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सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो लोगों ने उन पर गोबर फेंका

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Vijay Amrutkarसावित्रीबाई फुले देश में सिर्फ दलित चेतना की प्रतीक नहीं है. वह देश में शिक्षा की अलख जगाने वाली शुरुआती सुधारकों में से हैं. फिर भी बहुत सारे लोग उनसे, उनकी कहानी और संघर्ष से अनजान हैं. 3 जनवरी को पैदा हुईं और 10 मार्च उनकी बरसी होती है. . विजय मधुकर अमृतकर ‘पीरामल फाउंडेशन फॉर एजुकेशन लीडरशिप, चुरु’ के लिए काम कर रहे हैं और 12 साल से फुले आंदोलन से जुड़े हैं. कई प्रदेशों में बहुजनवादी चेतना से जुड़े आयोजनों में भाषण दे चुके हैं. उनका यह लेख सावित्रीबाई फुले के बारे में बुनियादी जानकारी देता है और समझ बनाता है.


दुनिया जितनी देखी, सुनी, समझी और पढ़ी, उसमें मेरे लिए सबसे महान दृश्य 170 साल पहले का है. जब 17 साल की सावित्री ने अमानवीय ब्राह्मणवाद के गढ़ पुणे में हजारों साल से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था को चैलेंज किया. वह गंजी पेठ से भीड़ेवाड़ा तक ब्राह्मणवादी सनातन पुरुषों के हर अन्याय का डंके की चोट पर मुकाबला करते हुए लड़कियों और शूद्रों को पढ़ाने जाती थीं. उनकी वजह से आज देश के करोड़ों लोग, इंसान की जिंदगी जीने के काबिल हुए हैं.

किसी भी देश या समाज के मानवीय विकास में महिलाएं सबसे अहम भूमिका अदा करती हैं. जिस घर-समाज-देश में महिलाएं पढ़ी लिखी होती हैं, उन्हें फैसले लेने का हक होता है, वह निरंतर विकास की दिशा में बढ़ता है. जिस समाज में स्त्री को महज उपभोग की वस्तु माना जाए और उससे जिंदगी जीने के सभी हक छिन जाएं वह समाज-देश हमेशा गुलामी और पतन पर रहता है. हमारे देश में हजारों सालों से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया. उन्हें ताड़न का अधिकारी बनाया गया और हमारा देश लगातार सामाजिक गुलामी की श्रृंखलाओं में फंसता चला गया.

लगभग 2 हजार साल तक भारत की समाज-व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले संविधान ‘मनुस्मृति’ के मुताबिक,

“रात और दिन, कभी भी स्त्री को स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए. उन्हें लैंगिक संबंधों द्वारा अपने वश में रखना चाहिए, बालपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र उसकी रक्षा करें, स्त्री स्वतंत्र होने के लायक नहीं है.”
– मनुस्मृति (अध्याय 9, 2-3)

मनु के इस संविधान के मुताबिक, सती प्रथा, विधवा केश वपन जैसी परंपराओं ने स्त्रियों को जानवरों से बदतर हालात में जीने के लिए मजबूर कर दिया गया था और उन्हें सच का एहसास ना हो इसलिए उनके पढ़ने लिखने के अधिकार भी छीन लिए गए थे. स्त्री इस गुलामी से बाहर ना निकल सके इसलिए उन्हें अपमानित कर समाज में उनकी प्रतिमा को मलिन किया गया. उनके चरित्र का हनन किया गया.

“पुरुषों को बहकाना स्त्रियों का स्वभाव होता है इसलिए बुद्धिमान स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं. चाहे पुरुष मूर्ख हो या विद्वान उसे काम-क्रोध से वश कर कुमार्ग में ले जाने के लिए स्त्रियां बड़ी समर्थ होती है. माता, बहन या लड़की के साथ भी एकांत में ना बैठें क्योंकि इनकी इंद्रिया इतनी प्रबल होती है कि विद्वान के मन को भी खींच लेती है.”
– मनुस्मृति (अध्याय 2, 213-214-215)

इस तरह के विचारों का 19वीं सदी तक समाज पर गहरा असर था. लेकिन इस गुलामी की पृष्ठभूमि तब दरकने लगी जब राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़े वाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की. सावित्रीबाई ने देश की पहली शिक्षिका बन मनू के काले कानून पर ऐसा तमाचा मारा कि आज मनु के कानूनों से गुलाम बनाई गई स्त्री और शूद्र कहलाने वाला समाज भारत के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से योगदान दे रहे हैं. लगभग 168 साल पहले लड़कियों के लिए पहली स्कूल की शुरुआत करना इतना आसान नहीं था, लेकिन सावित्रीमाई ने अपने पति ज्योतिबा से प्रेरणा लेकर अथक संघर्ष किया और मनु के कानूनों के ठेकेदारों को कड़ी टक्कर देकर भारतीय महिलाओं की मुक्ति का दरवाजा खोला.

सावित्रीबाई फुले 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के नायगांव में जन्मी. 9 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई, ज्योतिराव फुले से हुआ. राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले के प्रेरणादायी साथ ने और उनसे मिली शिक्षा ने सावित्रीआई को महिला और समाज की मुक्ति के लिए लड़ने की प्रेरणा दी. उन्होंने 1 जनवरी 1848 को लड़कियों का पहला स्कूल शुरू किया था. लेकिन यह उस दौर में इतना आसान नहीं था. फुले दंपति के इस काम का ब्राह्मणों ने जमकर विरोध किया जो उस वक्त लड़कियों की शिक्षा के खिलाफ थे.

महज 17 साल की उम्र में सावित्री अपने घर से लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं. तब विरोधी रास्ते में उन्हें परेशान करने की कोशिश करते थे. वे उन्हें गंदी गालियां देकर अपमानित करते थे, कोई अपने घर से पत्थर फेंककर मारता था तो कोई गोबर फेंककर मारता था. लेकिन फिर भी सावित्री इन सबका डटकर मुकाबला करते हुए रोज लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थी.

जब मनु के अनुयायियों को लगा कि सावित्री और ज्योतिबा अब रुकने वाले नहीं है तो उन्होंने ज्योतिबा के पिता गोविंदराव पर यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि आप का लड़का धर्म के खिलाफ काम कर रहा है और इसके लिए आपका सामाजिक बहिष्कार हो सकता है, बहिष्कार के दबाव में गोविंदराव ने ज्योतिबा को पाठशाला बंद करने को कहा. जब वे नहीं माने तो गोविंदराव ने उन्हें घर से निकल जाने के लिए कहा. ज्योतिबा और सावित्रीमाई ने घर छोड़ दिया लेकिन लड़कियों और शूद्रों (आज के ओबीसी, एससी, एसटी) को पढ़ाने का कार्य नहीं छोड़ा. जब इससे भी बात नहीं बनी तो लड़कियों की शिक्षा के विरोधियों ने फुले दंपति की हत्या करने के इरादे से कुछ गुंडो को उनके घर भेजा.

उस वक्त बहुत सारी लड़कियां महज 12-13 की उम्र में विधवा हो जाती थीं. इसके बाद उनका केशवपन कर उन्हें कुरूप बनाया जाता था. ताकि उनकी तरफ कोई पुरुष आकर्षित न हो सके. लेकिन ऐसी विधवा लड़कियां या महिलाएं भ्रष्ट सोच के पुरूषों के लिए आसान शिकार बन जाती थीं. ऐसे में गर्भवती हुई विधवाओं का समाज बहिष्कार कर देता था और उन पर जुल्म किए जाते थे. पैदा होने वाले बच्चे का भी कोई भविष्य नहीं होता था. ऐसे में उस गर्भवती विधवा के सामने सिर्फ दो पर्याय बचते थे. या तो वह उस बच्चे को मार दे या खुद आत्महत्या कर ले.

इस अमानवीय नरसंहार से महिलाओं को बाहर निकालने के लिए ज्योतिबा और सावित्रीमाई ने गर्भवतियों के लिए प्रसूतिग्रह शुरू किया जिसका नाम था “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” जो उन गर्भवती महिलाओं के लिए उनका घर भी था. सावित्रीमाई ने इस घर को पूरी कुशलता और धैर्य के साथ चलाया. वहां के बच्चों को शिक्षा और उज्वल भविष्य दिया. विधवा केशवपन का विरोध करते हुए सावित्रीमाई ने नाइयों की हड़ताल कराई और उन्हें विधवा केशवपन ना करने के लिए प्रेरित किया. आज भी गर्भवती विधवाओं के लिए ऐसे किसी गृह का निर्माण करना साहस का काम है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लगभग 150 साल पहले फुले दंपति का यह कदम कितना साहसिक था.

एक बार ज्योतिबा ने एक गर्भवती महिला को आत्महत्या करने से रोका और उसे वादा किया कि होने वाले बच्चे को वह अपना नाम देंगे. सावीत्रीमाई ने उस महिला का स्वीकार किया और उसे पूरी सहायता दी. कोई भी महिला अपने पति के इस कार्य को शक की नजर से देखकर उस महिला को नकार सकती थी लेकिन सावित्रीमाईने उसे स्वीकारा. बाद में उस महिला से जन्मे बच्चे को सावित्रीमाई और ज्योतिबा ने अपना नाम देकर उसकी परवरिश की उसे पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया.

छुआछूत, जातिवाद जैसी अमानवीय परंपरा को नष्ट करने के लिए अविरत काम करने वाले ज्योतिबा का सावित्रीमाई ने बराबरी से साथ निभाया. अस्पृश्यों को पानी पीने के लिए खुद के घर का जलाशय दे दिया. किसानों, मजदूरों की समस्याओं को लेकर संघर्ष किया.

ज्योतिबा की मौत के बाद सावित्रीमाई ने उनकी चिता को आग लगाई. यह क्रांतिकारी कदम उठाने वाली सावित्री देश की पहली महिला थी. ज्योतिबा की मृत्यु के बाद सावित्रीमाई ने ज्योतिबा के आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया और पूरी कुशलता से उसे निभाया. इसी दौरान उन्होंने “काव्य फुले” और “बावन कशी सुबोध रत्नाकर” नामक ग्रंथों का निर्माण कर समाज का प्रबोधन किया. और वह आधुनिक जगत में मराठी की पहली कवियत्री बनी.

1897 में पुणे में फैले प्लेग के दौरान सावित्रीमाई दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी थी. उन्होंने प्लेग से पीड़ित गरीब बच्चों के लिए कैंप लगाया था. प्लेग से पीड़ित बच्चे पांडुरंग गायकवाड़ को लेकर जब वह जा रही थीं तो उन्हें भी प्लेग ने जकड़ लिया. 10 मार्च 1897 को रात 9 बजे क्रांतिज्योति सावित्रीमाई का देहांत हो गया. जिंदगी के आखिरी पलों तक यह राष्ट्रमाता मानवता को प्रस्थापित करने के लिए लड़ती रही.

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