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रूसी लड़की के साथ दारा सिंह का डांस और उनकी पत्नी की जलन

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वो साल 1970 था, जब शोमैन राजकपूर की फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ एक शानदार फिल्म के तौर पर स्थापित हुई. लेकिन ये बात 1965 की है. एक शाम एक्टर-डायरेक्टर राज कपूर ने दारा सिंह को फोन किया और कहा,” तुम मेरी नई फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में एक रिंग मास्टर का रोल करोगे. अगले हफ्ते हम शूटिंग शुरू करेंगे.”

दारा ने जवाब दिया,”बिल्कुल करेंगे”.

इसके बाद न कोई सवाल पूछा गया और न ही दोनों ही तरफ़ से किसी सवाल की गुंजाइश थी. दारा सिंह और राज कपूर की दोस्ती ही ऐसी थी कि पैसे के लेन-देन की बात फ़िज़ूल थी.

Dara-Singh

दारा सिंह पार्टियों में जाने वाले आदमी नहीं थे. कभी जाते भी थे तो उनकी पत्नी सुरजीत साथ जरूर होती थीं. सुरजीत इन पार्टियों के लिए बहुत ज्यादा उत्साहित रहती थीं और अपने तरकश से सजने-संवरने के सारे तीर निकाल लेती थीं. उन्हें लगता था कि राजकपूर की पार्टी को मिस नहीं करना चाहिए. फिर वहां पर वो फिरंगी भी तो होते हैं, जो उनके पति पर मरते हैं.

ऐसे ही एक दिन पार्टी में जाने के लिए सुरजीत ने ख़ुद को संवारने में घंटों पार्लर में बिताए. बालों का सुंदर सा जूड़ा बनाया, चेहरे पर रोगन फ़ेरा. दारा आए और अपना कोट उठाते हुए कहा,”चलो, तैयार हो जाओ, पार्टी में नहीं चलना क्या. 10 मिनट में हम निकलेंगे”.

“तैयार हो जाऊं? लेकिन मैं तो सजी-धजी बैठी हूं”, सुरजीत ने चौंकते हुए कहा.

“क्या! ये सजना है या कुछ ज्यादा ही सजना हो गया है.” दारा ने अपनी बीवी के बालों की तरफ़ देखते हुए कहा. “इस हेयरस्टाइल से मैं ऊब चुका हूं. उधर सेट पर हीरोइन्स का ये सब जूड़ा- वूड़ा अब यहां घर पर भी वही. इसको हटाओ…और ये मेकअप भी. तुमपे मेकअप अच्छा नहीं लगता है, तुम बिना इन सबके ज्यादा अच्छी लगती हो.”

सुरजीत अभी तक सकते में थीं. उन्होंने डरते- डरते वो सारा मेकअप उतारा, ख़ुद को शीशे में देखा, उनके पति उनके बगल में थे, वो वाक़ई में सुंदर दिख रहीं थीं.

कुल मिलाकर वो खुश थीं और पार्टी में अपने पति के साथ थीं. लेकिन वहां पहुंचने पर एक बार फ़िर सुरजीत के आंसू वापस आने लगे. 45 मिनट हो गए थे और दारा का एक रूसी लड़की के साथ चल रहा डांस ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. इंडस्ट्री के दो बड़े चेहरे जॉय मुखर्जी और बिस्वाजीस भी वहीं सुरजीत के बगल बैठे थे, लेकिन सुरजीत ने उन्हें पलकें उठाकर भी नहीं देखा. जॉय मुखर्जी ने सुरजीत की ये हालत देखकर माहौल को हलका करने के लिए कहा,”चलिए भाभी जी हम दोनों भी डांस करते हैं और उन्हें जलाते हैं”. सुरजीत ने मुस्कराकर मना कर दिया.

जब भगवान हनुमान को मिली दारा की शक्ल

साल 1986 दारा सिंह की जिंदगी का अहम पड़ाव था. सुभाष घई की सुपरहिट फ़िल्म ‘कर्मा’ में रोल करने से लेकर भारत की पहली धार्मिक टीवी सीरीज ‘रामायण’ में हनुमान के क़िरदार तक.

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प्रेम सागर याद करते हुए बताते हैं, “1942 में जब मेरे पिता 24 साल के थे उनके रईस घर वालों ने उन्हें बाहर निकाल दिया क्योंकि उन्होंने शादी में दहेज लेने से मना कर दिया था. उन्हें अख़बार बेचने और गाड़ी साफ़ करने तक काम करना पड़ा. फ़िर एक दिन उन्हें मिला एक फ़कीर. फ़कीर ने कहा कि बच्चा एक दिन तू बड़ी बड़ी फ़िल्में बनाएगा और 80 के दशक में तू फिल्में छोड़कर रामायण पर कहानी बनाएगा.” ये कितने हैरत की बात है कि 40 के दशक में ही एक साधु ने ये बड़ी भविष्यवाणी कर दी थी.

फिर एक शाम दारा सिंह के पास एक फोन आता है,”दारा, तुम मेरे नए टीवी सीरियल में हनुमान बनोगे.”

“सागर साब, मैं 60 का हो चुका हूं, किसी जवान लड़के को लीजिए आप.”

“तुम हनुमान के लिए बेस्ट हो.”

ऐसा भी वक़्त आया जब दारा के हनुमान के रूप में फ़ोटोग्राफ मंदिरों में लगने लगे और कुछ लोगों के पास तो दारा की शक्ल में हनुमान की मूर्ति भी थी.

 


– सीमा सोनिक आलिमचंद की किताब ‘दीदारा आका दारा सिंह’ के अंश.


ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए प्रज्ञा ने लिखा था.


 


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How Dara Singh got the iconic role of Hanuman in Ramayan

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