निर्मला पुतुल एक जाना-माना नाम है, कविता के साथ-साथ सोशल वर्क के लिए भी. निर्मलाझारखंड से आती हैं, और वहां के आदिवासियों की समस्याएं इनके लेखन में दिखती हैं.विस्थापन, पलायन, उत्पीड़न और जेंडर की समस्याएं इनकी कविताओं में खूब दिखाई पड़तीहैं. आज पढ़िए इनकी एक कविता.-------------------------------------------------------------------------------- बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहां मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियांबेचनी पड़ें तुम्हें मत ब्याहना उस देश में जहाँ आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते होंजंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहां वहाँ मत कर आना मेरा लगन वहाँ तो कतई नही जहाँ कीसड़कों पर मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ ऊँचे-ऊँचे मकान औरदुकानें हों बड़ी-बड़ी उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता जिस घर में बड़ा-सा खुलाआँगन न हो मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह और शाम पिछवाडे से जहाँ पहाड़ी परडूबता सूरज ना दिखे मत चुनना ऐसा वर जो पोचाई और हंडिया में डूबा रहता हो अक्सरकाहिल निकम्मा हो माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में ऐसा वर मत चुनना मेरीख़ातिर कोई थारी लोटा तो नहीं कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी अच्छा-ख़राब होने परजो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी जब चाहे चला जाएबंगाल, आसाम, कश्मीर ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथजिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने जिन हाथों नेनहीं दिया कभी किसी का साथ किसी का बोझ नही उठाया और तो और जो हाथ लिखना नहीं जानताहो "ह" से हाथ उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ ब्याहना तो वहाँ ब्याहना जहाँसुबह जाकर शाम को लौट सको पैदल मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट तो उस घाट नदी मेंस्नान करते तुम सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप... महुआ का लट और खजूर का गुड़ बनाकरभेज सकूँ सन्देश तुम्हारी ख़ातिर उधर से आते-जाते किसी के हाथ भेज सकूँकद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी, समय-समय पर गोगो के लिए भी मेला हाट जाते-जाते मिलसके कोई अपना जो बता सके घर-गाँव का हाल-चाल चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर दे सकेजो कोई उधर से गुजरते ऐसी जगह में ब्याहना मुझे उस देश ब्याहना जहाँ ईश्वर कम आदमीज़्यादा रहते हों बकरी और शेर एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ वहीं ब्याहना मुझे! उसीके संग ब्याहना जो कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह रहे हरदम साथ घर-बाहर खेतोंमें काम करने से लेकर रात सुख-दुःख बाँटने तक चुनना वर ऐसा जो बजाता हों बाँसुरीसुरीली और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़ मेरेजूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल जिससे खाया नहीं जाए मेरे भूखे रहने पर उसी से ब्याहनामुझे. *** (ज्ञानपीठ प्रकाशन से साभार)--------------------------------------------------------------------------------अगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें. तो अपनी कविता/कहानीटाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तोछापेंगे.-------------------------------------------------------------------------------- 'एक कविता रोज' की दूसरी कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज' टैग परक्लिक करिए.