एक कविता रोज: 'वो मालिकों का दिल लुभाने वाली तितलियां थीं'
यतींद्र मिश्र के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी कविता 'नौटंकीवालियां'.
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फोटो - thelallantop
यतींद्र मिश्र सिनेमा, कला और संगीत पर खूब लिखते हैं. ढेरों किताबों का संपादन किया है. लेकिन उसके अलावा लिखते हैं कविताएं. आज उनका जन्मदिन है. पढ़िए उनकी कविता 'नौटंकीवालियां'. नौटंकीवालियां-उन्हें लौंडियाँ कहा जाता थाऔर उनके फन को नौटंकी तमाशापता नहीं उनका हुनरयाद रखने लायक था या भूलने लायकमगर उनके अफसाने बिकते थे बाज़ारों मेंपटना, कोल्हापुर, बनारस, सांगली,मिरज, चिलबिला और कानपुर को छोड़करउनके मुहब्बत की सड़कजुगुनुओं से भरी साँझ से होकर गुज़रती थीवे रईसजादों की पनीली आँखों से डरकरशोहदों की नींदों में गिर पड़ती थीं अकसरपुराने साजों पर उतरे हुए सुर की तरह जवानी थी उनकीइधर बाजा कसा जाता थाउधर उनके मासूम चेहरों पर परीजाद चेहरामंच पर अकसर मिलने वाले उनके शैदाईअपने फेफड़ों में दम भरकर पूछते थे‘डार्लिंग सोडा पियोगी या लैमन?’और वे हँसकर अपने पुरातन प्रेमियों को दुलारतीं‘राजा! एक फूल ले लो’पता नहीं उन नाटकों के प्रेमीउनसे कितना प्रेम करते थे और कितना डरते थेया उनके अफसानों की गिरफ्त में पड़करसचमुच का प्रेम करने लगते थेवे नौटंकीवालियाँ थींअपने पारसी मालिकों का दिल लुभाने वालीतितलियाँ थीं वेवे फूल थीं बेले की लतर और प्रेम भरे अफसानों की हूरेंऔर कुछ लोग उन्हेंग़ज़लों की बुलबुलें मानते थेवे पहली बार किसी भी शहर को अपनी आँखों से नहींलोगों की हवस भरी निगाहों से देखती थींऔर उन रंग-बिरंगे तंग बाज़ारों के मिज़ाज़ से भीजहाँ तारों की तरह टिमटिम करतीबिकती थीं बिन्दी चूड़ियाँ सुरमा और परान्देवे नौटंकीवालियाँ लगभग पिछली आधी सदी तकहमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में मौजूद थींलगभग पिछली पूरी सदी बीत जाने के बाद वे नौटंकीवालियाँआज भी जीवित हैं हमारी स्मृतियों मेंवे जब तक थीं तब तक उनके अन्दरप्रेम की धधकती गुफा मेंरिसता रहता था जमाने भर का बटोरा संत्रासऔर बाहर चमकता रहता था उनका गाढ़ा दुःखइन्द्रधनुष के सतरंगे वितान की तरहआज जब वे नहीं हैंतब यह अन्दाजा लगाना बड़ा मुश्किल हैपटना, कोल्हापुर, बनारस, सांगलीमिरज, चिलबिला और कानपुर को छोड़करकोई और शहर भी शायद ही होगाजो उनके काढ़े की तरह गाढ़े आँसुओं कोअपने दुःख से साझा करके याद करता होगा. ***