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जो कर्नाटक में हुआ है, ठीक वैसा बिहार में 18 साल पहले हुआ था

चुनाव हुए.
त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी.
गवर्नर ने एक नेता को सीएम पद की शपथ दिलाई.
नेता बहुमत नहीं जुटा पाया.
हफ्ते भर में इस्तीफा हो गया.

ये कहानी सुनकर आपके ज़ेहन में कर्नाटक, वजुभाई वाला और येदियुरप्पा जैसे शब्द आ रहे होंगे. आने भी चाहिए. कर्नाटक में जो हुआ है, वो कुछ दिन तो याद रहेगा ही. लेकिन डिट्टो यही कहानी आज से 18 साल पहले भी घटी थी. बस पात्र दूसरे थे और लोकेशन थी बिहार. मज़े की बात ये है कि तब भी केंद्र में एनडीए की ही सरकार थी.

इस कहानी के पात्र हैं राबड़ी देवी (पढ़ें लालू प्रसाद यादव), नीतीश कुमार, केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी और बिहार के गवर्नर वीसी पांडे. कहानी का पूरा मज़ा आए, इसलिए ये ज़रूरी है कि हम ये जानें कि इन पात्रों के बीच ट्यूनिंग कैसी थी. और इस ट्यूनिंग को समझने के लिए आपको एक छोटू सी कहानी और सुननी पड़ेगी.

क्रमशः लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान. जयप्रकाश नारायण के वक्त बिहार में चले आंदोलन में हिस्सा लेने का सबसे ज़्यादा फायदा लालू को मिला. (फोटोःट्विटर)
क्रमशः लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान. जयप्रकाश नारायण के वक्त बिहार में चले आंदोलन में हिस्सा लेने का सबसे ज़्यादा फायदा लालू को मिला. (फोटोः ट्विटर)

छोटू वाली कहानी-

एक था जंगल. माने था वो हिंदुस्तान का एक राज्य ही. लेकिन वहां की सरकार को जंगलराज कहा गया था. खैर, इस जंगल का नाम था बिहार और यहां का राजा शेर नहीं, लालू प्रसाद यादव कहलाता था. लालू राज भी करते थे और चारा भी खाते थे. और उन्होंने इतना चारा खाया कि सीबीआई वालों को कहना पड़ा, दिस इस जस्ट नॉट डन. कोर्ट-कचहरी में मामला चल निकला. अब लालू थे राजा लेकिन उनसे ऊपर भी एक सरकार थी. तो उन्हें जाना पड़ा जेल. लेकिन लालू अपने खड़ाऊ छोड़ गए जिन्हें कुर्सी पर रखकर राबड़ी देवी ने राज किया. उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली 25 जुलाई, 1997 को.

अब ऊपर वाली सरकार (माने केंद्र की एनडीए सरकार) चाहती थी कि बिहार में भी उसी की सरकार हो. तो उसने ‘भारत का संविधान’ नाम की किताब खोली और उसमें से अनुच्छेद 356 वाला पन्ना खोल लिया. 12 फरवरी, 1999 को केंद्र ने राबड़ी देवी की सरकार बर्खास्त कर दी और सूबे में राज हो गया महामहिम राष्ट्रपति का. कोई और वक्त होता तो केंद्र की वाजपेयी सरकार तुरंत चुनाव करवा लेती. लेकिन 1994 में एस आर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ये आदेश दे चुका था कि किसी भी राज्य सरकारी की बर्खास्तगी का फैसला लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पास होना ज़रूरी है. वाजपेयी लोकसभा में तो प्रस्ताव पास करा सकते थे, लेकिन राज्यसभा में उनके पास पर्याप्त समर्थन नहीं था. कुछ दिन परदे के पीछे कोशिशें हुईं. लेकिन ये जल्द साफ हो गया कि प्रस्ताव राज्यसभा में पेश हुआ तो हर हाल में गिरेगा. मजबूरन 8 मार्च, 1999 को वाजपेयी सरकार को राबड़ी की सरकार को बहाल करना पड़ा. लालू जीत गए. लेकिन एनडीए इस हार को भूला नहीं. वो राबड़ी को सत्ता से बाहर करने के लिए सारे उपाय करने को तैयार था. अब उसे राबड़ी की सरकार की मियाद खत्म होने का इंतज़ार था.

***

राबड़ी देवी बस मुखौटा रहीं. मुख हमेशा लालू ही रहे.
राबड़ी देवी बस मुखौटा रहीं. मुख हमेशा लालू ही रहे.

असली वाली कहानी-

साल 2000 में बिहार में चुनाव हुए. जनता का एक बड़ा धड़ा लालू की रवानगी चाहता था. लेकिन लालू की पकड़ न बिहार प्रशासन पर कमज़ोर पड़ी थी, न वहां की राजनीति पर. ऐसे माहौल में हुए चुनाव ने एक खिचड़ी विधानसभा को जन्म दिया. कोई भी पार्टी सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 163 के आंकड़े के पास तक नहीं पहुंच पाई. लालू के पास 123 सीटें आईं. इनमें भी कुछ ऐसी थीं जिनपर एक ही प्रत्याशी (जैसे लालू) ने दो जगह से चुनाव लड़ा था. बाकी सीटें भारतीय जनता पार्टी (67), समता पार्टी (34), और जनता दल युनाइटेड (21), झारखंड मुक्ति मोर्चा (12), सीपीआई (6), सीपीई एमएल (6), सीपीएम (2), और बसपा (5) में बंट गईं. सीटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा (25 सीटें) निर्दलीय ले गए. इन निर्दलीयों में से कई ने जेल के अंदर से चुनाव लड़ा था.

भाजपा, समता पार्टी और जनता दल एनडीए के छाते में साथ आए बड़े दल थे. उनके पास ज़रूरी सीटें नहीं थीं. लेकिन सीटें लालू के पास भी नहीं थीं. और यहीं एनडीए को उम्मीद नज़र आई. इस उम्मीद का चेहरा बनाया गया नीतीश कुमार को. 27 फरवरी, 2000 के दिन ऐलान कर दिया गया कि एनडीए सरकार बनाने का दावा पेश करेगा और मुख्यमंत्री बनाया जाएगा नीतीश कुमार को. नीतीश केंद्र में मंत्रीपद छोड़कर अपने राज्य लौटने को तैयार ही बैठे थे. लेकिन लालू (आरजेडी) आसानी से हार मानने को तैयार नहीं थे. 27 फरवरी के ही दिन राबड़ी देवी को आरजेडी विधायक दल का नेता घोषित कर दिया गया. ये जताने के लिए कि सरकार बनाने का दावा वो भी करेंगी.

एनडीए ने नीतीश के नाम पर ही गठबंधन के दलों को जुटाया था.
एनडीए ने नीतीश के नाम पर ही गठबंधन के दलों को जुटाया था.

कायदे से गवर्नर को अगले दिन, माने 28 तारीख को ही राबड़ी देवी को सरकार बनाने का न्यौता दे देना चाहिए था. क्योंकि उन्हीं के पास सबसे ज़्यादा विधायक थे. लेकिन गवर्नर विनोद पांडे ने 28 को कोई हरकत नहीं की. कहा कि चुनाव आयोग विधानसभा गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी करेगा, उसके बाद फैसला लेंगे. अगले दिन (1 मार्च) को नीतीश कुमार ने गवर्नर वीसी पांडे को एक चिट्ठी सौंपी जिसमें दावा था कि उन्हें 146 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. इसमें 122 एनडीए के थे, 12 झारखंड मुक्ति मोर्चा के और 12 निर्दलीय. यहां एक दिलचस्प बात हुई. अपनी किताब ‘ब्रदर्स बिहारी’ में संकर्षण ठाकुर बताते हैं,

”नीतीश को सबसे पहले बाहर से समर्थन देनेवालों में 17 विचाराधीन कैदी थे, जो जेल में रहते हुए विधायक बन गए थे. नीतीश कुमार के पीछे मौजूद इस अपराधी समूह में अग्रणी थे — खौफनाक भूमिगत डॉन सूरज भान, जो मध्य बिहार के मोकामा से निर्दलीय के रूप में जीते थे. जैसे कि बिहार की अजीब तरीके की ढलान को रेखांकित करने के लिए, विचाराधीन कैदी विधायक पटना की बेउर जेल के अंदर दैनिक संवाददाता सम्मेलन आयोजित करते थे.”

खैर, नीतीश को अब भी सरकार बनाने के लिए 16 विधायक चाहिए थे. वहीं राबड़ी देवी का दावा था कि उनकी पार्टी सबसे ज़्यादा सीटें जीती है, उसका गठबंधन एनडीए की बनिस्बत बड़ा है, और वो विश्वास मत जीतने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. आरजेडी कांग्रेस के साथ जाती तो उसके पास भी 146 सीटें हो जातीं. लेकिन बिहार कांग्रेस में एकराय नहीं थी. पार्टी भाजपा के साथ नहीं जाना चाहती थी, लेकिन उसने साफ तौर पर कहा नहीं कि वो राबड़ी के साथ जाएगी ही.

बिहार में जब नीतीश को शपथ दिलाई जा रही थी और कांग्रेस अनिर्णय की स्थिति में थी, सोनिया गांधी खजुराहों में थीं. वो समय पर फैसला नहीं ले पाईं. (फोटोःरॉयटर्स)
बिहार में जब नीतीश को शपथ दिलाई जा रही थी और कांग्रेस अनिर्णय की स्थिति में थी, सोनिया गांधी खजुराहो में थीं. वो समय पर फैसला नहीं ले पाईं. (फोटोः रॉयटर्स)

लेकिन इस सब कंफ्यूज़न के बीच गवर्नर अपना ‘मन’ बना चुके थे. 3 मार्च को उन्होंने राबड़ी देवी की जगह नीतीश कुमार को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया और कहा कि शपथ लेकर सदन में बहुमत साबित करें. आरजेडी की तमाम आपत्तियों के बावजूद नीतीश ने 3 मार्च को बतौर बिहार मुख्यमंत्री शपथ ले ली. यहां गवर्नर की मंशा पर शक करने की दो वजहें थीं. पहली तो ये कि सबसे ज़्यादा विधायकों वाली आरजेडी का सरकार बनाने पर पहला दावा था. दूसरी ये कि गवर्नर ने शुरुआत में खूब वक्त लगाकर फैसले लिए. फिर अचानक नीतीश को न्यौता दे दिया. जबकि बिहार की पिछली विधानसभा का कार्यकाल तो 14 अप्रैल तक था. इसका मतलब राबड़ी देवी 14 अप्रैल तक बिहार की सीएम रह सकती थीं. उनकी अनुशंसा के बगैर विधानसभा भंग नहीं की जा सकती थी. नीतीश को सीएम पद की शपथ दिलाने से पहले गवर्नर ने राबड़ी को भरोसे में नहीं लिया गया था. इसीलिए ये बात चल पड़ी कि ये सब केंद्र की एनडीए सरकार के इशारे पर हो रहा है.

एनडीए ने आखिर लालू को सत्ता से बाहर करके बिहार में अपना सीएम बैठा दिया था. लेकिन लालू ने अब भी हार नहीं मानी और तय कर लिया कि वो नीतीश को बहुमत साबित नहीं करने देंगे. लालू को अपनी पकड़ पर भरोसा था. वो छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देते थे, जो नीतीश के बस का नहीं था. इसीलिए जब एक-एक विधायक को लुभाने के लिए लालू-नीतीश में होड़ चल रही थी, नीतीश हमेशा आगे रहे. ठाकुर अपनी किताब में आगे बताते हैं,

” …जब नीतीश कुमार बसपा विधायक सुरेश पासी को लुभाने के लिए पटना के एक अस्पताल में पहुंचे, जहां उनका इलाज चल रहा था तो उन्होंने देखा कि लालू यादव पहले से ही उनके कमरे में मौजूद थे…”

लालू ज़मीनी पकड़ वाले नेता थे. इसलिए गठबंधन के लिए छोटे दलों को मनाने में वो आगे रहे.
लालू ज़मीनी पकड़ वाले नेता थे. इसलिए गठबंधन के लिए छोटे दलों को मनाने में वो आगे रहे.

इसके अलावा लालू को नीतीश के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी राज्य के खुफिया नेटवर्क से जानकारियां मिल रही थीं. इनके आधार पर लालू ने पक्का कर लिया था कि विधानसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने में वो ही आगे रहेंगे. फिर उन्होंने इंतज़ार किया. नीतीश कुमार दिनों-दिन परेशान होते रहे और लालू आश्वस्त. 7 दिन बाद, 10 मार्च, 2000 को नीतीश कुमार समझ गए कि वो बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे. उन्होंने गवर्नर वीसी पांडे को इस्तीफा सौंप दिया.

अब राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ था. लेकिन लालू को लगा कि गवर्नर अब भी कोई चाल चल सकते हैं. तो उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली ताकि केंद्र को खरी-खोटी सुनाएं. लेकिन कॉन्फ्रेंस शुरू होने के चंद मिनट पहले ही राबड़ी देवी के नाम गवर्नर की एक चिट्ठी पहुंच गई थी. इसमें उन्हें बिहार में सरकार बनाने का न्यौता था. बहुमत साबित करने के लिए 10 दिन भी मिले थे. और बहुमत लालू ने बड़े कायदे से साबित किया. एनडीए से वो आनंद मोहन की बिहार पीपल्स पार्टी को तोड़ लाए. कांग्रेस को सरकार में बैठने के लिए मना लिया और लेफ्ट पार्टियों से कहलवा दिया कि वो सरकार को बाहर से समर्थन देंगी. राबड़ी ने पांच साल बिहार की सरकार चलाई.

नीतीश के इस्तीफे के बाद राबड़ी का शपथ लेना एनडीए की हार थी. वाजपेयी की हार थी. (फोटोःरॉयटर्स)
नीतीश के इस्तीफे के बाद राबड़ी का शपथ लेना एनडीए की हार थी. वाजपेयी की हार थी. (फोटोः रॉयटर्स)

राबड़ी जब शपथ ले रही थीं, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मॉरिशस के अप्रवासी घाट पर थे. पत्रकारों ने उनसे जब पूछा कि वो बिहार के हालात पर क्या कहेंगे, तो उन्होंने बस इतना कहा (या यों कहें कि उनके पास कहने को बस ये था),

” आप ये सवाल इसलिए पूछ रहे हैं कि हम इस घाट पर हैं. एक सदी पहले बिहारी यहीं से मॉरीशिज़ में दाखिल हुए थे. लेकिन मैं यहां बिहार की बात नहीं करने वाला.”

इति.


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