Submit your post

रोजाना लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

Follow Us

लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार: जब गुंडों की एक सेना ने जाति के नाम पर 60 कत्ल किए

10.61 K
शेयर्स

1 दिसंबर. ठंड थी. तीन नावें पानी पर सरपट भागी जा रही थीं. मल्लाह बंडी-लुंगी में चप्पू चला रहे थे. उन्हें कुहरे और पानी से प्यार था. ठंड नहीं लगती थी. कुछ लोगों ने नाव किराये पर ली थी. शॉल लपेटे थे. सिर्फ आंखें दिखाई दे रही थीं. पानी के ऊपर सन्नाटे को उनकी खामोशी और बढ़ा दे रही थी. आपस में इशारों में बात कर लेते. मल्लाहों को इससे मतलब नहीं था. वो अपना काम कर रहे थे. पर कुछ अन्कम्फर्टेबल सा माहौल बन गया था. नाव किनारे पर लगी. लोग उतरे. मल्लाहों को कुछ अंदेशा हो गया था. उन्होंने पैसे नहीं मांगे. तुरंत नाव घुमाने लगे. पर घुमा नहीं पाये.

क्योंकि उतरने वाले लोगों ने अपनी शॉल उतारी. ये कुल 100 लोग थे. इनके हाथ में गुप्ती, तलवार और बंदूकें लहरा रही थीं. मल्लाह रो पड़े. उन्होंने क्या किया था. मेहनत कर के थोड़ा कमाते हैं. फिर भी जो लेना है, ले लो. पर उस सन्नाटे में उनके गले से आवाज भी नहीं निकली. जब मौत निश्चित हो जाती है, तो रोने से तो होता नहीं. उनको काट दिया गया.

मारने वाले लोग रणवीर सेना के थे. साल 1997 था. राबड़ी देवी की सरकार थी. राज्य बिहार था. उस वक्त पटना, जहानाबाद, अरवल, गया और भोजपुर को लाल इलाका कहा जाता था क्योंकि भाकपा-माले की जमीन थी ये. जाति व्यवस्था से मारे लोगों का संगठन था ये, जो अपना अधिकार लड़ के लेना चाह रहे थे. क्योंकि सरकारें सुस्त थीं और भूमिहार जमींदार कहते कि ये तो हमारा पैतृक अधिकार है. हम क्यों बांटें. कोई उद्योग नहीं लग रहा था कि भूमिहीन अपने बच्चों को वहां भेजते. जब दिल्ली सरकार एटम बम फोड़ने की तैयारी कर रही थी, उस वक्त बिहार में खेत और जमीन से ऊपर कोई सोच नहीं पा रहा था. चाह के भी. क्योंकि उससे बाहर कुछ दिखता नहीं था.

नाव से उतरने वाले लोग सिर्फ मल्लाहों को मारने नहीं आए थे. वो तो यूं ही मार दिये गये थे. टारगेट था लक्ष्मणपुर-बाथे गांव. गांव कहा जाता था, पर सच ये है कि गांव भूमिहारों के होते थे. ये डेरे थे. कब उखड़ जाएं, नहीं पता. क्योंकि पक्के मकान नहीं थे. खेती नहीं थी. दूसरों के यहां काम कर के गुजारा होता था. ऐसा नहीं था कि योग्यता नहीं थी. काम नहीं था. योग्यता थी, क्योंकि इन लोगों ने भी वो करना शुरू कर दिया था जो भूमिहार करते थे. बंदूकें और गोलियां. इसमें ये भी उतने ही पारंगत थे. ये साबित करने के लिये था कि जो तुम कर सकते हो, हम भी कर सकते हैं. हमें बढ़ने दो. इन्होंने भाकपा-माले बना लिया था. और इन्हें अपने नीचे रखने के लिए रणवीर सेना बना ली गई थी. सितंबर 1994 में. पर इस गांव के लोगों के पास थोड़ी हथियार था. इन्हें तो बस ये लग रहा था कि हमारे समाज के कुछ लोग कुछ कर रहे हैं. यही इनकी गलती थी रणवीर सेना की नजरों में.

शॉल वाले फिर गांव में पहुंचे. देखते ही भगदड़ मच गई. पर भाग के जाते कहां. 60 लोगों को गोली मार दी गई. 27 औरतें और 10 बच्चे मरे थे. उनमें तीन साल का भी एक बच्चा था. 10 औरतें गर्भवती थीं. तीन घंटे तक गोली चली. ये सोन नदी का किनारा था. उस दिन यहां कई परिवारों के सारे लोग मार दिये गये थे. कहीं एक बूढ़ा बचा था, कहीं एक बच्चा. कहीं एक औरत. शॉल ओढ़कर फिर वो लोग जाति की भीड़ में कहीं गुम हो गये. कहीं कोई पता नहीं, कि कौन था.

अगले दिन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने इस घटना को राष्ट्रीय शर्म कहा था. नारायणन उन जातियों के लिए मिसाल थे जिन्हें पिछड़ा कहा जाता था. वो इन्हीं समुदायों से थे और साबित करते थे कि मौका मिलने पर हर कोई कुछ भी कर सकता है.

दो दिन तक लोग लाशें रखकर न्याय की दुहाई देते रहे. मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने दौरा किया. 3 दिसंबर को अंतिम संस्कार हुआ. लाशें ट्रैक्टर में भरकर ले जाई गई थीं. लोग कहते थे कि लोग तो रो ही रहे थे, जानवर भी रो रहे थे. ये अतिशयोक्ति नहीं थी. जो गाय-भैंस पालते हैं, उन्हें अच्छे से पता होगा कि ये होता है.

मारे गये लोगों में से किसी की शादी दस दिन पहले हुई थी. किसी का छह महीने का बच्चा था. कोई गांव आया था. कोई औरत ससुराल से भागी अपने मायके आई और फिर अपने पति के पास वापस नहीं गई. एक सेंकंड में फैसला लिया गया था. क्योंकि भतीजे-भतीजियों का कोई नहीं था. ना जाने कितने परिवार टूटे थे. जाति को लेकर किया गया ये कांड आजाद भारत के मुंह पर वो तमाचा था जो सदियों बाद गूंजेगा. देश की संस्थाएं अपने लोगों को ही शर्मिंदा करती रही हैं.

लोगों को नौकरियों और मुआवजे का वादा हुआ. लोग एड़ियां रगड़ते रहे. पर सरकार ने वादा ही तो किया था. ये थोड़ी कहा था कि दे रहे हैं. लोग दौड़ते रहे. कुछ नहीं मिला.


इस मामले में कुल 46 लोगों को आरोपी बनाया गया था. इनमें से 19 लोगों को निचली अदालत ने ही बरी कर दिया था जबकि एक व्यक्ति सरकारी गवाह बन गया था. पटना की एक अदालत ने अप्रैल 2010 में 16 दोषियों को मौत की सजा सुनाई और 10 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. ज़िला और सत्र न्यायधीश विजय प्रकाश मिश्रा ने कहा था कि ये घटना समाज के चरित्र पर धब्बा है.

2013 में सभी 26 अभियुक्तों को पटना की हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया.

एक स्टिंग ऑपरेशन में कोबरापोस्ट के कैमरों पर लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार के आरोपियों ने कहा था कि पूर्व प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर की मदद से उन्हें हथियार मिले थे और पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने उनकी राजनीतिक और आर्थिक मदद की थी.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने की थी.


कहानी सेनारी हत्याकांड की: खून के बदले खून, जाति के बदले जाति

कहानी शहाबुद्दीन की जिसने दो भाइयों को तेजाब से नहला दिया था

ये भी देखें:

 

लल्लनटॉप न्यूज चिट्ठी पाने के लिए अपना ईमेल आईडी बताएं !

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें
1 december 1997 when ranvir sena killed over 60 people in laxmanpur-bathe in caste feud

गंदी बात

#MeToo मूवमेंट इतिहास की सबसे बढ़िया चीज है, मगर इसके कानूनी मायने क्या हैं?

अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में समाज की आंखों में आंखें डालकर कहा जा रहा है, ये देखना सुखद है.

तनुश्री-नाना मसले पर अमिताभ बच्चन ने ये बात कहकर अपना दोहरापन साबित कर दिया

'पिंक'? वो तो बस फिल्म थी दोस्तों.

इंटरनेट ऐड्स में 'प्लस साइज़' मॉडल्स को देखने से फूहड़ नजारा कोई नहीं होता

ये नजारा इसलिए भद्दा नहीं है क्योंकि मॉडल्स मोटी होती हैं...

लेस्बियन पॉर्न देख जो आनंद लेते हैं, उन्हें 377 पर कोर्ट के फैसले से ऐतराज है

म्याऊं: संस्कृति के रखवालों के नाम संदेश.

कोर्ट के फैसले को हमें ऑपरा सुनते एंड्र्यू के कमरे तक ले जाना है

साढ़े 4 मिनट का ये सीक्वेंस आपके अंदर बसे होमोफ़ोबिया को मार सकता है.

राधिका आप्टे से प्रोड्यसूर ने पूछा 'हीरो के साथ सो लेंगी' और उन्होंने घुमाके दिया ये जवाब!

'बर्थडे गर्ल' राधिका अपनी पीढ़ी की सबसे ब्रेव एक्ट्रेसेज़ में से हैं.

'स्त्री': एक आकर्षक वेश्या जो पुरुषों को नग्न तो करती थी मगर उनका रेप नहीं करती

म्याऊं: क्यों 'स्त्री' एक ज़रूरी फिल्म है.

भारत के LGBTQ समुदाय को धारा 377 से नहीं, इसके सिर्फ़ एक शब्द से दिक्कत होनी चाहिए

सबकी फिंगर क्रॉस्ड हैं, सुप्रीमकोर्ट का एक फैसला शायद सब-कुछ बदल दे!

'पीरियड का खून बहाती' देवी से नहीं, मुझे उसे पूजने वालों से एक दिक्कत है

चार दिन का ये फेस्टिवल असम में आज से शुरू हो गया है.

सौरभ से सवाल

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.

ऑफिस के ड्युअल फेस लोगों के साथ कैसे मैनेज करें?

पर ध्यान रहे. आप इस केस को कैसे हैंडल कर रहे हैं, ये दफ्तर में किसी को पता न चले.