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अपना मैडी, जिसने सैफ अली ख़ान को मातृभाषा में गरिया दिया था

गेम ऑफ थ्रोन्स के सारे सीजन के टोरेंट घिस के बैठ गए. इसे खोजने, डाउनलोड करने में कुछ दिक्कते हैं. हिंदी मीडियम वालों की और मुसीबत है. उनको सबटाइटल की भी दरकार होती है. सुने हैं सात समंदर पार इसे HBO वाले खुल्ला दिखाते हैं टीवी पर. यहां नहीं दिखा सकते. यहां अपन जिन टीवी सीरियल्स को देखकर बड़े हुए हैं उनमें बहुतै रोमांचक था ‘सी हॉक्स’. डीडी मेट्रो पर आता था. अब वो न विकीपीडिया पर मिलता है न यूट्यूब पर. वो मिलेगा लेट 80’s और अर्ली 90’s में पैदा हुए लोगों के दिल में.

उस शो को देखने में जितनी दिक्कतें उठाईं वो बेशुमार हैं. छत पर एंटीना घुमाने से लेकर बैटरी का जुगाड़ तक करना याद है. और उस सीरियल का वो चॉकलेटी लौंडा याद है. प्रीत, जिसकी सीरियल में नंबर दो पोजीशन थी. नताशा को बतासा कहता था. आदमी औरत सबकी मिमिक्री करके आवाज निकाल लेता था हूबहू. एक उम्र तक हम उसका नाम प्रीत ही जानते रहे. एक दिन अखबार के सतरंगी कॉलम में उसकी बड़ी सी फोटो देखी थी. छोटा सा नाम लिखा था नीचे. आर माधवन. वो पन्ना फाड़कर अपने कमरे के दरवाजे पर चिपका लिया था. ताकि फिर कभी नाम न भूले. बड़ी क्यूट सी स्माइल थी भाई उसकी. वो सीरियल हम दो वजहों से देखते थे. एक ‘आगे क्या होगा’ और दूसरा आर माधवन. माधवन माने मैडी भाई, मैडी सर या मैडी अन्ना.

आर माधवन का पूरा नाम है रंगनाथन माधवन. पहले वाला नाम पापा से विरासत में मिला है. पता चला कि ‘सी हॉक्स’ के अलावा ‘बनेगी अपनी बात’, ‘घर जमाई’ और ‘साया’ जैसे सीरियल्स में भी वो आए थे. फिल्मी सफर शुरू हुआ ‘इस रात की सुबह नहीं’ से. कामयाब फिल्में कई हैं मैडी भाई के करियर की. ‘रंग दे बसंती’ का वो एयरफोर्स पायलट. जो अपने दोस्तों को नसीहत देता है, “कोई भी मुल्क परफेक्ट नहीं होता, उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है.”

या फिर ‘तनु वेड्स मनु’ और उसका सीक्वल. दोनों में एक भयानक कनफ्यूज और प्यार के प्रति समर्पित आदमी का किरदार ज़बरदस्त है. जब वो बीवी ने उसको मोटा होने की वजह से ‘अदरक होने’ का खिताब देती है तो अपने आसपास की सैकड़ों फैमिलीज याद आ जाती हैं. जिसमें मियां जी का पेट कद्दू सा निकलता आ रहा है. उसे कम करने के लिए सुबह शाम दौड़कर घरवालों पर एहसान करते हैं लेकिन कभी एक कप चाय खुद बनाकर नहीं पीते. और फिर वो ‘साला खड़ूस’ का जाबड़ बॉक्सिंग कोच. कैसा थूर के रख देता है. क्या बॉडी बनाइस था भाई इस फिल्म में.

हिंदी के अलावा तमिल की तमाम फिल्में की हैं. लेकिन जिन फिल्मों में माधवन का करेक्टर सबसे अच्छा लगा वो बताते हैं.

RHTDM का माधव शास्त्री: शर्त लगा लो जो माधव शास्त्री का नाम भी याद हो. और दूसरी शर्त लगाओ जो मैडी भाई को भूले हो. अरे भैया मैडी जब मातृभाषा में गरियाइस था सैफ अली खान को. तो कित्ते ही लल्लू पंजू इंस्पायर हो लिए थे. ये फिल्म ‘तेरे नाम’ का ग्लोरियस वर्जन थी. मतलब एलीट क्लास. माने गांव कस्बे की जबरदस्ती वाली लव स्टोरी जो उठकर शहर चली गई. लड़का जो पहले कमीना था, प्यार में पड़कर सुधर गया. सच्चा वाला प्यार, जो उठाईगीरों को ट्रैक पर लाता है.

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गुरू का झोले वाला पत्रकार श्याम सक्सेना: ये किरदार असली पत्रकार की जिंदगी पर बेस्ड था. जिसका नाम था एस गुरुमूर्ति. इन्होंने एक जमाने में हाई टेंपर वाले बिजनेस पर्सनैलिटीज की नाक में दम कर रखा था. फिल्म में कहानी पलट गई. मणिरत्नम ने गुरू बना दिया गुरूकांत देसाई को और वो ईमानदार पत्रकार हो गया नंबर दो. जिसने प्यार किया एक लड़की से, जिसे प्यार करने वाले खड़ूस बिजनेसमैन को उसे सबक सिखाना था. खद्दर का कुर्ता और झोला लिए वो शायद आखिरी असली पत्रकार देखा गया था. अब तो लैपटॉप और स्मार्टफोन का जमाना है. ऐसे में खद्दर वाले पत्रकार को एलीट माना जाता है.

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तीन इडियट्स में से एक फरहान: मिडिल क्लास फैमिली का लड़का. जिसकी हालत आज के ढेर सारे अच्छी वाले स्टूडेंट्स जैसी है. जिनका इंट्रेस्ट होता है ढोलक बजाना और वो कर रहे होते हैं इंजीनियरिंग. फिर उसके बाद एक नौकरी. ठीकठाक सैलरी पैकेज पर. एक बीवी और एक घर. जैसा चतुर का था फिल्म में. और लाइफ सेट. सपने, पैशन सब गए घुइयां तौलाने. उसके साथ वो चिलबिल रैंचो था. जिसने उसके घर वालों को समझा बुझा दिया. हमारे आसपास के फरहानों के साथ फिल्मी एंगल नहीं होता. अक्सर उनको खुद ही फैसला करना होता है. घरवालों के खिलाफ जाकर तो कई बार घर छोड़कर भी. फिर भी उनको कुछ इंस्पिरेशन देने के लिए फरहान का शुक्रिया.

भैया क्यूट स्माइल वाले आर माधवन को हैप्पी वाला बड्डे. चलते चलते रामजी लंदन वाले राम को याद कल्लो. जो प्लेन में टॉयलेट में बैठकर लोटा मांग रहे थे.


विडियो- एक्टर आर माधवन मंदिर में क्रॉस रखने के लिए ट्रोल हुए, फिर शानदार जवाब दिया

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