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हेल्थ मिनिस्ट्री वालों, मां-बाप को भी सेक्स एजुकेशन की सख्त जरूरत है

क्या आप कभी अपने बच्चों को बताएंगे कि समलैंगिक होने में कोई बुराई नहीं है? क्या उनसे कहेंगे कि सेक्स के समय कॉन्डम यूज करना? आने वाली पीढ़ियों का पता नहीं, लेकिन अधिकतर माता-पिता तो बच्चों के सामने ऐसे रहते हैं जैसे सेक्स कोई चीज है ही नहीं. सेफ सेक्स और समलैंगिकता तो दूर की बात है. हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इससे दूर ही रहती है. पर एक चीज नई हुई है.

आज ख़बरों में आया कि हेल्थ मिनिस्ट्री ने बढ़ते हुए बच्चों को पढ़ाने के लिए जो रिसोर्स मटीरियल तैयार किया है उसमें सेक्स और समलैंगिकता को लेकर काफी सकारात्मक चीजें लिखी हैं. पढ़िए मिनिस्ट्री ने क्या कहा है:

हां, बढ़ते बच्चे प्रेम में पड़ जाते हैं. उनको अपने किसी दोस्त या किसी भी व्यक्ति से आकर्षण महसूस हो सकता है, चाहे वो ‘अपोजिट सेक्स’ के व्यक्ति से हो या ‘सेम सेक्स’ के व्यक्ति से. किसी व्यक्ति के लिए ख़ास भावनाएं होना आम बात है. बच्चों का ये समझना जरूरी है कि ये रिश्ते आपसी सहमति, विश्वास, पारदर्शिता और इज्जत से फलते हैं. अपनी इस भावनाओं को लेकर बात करने में कोई बुराई नहीं है, अगर आप सम्मानपूर्ण तरीके से अपनी बात कहें. और अगर लड़की आपसे ‘न’ कहे तो उसका मतलब ‘न’ है.

इसके अलावा रिसोर्स मटीरियल ये भी कहता है:

एक लड़का खुद को अभिव्यक्त करने के लिए रो सकता है. वो कम बोलने वाला भी हो सकता है. बेरुखी से बात करना या संवेदनशून्य होना पौरुष का प्रतीक नहीं है. लड़कों की खाना बनाने में या डिज़ाइन करने में रूचि हो सकती है. इसे लड़कियों का काम नहीं माना जाना चाहए. ऐसे लड़कों को ‘लड़की’ या ‘सिसी’ नहीं कहा जाना चाहिए. वहीं दूसरी ओर जो लड़कियां तेज़ बोलती हैं, खेलने में रूचि रखती हैं या वैसे कपड़े पहनती हैं जैसे अक्सर लड़के पहनते हैं, उन्हें मर्दाना या ‘टॉमबॉय’ नहीं कहा जाना चाहिए.

इसके साथ ये भी लिखा है कि हस्तमैथुन अपनी सेक्शुअल फीलिंग को अभिव्यक्त करने का सबसे अच्छा तरीका है, चाहे वो लड़का हो या लड़की. इसके अलावा गर्भ निरोधन पर भी डिटेल में जानकारी है.

स्कूल के दिन, यानी हमारी टीनएज. एक बढ़ते हुए शरीर के तौर पर हमारे लिए ये जितना जरूरी समय होता है, उसे असल में हमारे माता-पिता सबसे ज्यादा इग्नोर करते हैं. एक ऐसे समय में जब माता-पिता को बच्चों के हॉर्मोन की वजह से उनके शरीर में आने वाले बदलावों को समझना चाहिए, वो सेक्स जैसे मुद्दों से कन्नी काट लेते हैं. असल में ये माता-पिता की कोई गलती नहीं है. ये समाज की बनावट है. और चूंकि माता-पिता से हमारा रिश्ता महज बायोलॉजिकल या इमोशनल ही नहीं, बल्कि मॉरल भी होता है, हमें लगता है सेक्स की बात करने से वो मैला हो जाता है.

ये मुझे कुछ विदेशी टीवी सीरियल देखने के बाद मालूम पड़ा था कि असल में मां-बाप भी बच्चों से माफ़ी मांग सकते हैं. असल में ऐसा कल्चर भी होता है जहां मां-बाप बच्चों को हर्ट करने पर उनसे बातें करते हैं, अपना पक्ष रखते हैं और उन्हें उदास करने के लिए माफी मांगते हैं. हमारा कल्चर तो ऐसा है कि मां-बाप ने जो भी किया है वो सही ही है. उस पर सवाल उठाने का आपको कोई हक नहीं है क्योंकि आप नैतिकता की सीढ़ी में उनसे एक पड़ाव नीचे खड़े हैं.

बच्चों को हर रोज एक ही बात रटाई जाती है. कि इश्क़-मोहब्बत बड़ी खराब चीजें हैं. हमारी किताबें हों या हमारी फ़िल्में, सब मां-बाप के निर्देशन में दिखाया जाता है. फ़ोन और टीवी मां-बाप के निर्देशन में यूज किया जाता है. बच्चों के दिमाग को अपने तरीके से विकसित करने का जिम्मा मां-बाप उठा लेते हैं. यही मां बाप मगर कभी सेक्स के बारे में बच्चों को नहीं बताते. फिर जब बच्चे अपना ज्ञान पॉर्न फिल्मों से अर्जित करते हैं, तो अनसेफ सेक्स करते हैं. अनचाही प्रेगनेंसी के शिकार होते हैं. और आप उन्हें सुधारने के लिए उन्हें कमरों में बंद कर देते हैं. पीटते हैं. आप ये नहीं सोचते कि हमारी तरफ से क्या कमी रही कि बच्चे ने ये गलती की. आप ये सोचते हैं कि उस पर 24 घंटे का पहरा लगाकर आप उसे सुधार लेंगे.

मां-बाप के तौर पर, इन बच्चों के पहले हमें सेक्स एजुकेशन मिलनी चाहिए. क्योंकि मां-बाप को पता ही नहीं है कि बच्चों से सेक्स के बारे में बात करें कैसे. अगर स्कूल बच्चों को सिखा भी देगा कि समलैंगिकता में कोई बुराई नहीं, उसके माता-पिता उसे शायद स्कूल से ही निकलवा दें.

स्कूल में इस तरह शिक्षा देना इतना अच्छा कदम है कि पहले तो विश्वास ही हुआ ही नहीं कि ये सच है. खासकर उस देश में जहां समलैंगिकता को गुनाह माना जाता है. उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियां इतनी समझदार होंगी कि सेक्स का सब्जेक्ट नहीं बनाना पड़ेगा. मां-बाप इन विषयों पर बात करने में हिचकेंगे नहीं.


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