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दुनिया में सबसे पहले चमके ये 3 'भारत रत्न'

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देश का सबसे बड़ा सम्मान ‘भारत रत्न’ है. तांबे से बना पीपल जैसा पत्ता, सूरज, अशोक स्तंभ और ‘सत्यमेव जयते’ से सजा ‘भारत रत्न’. जिस गले सजता है, मुल्क उसे सम्मान से देखने लगता है. मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेयी और सचिन तेंदुलकर को हाल ही में ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया. पर हम यहां बात आज की नहीं, अतीत की करना चाहते हैं. हमारे पहले भारत रत्न. क्या आप उन ‘नगीनों’ के बारे में जानते हैं, जिन्हें सबसे पहले मिला ‘भारत रत्न’ पुरस्कार.

साल 1954 से शुरू भारत रत्न पुरस्कार सबसे पहले 3 हस्तियों को दिया गया. सी राजगोपालाचारी, सीवी रमन, सर्वपल्ली राधाकृष्णन. आगे जानिए हमारे पहले इन तीन भारत रत्नों के बारे में. क्यों बनीं ये तीन हस्तियां ‘भारत रत्न’…

1. सी राजगोपालाचारी

हर व्यक्ति की अच्छाई ही प्रजातंत्रीय शासन की सफलता का मूल सिद्धांत है:   सी राजगोपालाचारी

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को राजाजी नाम से भी पुकारा जाता था. लेखक, वकील, राजनेता. पहले और आखिरी भारतीय गर्वनर जनरल. मद्रास प्रांत के मुख्यमंत्री. रिश्ते में महात्मा गांधी के समधी थे. कमाल का लिखते थे. उपनिषदों और गीता पर राजाजी ने लिखा. महाभारत और रामायण को भी इंग्लिश में लिखा. 1954 के दौर में राजागोपालाचारी को राजनीति का चाणक्य कहा जाता था.

1950 में नेहरू कैबिनेट में बिना पोर्टफोलियो के शामिल हुए. 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल की मौत के बाद नेहरू सरकार में गृह मंत्री बने. नेहरू जहां हिंदू महासभा को देश के लिए खतरा बताते थे, वहीं राजगोपालाचारी कम्युनिस्टों को. विचारधारा अलग-अलग थी. मतभेद हुए. कांग्रेस छोड़ राजाजी ने स्वतंत्र पार्टी बनाई. राजगोपालाचारी की शख्सियत के उस दौरे के विदेशी हुक्मरान भी तारीफ करते थे. मंदिरों में दलितों का प्रवेश राजाजी की कोशिशों से ही संभव हो पाया था.

2. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

क्या आप हाई स्टडी के लिए विदेश जाएंगे?
सर्वपल्ली राधाकृष्णन: नहीं, लेकिन मैं विदेश पढ़ाने के लिए जरूर जाना चाहूंगा.

5 सितंबर को टीचर्स डे राधाकृष्णन के जन्मदिन के मौके पर ही मनाया जाता है. देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे सर्वपल्ली राधाकृष्णन. यूनेस्को में आजाद भारत का नेतृत्व राधाकृष्णन ने किया. राधाकृष्णन को भारत के महान दार्शनिकों में गिना जाता रहा. राधाकृष्णन हिंदू विचारक थे. राधाकृष्णन करीब 40 साल शिक्षा क्षेत्र से जुड़े रहे. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने फिलॉस्फी में एमए की पढ़ाई की थी.

अपने लेखों और भाषणों से आजादी से पहले सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने दुनिया में भारत की अलग पहचान बनाई. ब्रिटिश सरकार ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन को ‘सर’ की उपाधि से नवाजा था. सर्वपल्ली राधाकृष्णन उस वक्त इस कदर पसंद किए जाते थे कि टीचिंग के दिनों में जब उनका ट्रांसफर मैसूर से कोलकाता हो गया था. तब बग्गी को मैसूर स्टेशन तक घोड़े नहीं, छात्र खींचकर ले गए थे.

3. सीवी रमन

वैज्ञानिकों के काम पर मीडिया का ध्यान तब ज्यादा जाता है, जब उन्हें किसी पश्चिमी देश से सम्मान दिया जाता है: सीवी रमन

जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था, तब चंद्रशेखर वेंकट रमन को साल 1930 में फिजिक्स (भौतिकी) का नोबेल पुरस्कार दिया गया. बड़ी खोज की. रमन स्कैटेरिंग. आसान भाषा में बोलें तो रौशनी की किरण जब किसी भी ट्रांसपेरेंट मीडियम से निकलती है तो ये छितरा जाती है. 28 फरवरी को इसी उपलब्धि की वजह से नेशनल साइंस डे मनाया जाता है. 12 साल की उम्र में दसवीं क्लास पास कर ली थी. सीवी रमन मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की. लैब से मुहब्बत इस कदर थी कि अक्टूबर 1970 में दिल में दर्द होने पर लैब में वहीं गिर पड़े. कुछ दिनों बाद 21 नवंबर 1970 को सीवी रमन साहेब की मौत हो गई.

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first three indians who were awarded bharat ratan

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