली हैं. सबसे बायीं तरफ एक और लड़की खड़ी है. डफली लेकर. नाम चंदा यादव. बार-बार आपके दिमाग में सूडान में हुए सत्ता विरोधी प्रदर्शनों की तस्वीर उभरने लगती है. मद्धम रोशनी, हिजाब और आसमान की तरफ तनी हुई तर्जनी. दोनों तस्वीरों में आश्चर्यजनक समानता थी. तब 22 साल की इंजीनियरिंग की छात्रा अल सलाह की ऐसी ही तस्वीर खूब वायरल हुई थी.

13 दिसम्बर, 2019. जामिया में प्रदर्शन कर रहे छात्रों और पुलिस के बीच झड़प होने की खबर आती है. पचास छात्रों को पुलिस हिरासत में ले लेती है. एजेंसी ANI अपने ट्विटर अकाउंट पर इस खबर के साथ एक फोटो पोस्ट करती है. पुलिस बैरिकेड पर चढ़कर नारा लगाती दो लड़कियों की फोटो. इत्तफाकन इस तस्वीर में दिख रही दो लड़कियों का नाम आएशा रेना और लादीदा सखालून था. यहां से यह फोटो दर्जनों न्यूज़ पोर्टल पर चली जाती है.

14 दिसम्बर, 2019. आउटलुक मैगजीन की वेबसाइट पर एक खबर छपती है. ”Wanted Our Voice To Reach Miles’: Meet Jamia Millia Islamia’s Three Girls Protesting Against Citizenship Act’. यह पूरी खबर मद्धम रोशनी में ली गई आएशा और लादीदा की तस्वीर के ईर्द-गिर्द लिखी गई है. इस खबर के जरिए लोगों को पहली बार पता चलता है कि जामिया प्रदर्शन का चेहरा बनी लड़कियों का नाम क्या है. इस खबर में डाक्यूमेंट्री फोटोग्राफर शर्बेंदु डे का एक बयान भी छपता है. जिसके आधार पर इस मद्धम रोशनी में ली गई आएशा और लादीदा की तस्वीर को ‘अरब स्प्रिंग’ से जोड़ा जाता है. आउटलुक को दिए गए अपने बयान में शर्बेंदु कहते हैं-

“ख़ास तौर पर इस तस्वीर का जुड़ाव नूबियन क्वीन से है. 22 साल सूडानी छात्रा जो सत्ता विरोधी प्रदर्शन का चेहरा बन गई थी.”

आउटलुक की इस खबर में लादीदा दावा करती हैं कि इस प्रदर्शन की शुरुआत उन्होंने की थी. मैगजीन से बातचीत में वो कहती हैं,

“हमने शाम को सात बजे अपने हॉस्टल से इस प्रदर्शन की शुरुआत की थी. शुरुआत के आधे घंटे तक सिर्फ चार लोग इस प्रदर्शन में शामिल थे. लेकिन धीरे-धीरे लोगों की तादाद बढ़ने लगी.”

15 दिसम्बर, 2019. जामिया में पुलिस क्रैकडाउन होता है. पुलिस कैम्पस के भीतर घुस जाती है. लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों को पीटा जाता है. किसी भी तर्कशील आदमी के लिए लाइब्रेरी उतनी ही पवित्र जगह जितनी किसी धार्मिक आदमी के लिए मंदिर या मस्जिद है. देश का एक बड़ा हिस्सा पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ गुस्सा जाहिर करता है. देर रात सैकड़ों छात्र दिल्ली पुलिस के मुख्यालय के सामने धरने पर बैठ जाते हैं. इसी दिन पुलिस के लाठीचार्ज का एक वीडियो वायरल होता है. इस वीडियो में पुलिस एक नौजवान को घसीटकर घर से बाहर लेकर आती है. इसके बाद उस पर ताबड़तोड़ डंडे बरसाए जाते हैं. चार लड़कियां मौके पर अपने साथी को बचाते हुए नजर आती हैं. इनमें से तीन पर आउटलुक में एक दिन पहले ही खबर की जाती हैं. नाम लादीदा सखालून, आएशा रेना और चंदा यादव. जिस नौजवान को पुलिस पीट रही थी उसका नाम शाहीन अब्दुल्लाह. शाहीन अब्दुल्लाह ‘मख्तूम मीडिया’ नाम की एक वेबसाइट के लिए काम करते हैं. बाद में दी वायर को दिए इंटरव्यू में आएशा कहती हैं,

“उस दिन प्रदर्शन में जामिया के छात्रों के अलावा जामिया के आस-पास रहने वाले लोग भी शामिल थे. पुलिस ने जुलेना के आगे रास्ता बंद कर रखा था. इसलिए कुछ प्रदर्शनकारी न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के रास्ते से नेशनल हाईवे पहुंचने की कोशिश में लगे हुए थे. शाम को करीब पांच बजे पुलिस ने हम पर लाठीचार्ज कर दिया. सब लोग वहां से भागने लगे. लोगों को बहुत चोटें आई और वो जान बचाने के लिए घरों में कूद रहे थे. हमारे सामने एक लड़की के सिर से खून निकल रहा था. हमने उसकी मदद के लिए एक अनजान घर की चारदीवारी के भीतर शरण ली. पुलिस ने हमारे साथी को घसीटकर बाहर निकाला और उसे पीटने लगी.”

16 दिसंबर 2019. वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त लादीदा सखालून और आएशा रेना का इंटरव्यू करती हैं. यहां से दोनों लड़कियों के लिए नया शब्द चलन में आता है, ‘Jamia shero‘. इसके बाद दोनों लड़कियों के इंटरव्यू की झड़ी लग जाती है. वायर को दिए अपने इंटरव्यू में जब लादीदा से पूछा जाता है कि 12 तारीख से 15 तारीख के बीच वो इत्तेफाकन प्रदर्शन के केंद्र में कैसे पहुंच जाती हैं? लादीदा जवाब देती हैं कि वो जो कर रही थीं वो प्रदर्शन का हिस्सा है.

इस घटना के बाद आएश और लादीदा के पत्रकार दोस्त शाहीन अब्दुल्लाह ने अपने फेसबुक अकाउंट से एक फोटो शेयर की. इस फोटो में शाहीन अपने फटे हुए मीडिया कार्ड को दिखा रहे हैं. शाहीन का दावा था कि उन्होंने पुलिस वालों को बताया कि वो मीडिया से हैं इसके बावजूद उन्हें पीटा गया. वायर को दिए इंटरव्यू में जब लादीदा से पूछा गया कि इस वायरल वीडियो को कौन फिल्मा रहा है? लादीदा का जवाब था कि वहां बहुत से मीडिया वाले थे जो इसे फिल्मा रहे थे. वो यह तक कहती हैं कि अगर मीडिया वाले नहीं होते तो हो सकता था पुलिस उन्हें वहां मार डालती. वीडियो में भी कैमरे साफ़ देखे जा सकते हैं. ऐसे में शाहीन का दावा थोड़ा संदेह पैदा करता है. अगर मौके के मौजूद दूसरे मीडिया पर्सन्स के साथ मार-पीट नहीं हुई तो शाहीन के साथ बर्बरता क्यों? वायरल वीडियो देखने के बाद यह पहला सवाल है जो दिमाग में खटकता है? यह आपको लाजवाब सवालों के एक सिलसिले की तरफ ले जाता है.

भाग-2

मेरे वकील ने इंटरव्यू देने से मना किया है

20 दिसंबर, 2019. जामिया में हुई पुलिस कार्रवाई के बाद पहला जुम्मा. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बाहर हजारों प्रदर्शनकारी जुटे हुए हैं. सुखदेव विहार मेट्रो स्टेशन से जामिया की तरफ बढ़ते हुए किस्म-किस्म के पोस्टर के बीच एक पोस्टर आपका ध्यान खींचता है. मोटे चश्मे वाली एक छात्रा का कैरीकचर जिसमें वो भारत के नक़्शे को पुलिस की लाठी से बचा रही है. वहां से करीब सौ मीटर दूर जामिया के गेट नंबर सात पर कैरीकचर वाली छात्रा खुद खड़ी है. तोतिया हरे रंग का हिजाब और नीले रंग का जैकेट पहने. नाम आएशा रेना. प्रदर्शन अपने शबाब पर है. हबीब जालिब की नज्म गाई जा रही है. शाम पांच बजे प्रदर्शन खत्म होता है.

काफी मशक्कत के बाद शाम के 7 बजे हमें मिलने का समय मिलता है. जामिया एल्मुनाई असोसिएशन की इमारत प्रदर्शनकारियों के अम्ब्रेला संगठन ‘जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी’ का फौरी दफ्तर बनी हुई है. इस दफ्तर की सफ़ेद बायीं दीवार पर बारिश कुछ काली रेखाएं छोड़ गई है. काफी समझाइश के बाद आएशा रेना हमें इंटरव्यू देने के लिए तैयार होती हैं. लेकिन एक शर्त पर. वो अपने पुराने फेसबुक पोस्ट पर कुछ नहीं बोलेंगी. हम उन्हें किसी शांत जगह पर इंटरव्यू देने के लिए कहते हैं. जामिया एल्मुनाई असोसिएशन का दफ्तर खचाखच भरा हुआ है. वो असमर्थता जताती हैं. फिर वो कहती हैं कि इंटरव्यू इस दीवार के किनारे लिया जा सकता है. वहां सफ़ेद बैकग्राउंड भी है. हम पूछते हैं कि क्या वो इतनी भीड़ के सामने हमसे बात कर पाएंगी. वो हां में जवाब देती हैं. हम अपने कैमरे तैयार करते हैं. आएशा हमसे पांच मिनट का वक़्त मांगती हैं. वॉशरूम जाने के लिए. पांच मिनट बाद वो लौटती हैं. कहती हैं कि उन्होंने अभी-अभी अपनी लीगल टीम से बात की है. उन्होंने इंटरव्यू न देने की सलाह दी है. हम अपने सवालों के साथ लौट आते हैं.

दोनों लड़कियों में हिजाब के अलावा एक और चीज एक जैसी है. दोनों सुदूर दक्षिणी राज्य केरल से आती हैं. वो मल्लापुरम जिले के कस्बे कोंडोट्टी की रहने वाली हैं. दिल्ली आने से पहले उन्होंने मल्लापुरम के फारुख कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में BA की पढ़ाई की थी. केरल में रहने के दौरान वो Yes इंडिया नाम के एक गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई थीं. यह एक सुन्नी NGO है जोकि शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है.
आएशा फिलहाल जामिया से इतिहास में MA कर रही हैं. पिछले साल उन्होंने अफज़ल रहमान से शादी की है. अफज़ल पेशे से पत्रकार हैं और आउटलुक में लिखते रहे हैं. उनकी फेसबुक प्रोफाइल के मुताबिक, फिलहाल वो India Tomorrow English नाम की एक वेबसाइट के लिए काम करते हैं.

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आएशा रेना हमें बताती हैं की उन्होंने इस दौर में इतने इंटरव्यू दिए हैं कि अब उन्हें कैमरे से डर नहीं लगता.

जामिया प्रदर्शन का चेहरा बनने के बाद आएशा और उनके पति के कई फेसबुक पोस्ट सोशल मीडिया पर तैरने लगे हैं. एक पोस्ट में आएशा याकूब मेनन को हुई फांसी की सजा के खिलाफ लिखती हैं कि वो एक गुड़िया की तरह केवल अफ़सोस जता सकती हैं.

इसी तरह उनके पति 12 जनवरी, 2018 को पोस्ट करते हैं कि याकूब मेनन और अजफल गुरु को याद करना उनका फ़र्ज़ बन गया है.

आएशा के अलावा इस प्रदर्शन का चेहरा बनी लादीदा सखालून भी केरल के कन्नूर की रहने वाली हैं. उनकी मां एक मदरसा टीचर हैं. लादीदा की पढ़ाई दीन-उल-इस्लाम सभा स्कूल से हुई है. वो फिलहाल जामिया मिल्लिया इस्लामिया से BA (अरबी) पढ़ रही हैं. जामिया आने से पहले उन्होंने कन्नूर के सर सैय्यद कॉलेज से अर्थशास्त्र में BA किया था. The News Minute को दिए इंटरव्यू में लादीदा बताती है कि उनके पति SIO (Students Islamic Organisation of India) के मेंबर हैं. अमरीकी शोध एजेंसी Wilson Center द्वारा Stephen Tankel की प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि SIO से पहले Students Islamic Movement of India (SIMI) जमात का छात्र संगठन था. लेकिन यासिर अराफात के भारत दौरे और ईरानी क्रांति के बारे में सिमी नेताओं और जमात के लीडरान के बीच असहमति थी. ऐसे में जमात ने सिमी से किनारा कर लिया और नया छात्र संगठन SIO खड़ा किया.

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याकूब मेनन की फांसी पर गम जताती आएशा रेना की फेसबुक पोस्ट.

आगे बढ़ें तो 2017 में लादीदा ने मल्लापुरम में आयोजित एक सेमिनार में एक पेपर प्रजेंट किया था जिसका विषय था, “Conversion: Religion in controversies and limits of liberal discourses”.

जामिया आंदोलन का चेहरा बनने के बाद उनकी कई फेसबुक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. इन पोस्ट्स में उनके दकियानूसी विचार देखने को मिलते हैं. जामिया आंदोलन शुरू होने के एक दिन बाद वो Chekh oov नाम की एक फेसबुक प्रोफाइल की पोस्ट शेयर करती हैं. इस पोस्ट में ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे पर खड़े हुए सवाल का जवाब देते हुए लिखा गया है,

“कल के प्रदर्शन के दौरान कुछ लिबरल्स ने हमें ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘इंशा अल्लाह’ के नारे से दूर रहने के लिए कहा. हमने सिर्फ सर्वशक्तिमान अल्लाह के सामने समर्पण किया है. हम तुम्हारे सेकुलर नारों को कब का छोड़ चुके हैं. ये नारे उंची आवाज में बार-बार लगाए जाएंगे. ये नारे हमारी आत्मा हैं, हमारा ख्वाब हैं, हमारा अस्तित्व हैं. आपको अपनी सेकुलर वफ़ादारी साबित करने की जल्दी होगी लेकिन हमें नहीं है. हम हैं और हम हर जगह मेलकॉम एक्स, अली मुसलियार और वरियमकुन्नत के बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों की तरह रहेंगे. ये नारे हमारी आत्मा हैं. और हमारी सियासत की कल्पना हमने अपने पुरखों से ली है.

तुम लोगों के लिए यह महज नारे हो सकते हैं. लेकिन हमारे लिए ये वो नारे हैं जो हमें मुक्ति देते हैं. इस नुक्ते पर हमारी नजर एकदम साफ़ है. तुम्हारे सेकुलर नारों का भार हमारे ऊपर नहीं है. हम तुम्हारे सेकुलर व्याकरण में फिट न बैठते हों. हमारा नजरिया और तुम्हारे नजरिए में बुनियादी अंतर है. तो कृपा करके हमें निर्देश देना बंद करो.”

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लादीदा की वो फेसबुक पोस्ट जिसकी वजह से उन्हें सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ रही है.

14 दिसम्बर को लादीदा अपनी फेसबुक वॉल पर लिखती हैं, “ला इलाहा इलल्लाह, मोहम्मदु रासुल्लाह. ये हमारा नारा है. यह हमारा नारा रहेगा.”

22 सितम्बर, 2017 की एक पोस्ट में लादीदा हिजाब के पक्ष में एक तस्वीर लगाती हैं. इस तस्वीर में हिजाब पहनी हुई औरतों को प्रदर्शन करते हुए दिखाया गया था. इस तस्वीर के कैप्शन में लिखा है, ‘हिजाब की ताकत को कम करके मत आंको,’

18 दिसम्बर को आएशा और लादीदा के पत्रकार दोस्त शाहीन अब्दुल्लाह ने अपने फेसबुक वाल से एक वीडियो शेयर किया. इस वीडियो में लादीदा के अलावा अख्तरीस्ता अंसारी भी दिखाई दे रही हैं. इस वीडियो में अख्तरी कहती हैं कि क्योंकि यह मुसलमानों की पहचान पर हमला है इसलिए हम लोग इंशा अल्लाह और दूसरे इस्लामिक नारे लगाएंगे. और आपको कोई हक नहीं हैं कि आप हमें आतंकवादी कहें. वीडियो के अंत में लादीदा विक्ट्री साइन बनाते हुए कहती हैं कि अख्तरी ने सब कह दिया. जब हमने अख्तरी की फेसबुक प्रोफाइल खंगाली तो पाया कि वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (ML-लिब्रेशन) के छात्र संगठन AISA से जुड़ी हुई हैं. इस वीडियो को आप यहां क्लिक करके देख सकते हैं.

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हिजाब की ताकत को कम करके मत आंको. लादीदा का यह पोस्ट भी सोशल मीडिया पर घूम रहा है.

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भाग: तीन

ये इत्तेफाक की बात है

‘कोई हीरो नहीं है. कोई हीरो नहीं होता. ये हालात होते हैं जो किसी शख्स को हीरो बनाते हैं.’ क्यूबन क्रांतिकारी चे ग्वारा की मोटरसाइकिल डायरीज में दर्ज यह लाइन बाद में हजारों बार लिखी गई. पोस्टरों पर, दीवारों पर और अब टी-शर्ट्स पर. तो क्या लादीदा और आएशा भी हालातों की पैदाइश थीं. या फिर उन्होंने एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन में मौजूद लीडरशिप के निर्वात को सिलसिलेवार तरीके से भरने में कामयाबी हासिल की? इस सवाल के जवाब में कई सिरे पकड़ में आते हैं.

आएशा और लादीदा पर पहली मीडिया रिपोर्ट उस संस्थान से होती है जहां आएशा के पति लिखते रहे हैं. 12 तारीख को जो पहली तस्वीर वायरल होती है उसमें कुल तीन लड़कियां दिखाई दे रहीं हैं. तीसरी लड़की चंदा यादव का नाम धीरे-धीरे सतह से मिट जाता है. 15 तारीख को वायरल हुए वीडियो में कुल चार लड़कियां दिखाई दे रही हैं. लेकिन खबरों के केंद्र में आती हैं महज दो. बरखा दत्त इन दो लड़कियों का इंटरव्यू लेती हैं. इसके बाद तो लगभग हर मीडिया प्लेटफॉर्म पर वो दिखाई देने लगाती हैं. 16 दिसम्बर की शाम तक दोनों लड़कियां राष्ट्रीय सेलिब्रिटी बन जाती हैं.

थोड़ा और पीछे जाते हैं. 14 अक्टूबर, 2019 में जामिया में एक और प्रदर्शन हुआ था. प्रदर्शन की वजह बना आर्किटेक्चर विभाग द्वारा आयोजित ‘ग्लोबल हेल्थ ज़ेनिथ: कॉन्फ्लूएंस 19′ कार्यक्रम. छात्रों का आरोप था कि इजराइल को इस कार्यक्रम का कंट्री पार्टनर बनाया गया था. बतौर यूनिवर्सिटी जामिया फिलिस्तीन समर्थक है. छात्र इस कार्यक्रम के खिलाफ धरने पर बैठ गए. इसके बाद यूनिवर्सिटी ने पांच छात्रों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया था. इससे छात्रों का गुस्सा और भड़क गया और उन्होंने वीसी दफ्तर के सामने धरना देना शुरू कर दिया. छात्रों का आरोप है कि 22 अक्टूबर की शाम वीसी के इशारे पर कुछ गुंडों ने उनके साथ मारपीट किया.

इस प्रदर्शन के बाद एक लड़की गुंडों के खिलाफ जामिया की इंटरनल कम्प्लेन कमिटी (ICC) में सेक्सुअल हरासमेंट की शिकायत दर्ज करवाती है. ICC को लड़की की शिकायत में कई सारी खामियां नजर आती हैं. नतीजतन ICC उनसे नए सिरे से शिकायत लिखने के लिए कहती है. नवम्बर के दूसरे सप्ताह में दो लड़कियां कैम्पस में ICC के खिलाफ आन्दोलन छेड़ देती हैं. शिकायतकर्ता लड़की का नाम, लादीदा सखालून. और इस आन्दोलन में उसकी साथी आएशा रेना.

17 दिसंबर की सुबह दोनों के फेसबुक पोस्ट वायरल होने लगते हैं. 17 दिसम्बर की शाम 8 बजकर 9 मिनट पर ट्विटर पर एक नया हैंडल दिखाई देता है. हैंडल का नाम @ayeshaRenna. इस अकाउंट से पहला ट्वीट होता है-

“संघ परिवार आईटी सेल की तरफ मेरे खिलाफ नफरत फैलाने की संगठित कोशिशों के चलते मेरा फेसबुक अकाउंट कई दफा रिपोर्ट हो चुका है. इसकी वजह से मैं अब वहां पोस्ट नहीं कर पाउंगी. आप मुझसे यहां पर जुड़े रह सकते हैं.”

इसके साथ एक फोटो भी सबूत के तौर पर शेयर की गई. इसके करीब साढ़े चार घंटे बाद twitter पर एक और हैंडल दिखाई देता है. इस हैंडल का नाम @ladeedafarzana. लादीदा भी इसी किस्म की जानकारी देती हैं. हो सकता है कि दोनों के खिलाफ चल रहे हेट कैम्पेन के बाद फेसबुक ने दोनों के अकाउंट सस्पेंड कर दिए हों. लेकिन अंदेशा तब पैदा होता है जब उनके कई करीबियों के फेसबुक अकाउंट एक साथ बंद हो जाते हैं. सबसे पहले chekh Oov नाम का अकाउंट. जिसका पोस्ट शेयर करके लादीदा विवादों में आई. 17 तारीख को ही आएशा के पति अफजल रहमान का फेसबुक अकाउंट डीएक्टिवेट हो जाता है. लेकिन वो कुछ दिन बाद फिर से चालू हो जाता. अकाउंट चेक करने से समझ में आता है कि अकाउंट की काफी सफाई हुई है. इस सारी कवायद में अपने इतिहास पर सफेदी पोतने की बू आती है.

16 दिसंबर 2019. जामिया की वाइस चांसलर नजमा अख्तर प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए साफ़ करती हैं कि 15 दिसम्बर को हुए पुलिस लाठीचार्ज में किसी छात्र की जान नहीं गई है. 15 दिसम्बर की रात सोशल मीडिया पर अफवाह फैली थी की जामिया के दो छात्रों की पुलिस की गोली लगने की वजह से मौत हुई है. मलयालम भाषा के न्यूज़ चैनल जनम टीवी ने खुलासा किया की आएशा के पति अफज़ल रहमान ने पत्रकारों के वॉट्सऐप ग्रुप में दो छात्रों के पुलिस फायरिंग में मारे जाने की खबर भेजी थी.

फ़िलहाल आएशा और लादीदा जामिया प्रोटेस्ट की हीरो बन चुकी हैं. देश भर से उनके पास जनसभाओं को संबोधित करने के न्यौते आ रहे हैं. देश-विदेश की मीडिया में उनकी छवि लड़ाका मुस्लिम लड़कियों की है. लेकिन क्या वो देश के सेकुलर संविधान में भरोसा रखती हैं जिसे बचाने की कसमें वो हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी के मंच से खा रही थीं? इस सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है.


विडियोः CAA, NRC के खिलाफ प्रोटेस्ट में दिल्ली पुलिस से पिटने वाली जामिया स्टूडेंट्स ने क्या कहा?

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