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शादी के बाद जहां जाते हैं 'जलूल-जलूल', कहां से आया वो हनीमून?

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‘सुहागरात है. घुंघट उठा रहा हूं मैं.’ यही प्रोसेस जब कुछ दिनों तक चलती है. तो दूर से इमेजिनेशन की आंखों से कसमसाती दुनिया कहती है, ‘हनीमून पर गए हैं फलाने की बेटा-बहू.’ फर्क सिर्फ इत्ता कि अब हनीमून के दौरान अब घूंघट का कॉन्सेप्ट खत्म सा हो गया है. एडवेंचर और वेस्टर्न नाम की ‘चिड़िया’ ने लिबास को आज के जमाने का कर दिया है. पर एहसास, उत्साह और भाव सुहागरात वाला ही समझिए. लेकिन क्या आप जानते हैं कि शादी के बाद पति-पत्नी के कुछ दिन साथ बिताने को हनीमून क्यों कहा जाता है? आइए हम आपको बताते हैं कि कब और कहां से प्यार की सेज पर सजा हनीमून शब्द…

हनीमन शब्द पुरानी अंग्रेजी के hony-moone से बना है. हनी मतलब शहद और मून यानी चांद. हनीमून शब्द सबसे पहले साल 1546 में सुनाई पड़ा. लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि ये हनीमून मनाना शुरू ही 1546 के हुआ है. न जी, बिलकुल न. जब से दो लोग वाया शादी एक दूसरे के हो रहे हैं, तब से हनीमून भी मनाया जा रहा है.

वाइन की शहद और घटता-बढ़ता चांद
किस्से तो कुछ यूं हैं कि पहले लौंडे अपनी पसंद की लड़की जबरन चुन लेते थे. फिर दोस्तों की मदद से भगाकर कहीं छिप जाते थे. कंबल डालकर किडनैपिंग करते थे. इस टर्म को अंग्रेजी जुबां में कहते थे, swept off her feet. दुल्हन को तब तक छिपाकर रखते थे जब तक घरवाले उसकी छानबीन बंद न कर दें.

वक्त की चाल उस दौर में चांद घटने बढ़ने के हिसाब से नापी जाती थी. छिपे रहने के दौरान जबरन बन चुकी जोड़ी एक ड्रिंक पीते थे. मीड. यानी शहद, पानी और कुछ मसालों के साथ बनाई जाती थी वाइन. धारणा ये थी कि इस वाइन टाइप मीड को पीने से होगा शर्तिया लड़का. उस दौर में घर वाले ज्यादा दिनों तक तलाशी अभियान नहीं चलाते थे. ज्यादा से ज्यादा एक महीने. एक महीने तक शहद से बनी वाइन और वक्त पूर्णिमा-अमावस्या से तय होने की वजह से चांद. इन दोनों ने मिलकर हनीमून शब्द को जन्म दिया.

तो क्या कवि की कल्पना है हनीमून?
पहले के वक्त में आज की तरह एचआर पॉलिसी तो होती नहीं थी कि शादी के लिए सिर्फ 15 दिन की छुट्टी मिलें. तब तो आदमी छुट्टा रहता था. तो फुल इनजॉयमेंट का जुगाड़ रहता था. इसलिए उस वक्त शादी बाद कोई भी मैरिड कपल एक महीने तक हनीमून मनाता था. पर गुरू, पीते थे वही शहद वाली वाइन.

अब यहां से शुरू होता है सिंबोलिज्म का कॉन्सेप्ट और कवि की कल्पना. ‘चांद घटता है. बढ़ता है कुछ-कुछ जिंदगी की तरह. हम चमकेंगे इस चांद की तरह. पूर्णिया से पूर्णिमा तक.’ इस टाइप की बात करते हुए पूर्णिमा से पूर्णिमा तक ‘कुची पुची जानू बाबू’ चलता था शहद वाली वाइन पीते हुए. तो ये कहलाया हनीमून.

शादी में जलूल-जलूल क्यों नहीं आए?
ब्रिटेन में आज से सालों पहले शादी के बाद जोड़ियां घूमने जाती थीं. ये कहलाता था ब्राइडेल टूर. लेकिन ये टूर आज की तरह ‘इकले-इकले’ यानी सिर्फ दो लोगों के बीच नहीं होता था. पूरा परिवार, दोस्त लोड होकर जाते थे हनीमून पर. मकसद खुशी के चार पल अकेले में साथ बिताना नहीं, रिश्तेदारों के घर जाना होता था. यानी जो रिश्तेदार शादी में शरीक नहीं होते थे, उनके घर जाकर ‘मुलाकात, शुभकामनाएं लेना’ जैसी औपचारिकता पूरी करना. धीरे-धीरे ये कॉन्सेप्ट पूरे यूरोप में फैल गया.

जब पहली बार लिखा गया हनीमून?
1552 में एक किताब आई Abecedarium Anglico Latinum. राइटर थे रिचर्ड ह्यूलेट. रिचर्ड ने हनीमून की परिभाषा बताते हुए लिखा, ‘शादी बाद जोड़ियों को ‘हनी मोन’ कहा जाता था. शादी के फौरन बाद दोनों बहुत ज्यादा प्यार रहता था. फिर वक्त बीतने के साथ प्यार घटता चला जाता था.’ साहित्य में ‘हनी मोन’ शब्द का इस्तेमाल पहली बार रिचर्ड ने किया. वक्त बीतने के साथ हनीमून को कई भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाने लगा. और हनीमून शादी करने वाली जोड़ियों के दिल-दिमाग में बस गया.

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