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नागालैंड में मचा सियासी कोहराम गेम ऑफ़ थ्रोन्स से भी धाकड़ है

Sagar
सागर विश्नोई

दी लल्लनटॉप के ल‍िए ये लेख सागर विश्नोई ने ल‍िखा है. पेशे से पॉलिटिकल कंसल्टेंट और चुनावी विश्लेषक सागर चुनाव, राजनीति, और गवर्नेंस में जबरदस्त रुचि रखते हैं. सागर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से डिजिटल स्ट्रेटेजी में पढ़ाई की है.


कोहिमा (नागालैंड की राजधानी) में मचा सियासी कोहराम गेम ऑफ़ थ्रोन्स से भी धाकड़ है.

कुछ भी हो, हमें दिलचस्प राजनीतिक फ़िल्में या किस्से-कहानियां सुनने में बहुत मज़ा आता है. हालांकि, बॉलीवुड में राजनीतिक पृष्भूठमि पर इतनी अधिक फ़िल्में बनी नहीं और न ही टीवी शो हैं. तो क्या हुआ, हम भी ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’, ‘क्राउन’ और ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ से ही अपना दिल बहला रहें हैं. लेकिन हिन्दुस्तान की राजनीति में ही इतना मनोरंजन है कि शायद हमें राजनीतिक टीवी शो की ज़रूरत न पड़े.

ऐसा ही कुछ घट रहा है नागालैंड में. पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य में 27 फरवरी को चुनाव हो पाएगा या नहीं, इस पर असमंजस है. लेकिन वहां की राजनीति में जो पिछले कुछ सालों में हलचल मची है, वो जानने लायक है. जॉन स्नो ने क्या ही रणनीतिक खेल खेला होगा, जो नागालैंड में खेला गया है. हम आपको इसके बारे में तसल्ली से बताएंगे, लेकिन पहले नागालैंड के राजनीतिक हालात के बारे में जान लेते हैं.

राजनीतिक परिदृश्य

नागालैंड पूर्वोत्तर भारत का राज्य है, जो पश्चिम की ओर से असम, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और असम, पूर्व में बर्मा और दक्षिण में मणिपुर से घिरा है. नागालैंड की आबादी करीब 19 लाख है, जिसमें से करीब 11 लाख मतदाता हैं. नागालैंड में सबसे ज़्यादा 87.93% आबादी ईसाई धर्म की है और 8.75% आबादी के साथ हिंदू धर्म दूसरे नंबर पर है.

जिस देश के हर प्रदेश में जनसंख्या लगभग हर दूसरे सेकंड में बढ़ जाती है, वहीं नागालैंड जनसंख्या में कमी प्रदर्शित करने वाला एकमात्र राज्य है. नागालैंड को स्वायत्तता दी गई है. साथ ही, नागा जनजातियों के पास अपने मामलों का संचालन करने के विशेष अधिकार भी है.

नागालैंड में NPF, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) सक्रिय दल हैं. 2013 के चुनाव में यहां 90.19% मतदान हुआ था. 2013 में 47.04% वोट शेयर के साथ NPF पहले स्थान पर, 24.89% वोट शेयर के साथ कांग्रेस दूसरे और 6.05 % वोट शेयर के साथ NCP तीसरे स्थान पर रही थी. BJP को 1.75% मत के साथ चौथा स्थान मिला था.

राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से केवल एक सीट सामान्य है, जबकि बाकी सभी 59 जनजातियों के लिए आरक्षित हैं. 2013 में NPF को 38 सीटें मिली थीं, 8 कांग्रेस को, 4 NCP को, 1 बीजेपी-JDU और 8 निर्दलीय को. लेकिन सियासत का पहिया कुछ यूं घूमा कि अब NPF के पास 48 सीटें हैं, बीजेपी के पास 4 और 8 निर्दलीय के पास.

नागालैंड में मचा सियासी सिर-फुटौव्वल

नागालैंड में राजनीति के तीन प्रमुख सूत्रधार हैं: नेईफू रियो, शूरोजेलि लीजिएतु, और मुख्यमंत्री टीआर झेलियांग. ये तीनों NPF से ताल्लुक रखते हैं. 2014 में जब नेईफू रियो, जो नागालैंड में 2003 से NPF पार्टी से मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाल रहे थे, उनके मन में इच्छा हुई केंद्रीय मंत्री बनने की. उनकी पार्टी के सलाहकारों ने उन्हें राज्य तक ही सीमित रहने की सलाह दी, लेकिन उनकी आकांक्षाएं छलांग लगा चुकी थीं.

वो नहीं माने और 2014 लोकसभा चुनाव लड़े और जीत भी गए. घटनाक्रम यूं हुआ कि मोदी कैबिनेट में उन्हें जगह नहीं मिली और चूंकि सांसद बनने की प्रक्रिया में वो मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ चुके थे, तो अब जब वो राज्य की राजनीति में दखल देने लौटते, तब तक कोहिमा की सियासत बदल चुकी थी.

कोहिमा का सियासी पोशम-पा: पार्टी गुटबाजी

“पोशम पा भाई पोशम पा”. अगर आपने बचपन में यह खेल खेला है, तो आपको याद होगा कि इसके लिए कम से कम 3 लोगों की ज़रूरत होती है. दो लोग ऊपर हाथ जोड़कर संगठन में खड़े होते हैं और तीसरे को धर दबोचने की कोशिश करते रहते हैं. कोहिमा का यह पसंदीदा खेल है, जहां ये तीन नेता किसी न किसी बिंदु पर तीसरे के खिलाफ होते रहते हैं. इसने न केवल राजनीतिक अस्थिरता पैदा की है और पिछले तीन वर्षों में एक बड़ा संवैधानिक विवाद भी बनाया है और नई पार्टियों के सृजन में भी शामिल है, जिस वजह से भाजपा को नागालैंड में अपनी पैठ बनाने का मौका मिला है

रियो के दिल्ली की तरफ रुख करने के बाद अधिकांश एनपीएफ विधायक मुख्यमंत्री के रूप में ज़ीलियांग का समर्थन करते हैं. हालांकि, जनवरी 2015 में रियो कैंप के 23 विधायक मुख्यमंत्री को बदलने की मांग करते हैं, जिसमें वो असफल रहे. लेकिन, पार्टी के भीतर आंतरिक दरार जरूर आ जाती है. आखिरकार, चुनाव आयोग के निर्देश के तहत एनपीएफ का एक विशेष सम्मेलन बुलाया जाता है, जिसमें यह निर्णय लिया जाता है कि शूरोज़ेली पार्टी के अध्यक्ष बनें और मुख्यमंत्री जीलियांग ही रहते हैं.

अस्थिरता का अगला दौर 2017 में आता है, जब फरवरी में शहरी स्थानीय निकाय चुनाव कराने पड़ते हैं. मुख्यमंत्री जीलियांग महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन इस समर्थन की एक प्रतिक्रिया आती है और हिंसा तक बात पहुंच जाती है. यहां तक कि घर भी जला दिए जाते हैं और आखिरकार ज़ेलियांग को इस्तीफा देना पड़ता है.

इससे पार्टी अध्यक्ष शूरोजेलि का मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने का रास्ता साफ हो जाता है. ज़ीलियांग भी इसे एक अस्थायी विकल्प के रूप में देखते हुए सहमत हो जाते हैं. चूंकि शूरोजेलि कोई विधायक नहीं थे और उन्हें छह महीने में कार्यालय छोड़ना होता, तो ज़ीलियांग ने सोचा कि वह फिर से मुख्यमंत्री के रूप में वापस आ सकते हैं.

समीकरण तेजी से बदलते हैं और मुख्यमंत्री शूरोजेलि अपनी स्थिति मजबूत करने शुरू करने में जुट जाते हैं . ज़ीलियांग चाहते थे कि वे फिर मुख्यमंत्री बनें और इस बार उन्हें साथ मिलता है सांसद रियो का. वही होता है जिसका अंदाजा था. जुलाई में राज्यपाल मुख्मंत्री शूरोजेलि को अविश्वास प्रस्ताव पास होने के बाद उन्हें उनके पद से बर्खास्त कर देते हैं और नागालैंड का मुख्मंत्री ज़ीलियांग को फिर से नियुक्त किया जाता है.

एनपीएफ पार्टी अध्यक्ष के रूप में अब शूरोजेलि, ज़ीलियांग कैंप के विधायकों को बर्खास्त करना शुरू कर देते हैं और ज़ीलियांग कैंप भी शूरोजेलि कैंप के विधायकों के खिलाफ समान प्रतिक्रिया देकर एनपीएफ के असली सिपाही होने का दावा करते हैं. वे एक-दूसरे के खिलाफ अदालत में जाते हैं, एक ही पार्टी से के अंदर रहते हुए. हालांकि ज़ीलियांग एनपीएफ विधायकों, भाजपा और निर्दलीय के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बने रहते हैं.

लेकिन एक महीने पहले दिसंबर-जनवरी के मध्य तक पार्टी में गहमागहमी बढ़ती है और ज़ीलियांग व शूरोजेलि धीरे-धीरे एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बैठाने लगते हैं, दरार कम होने लगती हैं, किसलिए? सांसद रिओ को दूर रखने के लिए, जो नागालैंड चुनावों को अपनी वापसी या मुख्यमंत्री के रूप में दूसरी पारी पर नज़रे गड़ाए बैठे थे.

ज़ीलियांग और शूरोजेलि की सुलह पांच शर्तों पर आधारित होती हैं: जीलियांग चुनाव में पार्टी के मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे, 2020 तक शूरोजेलि पार्टी के अध्यक्ष रहेंगे, दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ मामले वापस ले लेंगे, ज़ीलियांग गुट से निलंबित सदस्यों को पार्टी की तरफ से वापस लाया जाएगा और रियो को विधानसभा चुनावों के लिए टिकट नहीं दिया जाएगा.

और इसी के साथ रियो एनपीएफ से बाहर निकलते हैं, एक नई पार्टी – राष्ट्रवादी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) बनाते हैं और राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को थोड़ा और खोल देते हैं. मौक़ा देखते हुए भारतीय जनता पार्टी नगालैंड में पिछले 15 वर्षों से सहयोगी नागा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) के साथ पार्टनरशिप तोड़ते हुए नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के साथ गठबंधन कर लेती है. गौरतलब है कि नगालैंड में सत्तारुढ़ डेमोक्रेटिक अलायंस ऑफ नागालैंड (डीएएन) में बीजेपी, जेडीयू और एनपीएफ शामिल थे. इसके साथ ही एक और मसौदा होता है कि कुल 60 सीटों वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी 20 पर लड़ेगी, जबकि अन्य 40 सीटों पर एनडीपीपी लड़ेगी.

नागालैंड में बड़ा मुद्दा: चुनाव का बहिष्कार

लेकिन नागालैंड में मुद्दे यहीं ख़त्म नहीं होते. पार्टी गुटबाजी तो थी ही, यहाँ तो चुनाव हो पायेंगे, ये भी बड़ा सवाल है.

नागालैंड चुनाव का एनएससीएन (आईएम) और नगा सिविल सोसाइटी कड़ा विरोध कर रहे हैं. दरअसल, एनएससीएन (आईएम) और नगा सिविल सोसायटी समूहों का नागालैंड की राजनीति में भारी दखल है, इसलिए उनको नाराज करना राजनीतिक रूप से भी गलत होगा.

दरअसल एनएससीएन (आईएम) समेत कई समूहों ने चुनाव से पहले नगा शांति वार्ता की पहेली सुलझाने की मांग की थी. इनकी मांग है कि चुनाव से पहले इस मुद्दे का हल निकाला जाए. इन समूहों ने राजनीतिक दलों को चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारने वाले समझौते पर दस्तखत करने के लिए बाध्य भी किया. समझौते के मुताबिक नागा शांति वार्ता का हल खोजे जाने तक कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा.

घोषणा में कहा गया है कि वो नागा आदिवासी निकायों और नागरिक समाज की इस मांग का समर्थन करते हैं कि चुनाव प्रक्रिया से पहले शांति वार्ता का मुद्दा हल किया जाए. इस मांग पर केंद्र सरकार ने कोई वादा नहीं किया है. साझा घोषणापत्र में यह भी कहा गया कि जब समूचे नागा लोगों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का सामूहिक निर्णय किया है, तो हम निहित स्वार्थी तत्वों और दूसरे लोगों को चेतावनी देते हैं कि वो नामांकन दाखिल करके और चुनाव प्रक्रिया में शामिल होकर बातचीत की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को बर्बाद नहीं करें.

गौरतलब है कि भाजपा ने खुद को उस समझौते से भी अलग कर लिया, जिसमें सभी राजनीतिक दलों में यह सहमति बनी थी कि नागा शांति प्रक्रिया का हल निकलने से पहले अगर चुनाव हुए, तो कोई दल उम्मीदवार नहीं उतारेगा. हालांकि, भाजपा के एक नेता ने इस घोषणापत्र पर दस्तख्त किए थे, लेकिन जल्द ही पार्टी ने कहा कि जिस नेता ने दस्तखत किए, उसने शीर्ष नेताओं से इसकी अनुमति नहीं ली थी.

बाद में भाजपा ने पल्ला झाड़ लिया और समझौते पर दस्तख्त करने वाले नेता को निलंबित कर दिया. भाजपा के लिए दिक्कत यह है कि वो चुनाव बहिष्कार के आह्वान का समर्थन नहीं कर सकती. अगर वो ऐसा करती है, तो इससे विपक्ष को केंद्र सरकार पर हमला करने का मौका मिल जाएगा. राजनीतिक दलों के लिए चुनाव बहिष्कार का विरोध चतुराई भरा निर्णय नहीं होगा.

नागालैंड विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने अंतिम तारीख थी 7 फरवरी, जहाँ 9 पार्टियों के 253 उम्मीदवारों ने अपना नामांकन किया.

लेकिन क्या केंद्र सरकार विधानसभा चुनाव कराने के अपने फैसले से पीछे हटेगी?

नागा सिविल सोसाइटी और एनएससीएन (आईएम) लंबे समय से तैयार शांति वार्ता से थक चुके हैं और वो ‘चुनाव से पहले समाधान’ चाहते हैं. लेकिन केंद्र स्पष्ट है कि यह चुनावों को स्थगित करने का कोई कारण नहीं हो सकता. इस बात को साफ करते हुए भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा भी था कि राज्य को ‘समाधान के लिए चुनाव’ की जरूरत है.

नागालैंड 27 फरवरी 2018 को अपनी नई विधानसभा चुनाव के लिए मतदान करेगा (लगता तो ऐसा ही है). नागालैंड में विधानसभा चुनाव की गतिशीलता किसी भी बड़े नगरपालिका चुनाव, जैसे मुंबई या दिल्ली नगरपालिका चुनाव के साथ तुलना की जा सकती है, जो ज्यादातर स्थानीय नेताओं के करिश्मा और माइक्रो मैनेजमेंट द्वारा जीता है. परिणाम होली के एक दिन बाद 3 मार्च को आयेंगे. क्या नागालैंड में भाजपा की होली मन पायेगी?


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