स्वप्न में लगी चोट का उपचार नींद के बाहर खोजना चूक है होना तो यह था कि तुम अपनेदिल की एक नस निकालते और बांध देते मेरी लहूलुहान उंगली पर मेरी हंसली पर जमा पानीउलीचते और रख देते वहां धूप मुट्ठी भर हुआ यह कि जिन पर्वतों पर मैंने तुम्हारा नामउकेरा वहां से बह निकलीं कल कल करती नदियां और मेरी गर्दन से जा चिपकी काग़ज़ की एकनाव क्षितिज तक पैदल चली थी थाम कर तुम्हारी उंगली उस दिन तुम्हारा क़द मेरे पिताजितना बढ़ गया था उसी रात नदी में अपनी पतवारें फेंक आई थी--------------------------------------------------------------------------------ईश्वर की प्रिय सन्तान हो छुटपन से ही मां मुझसे कहती आई हैं होना तो यह था कि कबाड़में मिले उस दीपक को धरती पर घिसते ही धुएं के पीछे से प्रकट हो जाता कोई देवदूत औरमेरे आदेश का दास बन जाता हुआ यह कि पत्थर पर रगड़ खाने से कांसे की देह पीड़ा सेकराह उठी ऐन उसी दिन कान के पीछे उभर आई एक हरी बेल कोई रंग होता 'माइग्रेन' का तोहरा ही होता--------------------------------------------------------------------------------कितना अच्छा लगता था दीवारों पर लिखना और पौधों को पानी देना होना तो यह था कितुम्हारी पीठ पर नक़्क़ाशीदार आयतें लिखा करती हमेशा और छाती को सींचती ही रहती उम्रभर हुआ यह कि छठी की चांद रातों में मैंने उगाए जूठे सेब तुम्हारी छाती पर औरतुम्हारी पीठ से टकरा टकरा कर लौटती रहीं मेरी चीख़ें उन दिनों जंगल टेसू की तरहदहका करते थे मैं तुम्हारे पांव के अंगूठे पर टोटके बांधा करती थी एक बार उतरने दोमेरी चीख़ अपनी छाती पर किसी बरगद के कान पर उसी दिन मैं कान के पीछे वाली नस कीअसह्य पीड़ा का विसर्जन कर दूंगी--------------------------------------------------------------------------------एक अरसा गुज़रा जब डॉक्टर ने 'मायोपिया' से लेकर इथियोपिया तक की बातें कीं औरआंखों पर ऐनक चढ़वा दी होना तो यह था कि उन ग्लासेज़ को पहन कर अब तक मुझे दूर कादिखने लगना था पर हुआ यह कि ये चश्मा भी मेरे किसी काम का न निकला. पहले तो रास्तेही नहीं दिखते थे और अब बड़े-बड़े गड्ढे और जानलेवा मोड़ भी नज़र नहीं आते.--------------------------------------------------------------------------------होना तो यह था कि तुम होते बरगद का घनापन और मैं तुम्हारी शाख़ों पर फुदकती फिरतीअपनी टुकुर-टुकुर आंखों में भर लेती सब हरियाली कभी पत्तों में छुपती कभी दिखती तनेके पीछे सारी छांव घूंट-घूंट पी लेती हुआ यह कि तमीज़ भूल गया एक बरगद अपने बरगदहोने की छांव, हरियाली, ठौर कुछ भी नहीं मिलता धूप धूप भटकता रहा प्रेम भूखे कौरकौर दिल कुतरता रहा--------------------------------------------------------------------------------कल आपने पढ़ी थी, 'साला बिहारी, चोर, चीलड़, पॉकेटमार' अगर आप भी कविता/कहानी लिखतेहैं, और चाहते हैं हम उसे छापें. तो अपनी कविता/कहानी टाइप करिए, और फटाफट भेजदीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तो छापेंगे.