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1 रुपए में कुलभूषण जाधव का केस लड़ने वाले वकील हरीश साल्वे की कुंडली

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पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव पर अंतरराष्ट्रीय अदालत (ICJ) का फैसला आ गया है. फैसले भारत के पक्ष में है. माने जाधव की फांसी पर रोक लगा दी गई है. कोर्ट ने जाधव को वकील देने का भी फैसला दिया है. जाधव का मामला कोर्ट में उठाया था वकील हरीश साल्वे ने. पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बताया था कि जाधव केस में साल्वे ने बतौर फीस सिर्फ एक रुपया लिया.

लेकिन ये हरीश साल्वे हैं कौन! एक शख्स, जिस पर भारत सरकार ने अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी से ज्यादा भरोसा जताया. एक शख्स, जो एक दिन में लाखों और एक केस में करोड़ों की फीस लेता है. एक शख्स, जिसने अपना करियर चार्टर्ड अकाउंटेंट से शुरू किया, लेकिन आज दुनिया के बेहतरीन वकीलों में शुमार है. आइए, जानते हैं हरीश साल्वे को.

कौन हैं साल्वे

जून 1955 में मुंबई में पैदा हुए साल्वे नवंबर 1999 से नवंबर 2002 तक देश के सॉलिसिटर जनरल रहे. अटॉर्नी जनरल के बाद ये दूसरा बड़ा पद होता है. संवैधानिक, कमर्शियल और टैक्स वाले कानूनों के एक्सपर्ट साल्वे देश की कई हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और अंतरराष्ट्रीय अदालतों में भारत को रिप्रजेंट कर चुके हैं. कभी वह कानूनी सलाहकार की भूमिका में होते हैं, तो कभी अड्जूडिकेटर यानी सरकार की कानूनी मदद करने (Adjudicator) के रोल में. हरीश ने कॉमर्स और लॉ, दोनों से ग्रेजुएशन किया था. पहले CA बने, फिर कानून के पेशे में आ गए. साल्वे की ट्रेनिंग देश की दो बड़ी लीगल पर्सनैलिटी नानाभाई पालकीवाला और सोली सोराबजी के अंडर हुई.

हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाधव के मामले की सुनवाई के दौरान साल्वे
हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाधव के मामले की सुनवाई के दौरान साल्वे

कहां से शुरू हुआ करियर कहां तक पहुंचा

साल्वे ने अपना लीगल करियर 1980 में शुरू किया था. तब वह जेबी दादाचंदाजी ऐंड कंपनी में इंटर्न थे और बाद में फुल-टाइम वकील हो गए. इस दौरान मिनर्वा मिल्स वाले केस में उन्होंने नानाभाई पालकीवाला को असिस्ट किया था. मिनर्वा मिल्स लिमिटेड वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंडमार्क फैसला सुनाया था, जिसने भारतीय संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ को लागू और विकसित करने में मदद की. ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ संविधान का वह सिद्धांत है, जिसे बदला या खत्म नहीं किया जा सकता और संविधान को संसद से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है.

harish

इसके बाद साल्वे दिल्ली हाई कोर्ट में सीनियर काउंसल हो गए. वह पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी (1980-1986) के साथ भी काम कर चुके हैं. 2002 में सॉलिसिटर जनरल का तीन साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद जब साल्वे को दोबारा नॉमिनेट किया गया, तो व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने इनकार कर दिया. कहा कि काम को घर पर ले जाना उनकी पत्नी को बिल्कुल पसंद नहीं. साल्वे की वजह से उनकी पत्नी को भी लगातार खबरें देखनी पड़ती थीं और वह इससे ऊब गई थीं.

पर्यावरण से जुड़े कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपने पाले में रखा. हालांकि, 2011 में अवैध खनन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के समय उन्होंने खुद को इस पोजीशन से यह कहते हुए अलग कर लिया कि पिछली सुनवाइयों में दूसरी पक्षों की तरफ से आए थे. लंदन में अपना बेस बनाने वाले साल्वे को 2013 में ‘इंग्लिश बार’ में शामिल किया गया, जिसके बाद उन्होंने ‘ब्लैकस्टोन चेंबर्स’ जॉइन किया. ब्लैकस्टोन चेंबर्स लंदन में बड़े वकीलों के चेंबर्स का एक सेट है, जो 1950 में स्थापित किया गया था.

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दुनिया के 10 सबसे महंगे वकीलों में से एक

न्यूज मैगजीन इंडिया टुडे ने हरीश साल्वे को 2017 के 50 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में 43वें नंबर पर जगह दी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनकी एक दिन की फीस 30 लाख रुपए है. केस खत्म होने तक उनका बिल करोड़ों में पहुंच जाता है. देश के महंगे वकील होने के साथ-साथ वह दुनिया के टॉप-10 सबसे महंगे वकीलों में शुमार हैं. तमिलनाडु और केंद्र सरकार के फॉरेस्ट वाले मामले में तो इनकी फीस 60 करोड़ तक बताई जाती है. अदालत में वह आक्रामक और एकतरफा दलील पेश करने के बजाय संतुलित दलील रखते हैं.

कौन-कौन रहा है साल्वे का क्लाइंट

अपने अनुभव और कौशल के बूते इन्होंने रतन टाटा, सलमान खान, मुकेश अंबानी, ललित मोदी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, कैप्टन अमरिंदर सिंह, प्रकाश सिंह बादल, केशब महिंद्रा, वोडाफोन इंडिया और दिल्ली पुलिस के केस लड़ चुके हैं. टाटा और अंबानी के लिए तो साल्वे पहली पसंद बताए जाते हैं.

रतन टाटा के साथ हरीश साल्वे
रतन टाटा के साथ हरीश साल्वे

# रतन टाटा और सायरस मिस्त्री के विवाद में वह टाटा की तरफ थे.

# केंद्र सरकार ने जब न्यूज चैनल NDTVइंडिया पर एक दिन का बैन लगाया था, तो साल्वे चैनल की तरफ से कोर्ट में थे.

# दवाई बनाने वाली कंपनियों डाइची और रेनबैक्सी के विवाद में वह रेनबैक्सी के वकील थे.

# प्रशांत भूषण जब रिलायंस जियो इन्फोकॉम के खिलाफ कोर्ट पहुंचे थे, तो मुकेश अंबानी ने हरीश को वकील बनाया था.

# परमाणु निरस्त्रीकरण मामले में जब मार्शल आइलैंड ने भारत पर मुकदमा चलाया था, तो संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कोर्ट में भारत को जीत दिलाने वाली टीम में साल्वे भी शामिल थे.

# नीरा राडिया टेप वाले मामले में टाटा ने साल्वे पर भरोसा जताया.

# दिल्ली पुलिस ने जब रामलीला मैदान से बाबा रामदेव को उठाया था, तो साल्वे दिल्ली पुलिस की तरफ से कोर्ट में थे.

हिट ऐंड रन केस में सलमान के वकील हरीश साल्वे ही थे
हिट ऐंड रन केस में सलमान के वकील हरीश साल्वे ही थे

मुकेश और अनिल के विवाद में वकील से कहीं ज्यादा की भूमिका

हरीश हमेशा से इतने महंगे वकील नहीं रहे हैं. अनिल अंबानी के खिलाफ मुकेश अंबानी का केस लड़ने और जीतने के बाद उनकी फीस आसमान छूने लगी. नेचुरल गैस के इस विवाद में अनिल की तरफ से राम जेठमलानी लड़ रहे थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक अंबानी वाले मामले में साल्वे ने 15 करोड़ की फीस ली थी. केस के दौरान मीडिया में अनिल और मुकेश की दुश्मनी पर खूब लिखा-पढ़ा गया. इसमें बहुत कुछ गलत भी था, लेकिन दोनों भाइयों की खासी किरकिरी हो चुकी थी. ऐसे में केस जीतने के बाद नीता अंबानी ने मीडिया में बयान देने के लिए हरीश साल्वे से ही कहा था.

हरीश बताते हैं, ‘फैसले के बाद मुकेश कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे. नीता ने मुझे कहा कि एक और गुजारिश है. मीडिया को मुझे हैंडल करना चाहिए. उन्होंने कहा था कि हरीश भाई बहुत नेगेटिविटी हो गया. अब कुछ उल्टा-सीधा नहीं बोला जाना चाहिए.’

अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ मकेश और नीता अंबानी से मिलते हरीश
अपनी पत्नी मीनाक्षी के साथ मुकेश और नीता अंबानी से मिलते हरीश

शौक बड़ी चीज है

हरीश म्यूजिक के शौकीन हैं. पियानो बजाना पसंद करते हैं. हेग में जाधव मामले की सुनवाई के बाद वह ट्रेडमिल पर दौड़ते हुए इंडिया टुडे से बात कर रहे थे. शॉपिंग के शौकीन हैं और कपड़ों के लिए अक्सर लंदन आते-जाते रहते हैं. बताया जाता है कि भाई अनिल से केस लड़ते समय मुकेश ने इनके लिए कपड़ों की पूरी वॉर्डरोब ही खरीद ली थी. इनके क्लाइंट्स इनका मूड अच्छा रखने के लिए महंगे फोन, घड़ी और पेन गिफ्ट करते हैं.

नाम होगा, तो बदनामी भी होगी

साल्वे गुजरात दंगों के केस में भी थे. ‘तहलका’ ने साल्वे पर आरोप लगाया था कि एक तरफ वह दंगा-पीड़ितों के लिए लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरकार के साथ बिजनेस डील कर रहे हैं. इस मामले में आशीष खेतान के पास ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट’ के सबूत भी थे. इस पर साल्वे ने कहा था, ‘मैं नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के बुरे कामों के खिलाफ केस लड़ रहा हूं, गुजरात के खिलाफ नहीं. अगर कोई प्रॉजेक्ट गुजरात के लिए सही है, तो मैं इसे गुजरात की तरफ मोड़ दूंगा. अगर आप दिखा दें कि इन डील्स से मैंने एक भी रुपया लिया हो, तो मैं अपना पेशा छोड़कर चला जाऊंगा.’

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याकूब मेमन के लिए खड़े हुए थे साल्वे

सुप्रीम कोर्ट से याकूब मेमन को फांसी देने और फिर अपील पर माफ न किए जाने पर साल्वे ने कहा था, ‘मैं याकूब और उसे भाई के लिए 2007 में पेश हुआ था, जो शुरुआत में स्कित्जोफ्रेनिया (Schizophrenia मानसिक बीमारी है, जिसका मरीज असली और काल्पनिक चीजों में फर्क नहीं कर पाता) से पीड़ित थे. उन्हें टाडा कोर्ट में सजा दी गई थी, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी. मेरे हिसाब से उसके पास रिहा होने के लिए अच्छा केस था. मौत का सजा रोके रखने पर अभी मैं सुप्रीम कोर्ट से अलग राय रखता हूं.’ एक अमेरिकी ज्यूरिस्ट के हवाला से साल्वे ने कहा था, ‘The Supreme Court is final not because it is right, but it is right because it is final.’

क्रिकेट विश्व कप को भारतीय उपमहाद्वीप लाए थे इनके पिता

 हरीश के पिता नरेंद्र कुमार साल्वे (एनकेपी साल्वे) पूर्व कांग्रेसी सांसद और क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेटर थे, जिनका अप्रैल 2012 में निधन हो गया था. 1967 से 1977 मध्य प्रदेश की बैतूल लोकसभा सीट से सांसद रहने वाले एनकेपी 1978 से 2002 तक लगातार चार पर राज्यसभा सांसद रहे. इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1982 में केंद्रीय राज्यमंत्री बनाए जाने के बाद उन्होंने अकाउंटेंसी छोड़ दी थी और अगले दो प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में भी मंत्री रहे. इस दौरान वह सूचना-प्रसारण, स्टील-खदान और संसदीय कार्य मंत्री रहे.

एनकेपी साल्वे
एनकेपी साल्वे

1987 का वर्ल्ड कप भारत और पाकिस्तान ने एक साथ होस्ट किया था और ये पहली बार था, जब क्रिकेट वर्ल्ड कप भारतीय उपमहाद्वीप में हो रहा था. इसका क्रेडिट एनकेपी को ही जाता है. शुरुआती दिनों में नागपुर में क्लब क्रिकेट खेलने वाले एनकेपी विदर्भ क्रिकेट असोसिएशन के अध्यक्ष (1972-1980) रहे और 1982 से 1985 तक BCCI प्रेसिडेंट रहे. उनका नाम प्रणब मुखर्जी ने प्रमोट किया था. भारत ने 1983 में अपना पहला क्रिकेट वर्ल्ड कप इन्हीं की अध्यक्षता में जीता था. 1983 में ये एशियन क्रिकेट काउंसिल के पहले इलेक्टेड चेयरमैन बने. BCCI ने 1995 में इनके सम्मान में एनकेपी चैलेंजर ट्रॉफी शुरू की, जिसे चैलेंजर ट्रॉफी के नाम से जाना जाता है.


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