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कोरोना सफ़र पार्ट 2 : घर लौटते मज़दूरों ने बताया बॉयकाट चाइना का असल मतलब

बनारस में एक दुकान है. शहर के सबसे पॉश इलाक़े में. सिगरा. इस दुकान पर ज़ाहिरा तौर पर सारी चीज़ें चीन की बनी हुई मिलती हैं. लेकिन जब भी सोशल मीडिया पर चीन का बहिष्कार करने की बात शुरू होती है, इस दुकान के सामने भारत का एक झंडा लगा दिया जाता है. स्पीकर पर जुबली कुमार के गाने बजने लगते हैं. आप भारतीयता पर पहले भी संदेह नहीं कर सकते थे, अब तो और भी नहीं. लेकिन फिर भी भारतीयता को ज़ाहिर करना एक प्रमाण है. एक ज़रूरी क्रिया. 

आज मुरैना से गुज़रते हुए उस दुकान की बहुत याद आयी. उजला बीहड़, तेज़ धूप और देह से सटती जाती उमस. ये राजस्थान और मध्य प्रदेश का बॉर्डर है. अब सड़क पर मज़दूर कम हो गए हैं. लदते-फ़ंदते अपने घर पहुंच गए हैं. बीहड़ के गांव में दो लड़के चले आए हैं अपने घर. आइसक्रीम बनाते थे. अब कुछ नहीं. वे उस दुकान की याद दिलाने लगते हैं. कहते हैं,

“समय-समय पर ख़ुद को और अपने मालिक को ये याद दिलाना ज़रूरी है, कि मैं उतना ही कामगार हूं, जितना कामगार पहले था. उतना ही अभी भी कमा सकता हूं, या कमाने की ख़्वाहिश तो कम से कम रखता ही हूं, जो ख़्वाहिश पहले थी.”

सवाल : भारतीयता एक बहुत बड़ी कामगारी है? 

जवाब : कामगारी एक बहुत बड़ी भारतीयता है. 

बनारस की उस दुकान के व्यवहार और इस लड़के की बात में शायद ही कोई अंतर होगा. दोनों बिना सवाल किए अपनी कुशलता ज़ाहिर करते रहते हैं. क्यों? क्योंकि लोग उनसे उनका रोज़गार न छीन लें. 


महानगरों से घरों की ओर जाते लोग ये आभास दिलाकर जाते है कि देश ने ही उन्हें फ़ेल किया है. ज़ाहिर है कि उस हिस्से को सड़क पर नहीं चलना पड़ा, जिसने बस सुना कि लॉकडाउन होने वाला है, और घर में खाना भर लिया. लेकिन जिस मॉल से खाना ख़रीद रहा था, उसके बाहर ही सस्ते में भूजा का सामान बेचने वाला एक झटके में बेरोज़गार हो गया. वो घर जाने लगा. लोगों ने देखा. पूछा उससे. अब लौटकर आओगे? मज़दूर ने जवाब नहीं दिया. देश ने अन्दाज़ लगा लिया कि मज़दूर दुखी हैं. वे ग़ुस्सा हैं. वे चौराहे पर खड़े होकर अपनी राज्य के सरकार को गाली दे रहे हैं कि उनके लिए घर लौटने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है. इसलिए ये ग़ुस्सा मज़दूर नहीं आएगा. वो गांव में रहेगा. वो शहर नहीं देखेगा. 

सच इतना प्रगाढ़ नहीं है. वो बदल जाता है. घर लौटा मज़दूर कुछ ही दिनों बाद अपने मालिक का फ़ोन पाता है. उसको नहीं पता चलता है कि लॉकडाउन का कोई फ़ायदा नहीं हुआ. केस बढ़ रहे हैं. इतना पता है कि फ़ैक्टरी खोलनी पड़ेगी. कल तक कठोर होकर “अपना देख लेने” की बात कहता उसका मालिक-मैनेजर इस बार कम पैसों में काम करने के लिए कहता है. और मज़दूर पूरी निष्ठा के साथ उस तंत्र को माफ़ कर देता है, जिसने उसे कई सौ किलोमीटर सड़क पर चलने को मजबूर किया. 

***

एक बीमारी कितना डराती है? एक डॉक्टर बताती है. दिल्ली के अस्पताल में कोविड वार्ड में ड्यूटी करती है. कहती है कि हम 10 में से 9 लोगों को बहुत आसानी से ख़तरे से निकाल लेते हैं. उस डॉक्टर को बीमारी से डर नहीं लगता है. उस डॉक्टर का कहना है कि बीमारी से ज़्यादा डर बीमारी को लेकर किए गए मिसमैनेजमेंट से लगता है. कोई भी कोरोना पॉज़िटिव हो जा रहा है. ड्यूटी पर आना तो पड़ ही रहा है. 

मैं सवाल करने की बहुत ज़्यादा उम्मीद में हूं नहीं. आप सभी सवाल करने की बहुत उम्मीद में हैं नहीं. स्वास्थ्य मंत्रालय की रोज़ाना शाम को होने वाली ब्रीफ़िंग हफ़्ते में तीन दिनों पर सिमट गयी. एक हद के बाद इस ब्रीफ़िंग में ICMR ने आना बंद कर दिया. रैपिड टेस्टिंग किट की बात बंद हो गयी. आरोग्य सेतु ऐप खचाखच भरे बस स्टैंड पर आसपास में 4 कोरोना मरीज़ दिखाता है. फिर भी हरे रंग के आलोक में लिखता है, “आप सुरक्षित हैं”. मैं सोचता हूं कि मैं सुरक्षित हूं. अमितेश सोचता है कि वो सुरक्षित है. हम मान लेते हैं कि हम सुरक्षित हैं. क्योंकि हम सवाल नहीं कर सकते हैं. हम ICMR से कितने सवाल कर सकते हैं? स्वास्थ्य मंत्रालय से कितने सवाल? राज्य सरकारों और दूसरी ज़िम्मेदार एजेंसियों से कितने सवाल कर सकते हैं? भरा तो हुआ है मेरा आउटबॉक्स उन ईमेल से जो मंत्रालयों या सचिवों को किए गए. एक की भी लौटती डाक नहीं आयी. मैं ख़ुद को सुरक्षित महसूस करने के अलावा क्या कर सकता हूं? सवाल? सफ़र? क्या?

जयपुर के एक अस्पताल में मैंने फ़ोन किया है. डॉक्टर को बताया है कि आपका इंटरव्यू करना है. डॉक्टरों की टीम ने AIDS की दवा का इस्तेमाल कोरोना में कर लिया था. बड़ी उपलब्धि थी. फिर डॉक्टर ने मेरा फ़ोन नहीं उठाया. मैं सवाल पूछने का मौक़ा तक नहीं निकाल पाया.

नोएडा में राशन लेने आयी एक औरत को पुलिस ने भयानक मारा है. दरोग़ा कहता है कि वो जवाब देने के लिए अधिकृत नहीं है. मैं सवाल नहीं पूछ पाता हूं. फिर भी वो उस औरत को कैमरे में समझाता रहता है. दरोग़ा इस ख़बर के बाद सस्पेंड हो जाता है. मैं उस औरत से कुछ दिनों बाद सवाल नहीं पूछ पाता हूं कि वो अब कैसी है? 


दिल्ली के ग़ाज़ीपुर के पास के बॉर्डर पर मीडिया की भीड़ है. वो लोगों को घर जाते हुए देखने आयी है. ये दुनिया का सबसे बड़ा मेला है. पानी, आइसक्रीम, चुनाव प्रचार सब हो रहा है. मज़दूर का घर जाना एक चिड़ियाघर है. एक उम्दा प्रशासनिक सर्कस. मेरी चेतना में एक चूक से उपजा सर्कस. लोग आते-जाते देखते हैं और कहते हैं, “लुक बेबी! दिस इज़ द क्राइसिस दे आर टॉकिंग अबाउट. डैम!” मीडिया का ध्यान भंग हो, तो पुलिस वाले मज़दूरों की थोड़ी मदद कर देते हैं. गाड़ियों में बिठा दे रहे हैं. इस जगह से लगभग 13 किलोमीटर दूर भी एक जगह है. यूपी का बॉर्डर है. यहां पर यूपी पुलिस के ही जवान गाड़ियां रोककर लोगों को बिठा दे रहे हैं. पीछे से कहते हैं, ये तो करना होगा. ये तो करना ही चाहिए. ये इतना मानवीय है कि मैं सवाल नहीं पूछ पाता हूं. सर्कस देखने आए लोगों से क्या ही सवाल पूछना. वे चलते-चलते गुज़र जाते हैं. उनके घरों में कई दिनों का खाना है. फ़ोन में तमाम ऐप हैं. बॉयकाट चाइना कहने की सहूलियत है. मैं सवाल नहीं पूछ पाता हूं. 


मैं अमितेश की टी शर्ट देखता हूं. लिखा है, ‘जो लड़े दीन के हेत’.

मैं भुनभुनाता हूं, ‘पुरजा पुरजा कट मरै, कबहू न छाड़ें खेत’.

सवाल का बोझ और सैनिटाइज़र ख़त्म होने की फ़िक्र. मैं खोजता हूं. गाड़ी कहां है? यही एक सवाल बस कौंधता है. 

***

इस शोर को झेलते जाने का कुछ है भीतर. एक कोलाहल है. एक बलवा है. एक बग़ावत है. एक नहीं पढ़ते रहने का कुछ है. ये चुनाव नहीं है. ये समय है. ये बहुत बड़ा सपना है. सम्पादक के साथ मीटिंग में उठने वाला सवाल है. आज क्या मिला. 

भरतपुर है. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है. अमितेश और मैं हाथ से दस्ताने उतारते हैं. खाना खाते हैं. मज़दूरों को मिलने वाला खाना. हम एक रिपोर्ट तैयार करते हैं. रिपोर्ट बिकती है कि हमने खाना खाया.


इस बात से किक मिलती है कि लोग ट्विटर पर ढूंढ रहे हैं मुझे और अमितेश को. बहुत सारे लोगों की बड़ाई आती है. बहुत सारे लोग कहते हैं कि मदद तो कर रहे हैं न. कुछ लोग मेरे अकाउंट में पैसे डालने की पेशकश करते हैं. टीम के कुछ लोगों ने मदद कर दी है.

एक पत्रकार होते हुए इंसान कैसे रहा जाए. इसकी लड़ाई लम्बी है. सड़क पर चल रहे, जूझ रहे लोग कौन हैं? उनसे ख़बर कर ली. कितनों का मैंने कुछ दिनों बाद हाल पूछा? मैं बस अपना पेशा हूं? तमाम संवेदनाओं के बावजूद ये लोग मेरे सब्जेक्ट हैं? महज़ सोर्स? कुछ रिकार्डिंग के लिए? एक वीडियो के लिए?


मुरैना के इस अस्पताल में एक गर्भवती महिला कोरोना के चलते अलग रखी गयी है. बताती है कि कोरोना वार्ड का शौचालय भी ख़ुद साफ़ करती है. लेकिन अस्पताल द्वारा दी गयी दवा नहीं खा रही है. बस आंगनवाड़ी केंद्र से जो दवा मिली, गर्भ की, वही खा रही है. पास में खड़ा इंचार्ज ख़ुद को बचाने की कोशिश करता है. असफल होता है. उसकी लड़की कुछ दिनों बाद मुझे मैसेज करती है. कहती है कि उसके पापा शुगर के मरीज़ हैं. मुझे उनसे इस उम्र में ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था. उसे अपने पापा पर फक्र है. मैं उस लड़की, उसके पापा, उस गर्भवती महिला, किसी से नहीं बाद में फ़ोन करके नहीं पूछता, अब तो सब ठीक है?


झांसी में रेलवे स्टेशन पर लोग जा तो नहीं सके थे घर. रुके हुए थे. बस वाले उन्हें बिठाते थे. 40 से कम होते थे, उतार देते थे. मेरे लिए आख़िर में वे सब स्टेशन पर बैठे हुए लोग थे. अमितेश ने कहा था, ‘हम मुड़कर आयेंगे भी?’. जवाब नहीं होता ऐसे सवालों का पत्रकार के पास. पत्रकार के पास बहुत सारे बिना सेव किए नम्बर होते हैं. सम्पादक से मिले सुझाव और ब्यौरे होते हैं. फ़ोन होते हैं.

हमसे कोई नहीं पूछता,

“मुड़कर जाओगे भी?”

[ये कोरोना सफ़र की दूसरी किस्त. पहली यहां. सिद्धांत और अमितेश जो गए, कुछ मिला, कुछ ख़र्च हुआ. सब यहां.]

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