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अनिल दवे: वो नेता जिसकी वसीयत से हम दुनिया को बचा सकते हैं

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ये 1989 का साल था. उज्जैन के बडनगर में दवे परिवार का कार्यक्रम चल रहा था. इसी कार्यक्रम में 33 साल के अनिल आते हैं और कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी के लिए अलग रास्ता चुन लिया है. घर-बार छोड़ कर को संघ के प्रचारक बनने जा रहे थे. दवे परिवार के लिए यह कोई नहीं बात नहीं थी. अनिल दवे परिवार की तीसरी पीढ़ी थे, जो संघ के प्रचारक होने जा रहे थे.

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संघ से जुड़ाव की कहानी शुरू होती है उनके दादा, दादा साहेब दवे से. दादा साहेब दवे संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवालकर के बहुत करीबी दोस्त थे. वो मध्य प्रदेश में जनसंघ के पहले अध्यक्ष रहे. दादा साहेब के संघ से जुड़ाव को इससे ही समझा जा सकता है कि उन्होंने अपने बड़े बेटे का नाम केशव और छोटे बेटे का नाम माधव रखा. अनिल के ताऊ केशव दवे भी संघ के प्रचारक रहे.

कॉलेज का अमिताभ बच्चन 

उनकी शिक्षा इंदौर के गुजराती कॉमर्स कॉलेज से हुई. छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे. कॉलेज में काफी लोकप्रिय थे लेकिन छात्र राजनीति की वजह से नहीं. दरअसल उस दौर के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन की वो बढ़िया मिमिक्री किया करते थे. इस वजह से कॉलेज के तमाम कार्यक्रमों में उनकी अच्छी मांग हुआ करती थी. कद लंबा होने और अमिताभ की मिमिक्री करने की वजह से कॉलेज में उन्हें अमिताभ नाम से ही जाना जाता था.

जिसके घर में रहती थी एक नदी 

भोपाल में उनके घर का नाम ‘नदी का घर’ है. यह दरअसल उनके गैर सरकारी संगठन समग्र नर्मदा का मुख्यालय भी था. नर्मदा के प्रति ख़ास दिलचस्पी. हाल में हुए नमामि देवी नर्मदे यात्रा में तय किया गया कि नर्मदा के दोनों तरफ पेड़ों की कतार लगाई जाए. यह आइडिया दरअसल 2008 में अनिल दवे ने ही दिया था. क्योंकि नर्मदा ग्लेशियर से निकलने वाली नदी नहीं है इसलिए उसको बचाने के लिए अलग किस्म के उपाय करने जरुरी हैं. अमर कंटक से लेकर भंरूच तक उन्होंने राफ्टिंग की. इस यात्रा के जरिए उन्हें नर्मदा और उससे जुड़े मसलों पर बुनियादी समझ हासिल की. उन्होंने नर्मदा के किनारे की गुफाओं और उससे जुड़े मिथकों पर किताब लिखी – अमर कंटक से अमर कंटक.

कुशल रणनीतिकार 

1999 तक वो पर्दे के पीछे संघ का काम करते रहे. 99 में जब उमा भारती चुनाव लड़ने के लिए भोपाल आईं तो उन्हें भारती के मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गई. इस ज़िम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया भी. लेकिन रणनीतिकार के रूप में उनकी असली पहचान 2003 में सामने आई. भोपाल में एक पता है – 74 बंगलो. यहां पर बीजेपी के नेता गौरीशंकर शेजवार का भी बंगला भी था. फरवरी 2003 में एक टीम जुटाई गई. टीम का नाम रखा गया जावली. आपको बताते चलें कि जावली वो जगह है जहां शिवाजी ने अफजल खान को मारा था.

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दस साल की दिग्विजय सिंह सरकार के खिलाफ भाजपा के प्रचार का जिम्मा इसी टीम जावली के पास था. एक रणनीतिकार के तौर पर दवे को पहचान यहीं से मिली. इसी अभियान ने दिग्विजय सिंह को नया नाम दिया, “मिस्टर बंटाधार.” चुनाव के दौरान यह नाम जनता की जुबान पर चढ़ गया. यह सूबे की राजनीति में पहली बार था कि चुनाव में वॉर रूम जैसी कोई चीज देखने को मिली थी.  दवे के बारे में एक बात और कही जाती है कि उन्होंने बीजेपी के लिए लोकसभा और विधानसभा के कुल मिलाकर छह चुनाव की रणनीति बनाई थी लेकिन हर चुनाव के बाद वो राजनीतिक सतह से गायब हो जाया करते थे.

अनिल दवे के करीबी सहयोगी रहे डॉ. प्रकाश बर्तुनिया उस प्रचार अभियान का एक रोचक किस्सा सुनाते हैं

मई 2003 में मध्य प्रदेश के महू में चुनाव प्रचार के दौरान मशाल होटल में एक बैठकी लगी. बैठकी में थे कप्तान सिंह सोलंकी, बाबू लाल गौर, शिवराज सिंह चौहान, गौरीशंकर शेजवार, कैलाश जोशी और अनिल माधव दवे. अगले दिन वैंकैय्या नायडू और उमा भारती महू पहुंचने वाले थे. आयोजन था महू संकल्प पत्र को रिलीज करने का. संकल्प पत्र के दो बिंदुओं पर कैलाश जोशी और बाबूलाल गौर में असहमति हो गई. इस पर बहस करते हुए सुबह की चार बज गई. अंत में संकल्प पत्र ड्राफ्ट हुआ. तभी एक दुर्घटना हो गई. जिस कंप्यूटर पर इसे ड्राफ्ट किया गया था वो अचानक से खराब हो गया. अनिल दवे ने इस मामले को संभाला. सुबह 11 बजे के कार्यक्रम में सबके पास संकल्प पत्र पहुंच चुका था. सही समय पर दवे ने सब चीजों का ठीक से प्रबंधन कर लिया था. 

हलांकि प्रदेश में उनकी छवि कभी जननेता की नहीं रही है. वो अच्छे रणनीतिकार की पहचान रखते थे. इस बार सिंहस्थ कुम्भ पिछले प्रयाग के महाकुम्भ से 18 गुना ज्यादा खर्चीला था. इसकी कमान अनिल दवे के पास ही थी. इसके बाद उज्जैन से 7 किलोमीटर दूर निनौरा गांव में बीजेपी का वैचारिक कुम्भ हुआ. इसमें 100 करोड़ रुपए की लागत आई थी, जिसमें नरेंद्र मोदी के लिए बनी वीआईपी झोपड़ी भी शामिल थी. हालांकि नरेंद्र मोदी इस झोपड़ी में नहीं रुके लेकिन दवे के मैनेजमेंट को देख कर उन्हें दिल्ली जरूर बुला लिया. इसके एक महीने बाद ही अनिल दवे को राज्यसभा का दूसरा कार्यकाल मिल गया. 15 जुलाई 2016 में मंत्रीमंडल में हुए फेर-बदल में उन्हें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया.

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उस समय भोपाल के राजनीतिक सर्किल में यह चर्चा तेज थी कि दवे को केंद्र में इसलिए बुलाया जा रहा है ताकि उनका कद बढाया जा सके. कल को जब शिवराज सिंह की जगह उन्हें लाया जाए तो यह सवाल ना उठे कि छोटे कद के नेता को मुख्यमंत्री बना दिया गया.

मंत्री बनने पर उन्होंने बड़ी साफगोई से कहा था कि “एक सप्ताह काम समझूंगा, फिर आगे बढ़ूंगा. पर्यावरण और विकास एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं. दोनों को साधा जा सकता है. मैं एक्सेसबल पर्सन हूं, जो किसी के भी साथ बात करने को तैयार हूं.” योगी और मोदी 18 घंटे काम करने और रात 9-10 बजे तक काम करने की बात करते हैं, लेकिन दवे कहते थे, ‘मैं कड़ी मेहनत करता हूं. मेरे बच्चे नहीं हैं और मुझे उन्हें शाम को घुमाने नहीं ले जाना पड़ता, इसलिए आपको कुछ दिक्कत हो सकती है (देर तक काम करने की), लेकिन मैं सुनिश्चित करूंगा कि आपकी शाम और डिनर पर कोई असर न पड़े.’ कई बार साइकिल से संसद आए. पर्यावरण के लिए ऐसा करते थे. कहते थे, ‘मैं अखबारों में फोटो खिंचवाने के लिए साइकिल नहीं चलाता हूं. जब मैं कुछ नहीं था, तब भी साइकिल चलाता था और आगे भी साइकिल चलाता रहूंगा.’

नई नजीर गढ़ कर गए 

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आज के दौर में जब तमाम सारे राजनीतिक दलों में अपने नेताओं के नाम अमर करने के लिए पुतले बनाने और उसके जरिए वोट साधने का शगल है, इसी समय में अनिल दवे की वसीयत हमारे सामने है. उन्होंने अपनी विल में साफ़ लिखा कि मेरी स्मृति में किसी भी किस्म की प्रतियोगिता, पुतला या पुरस्कार आदि ना चलाया जाए. उन्होंने लिखा है कि अगर सही मायने में उन्हें याद रखा जाना है तो ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाए जाने चाहिए. नदियों और तालाबों को बचाए जाए. इस काम में भी इनके नाम का इस्तेमाल करने से बचा जाए. राजनीतिक विचारधारा से इतर यह ऐसी विरासत है जिससे भारतीय लोकतंत्र समृद्ध हुआ है.


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