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एक कविता रोज: नागराज मंजुले की कविताएं

'मेरे हाथ में लेखनी न होती, तो होती बांसुरी या कूची'

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फोटो - thelallantop
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प्रतीक्षा पीपी
9 जून 2016 (अपडेटेड: 9 जून 2016, 03:03 PM IST)
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नागराज मंजुले मराठी कवि और फ़िल्मकार हैं. इन्हें इनकी फिल्में फंड्री और हाल ही में रिलीज हुई 'सैराट' के लिए सबसे ज्यादा जाना गया. 'उन्हाच्या कटाविरुध' नाम का कविता संग्रह है इनका. एक कविता रोज में पढ़िए इनकी कुछ कविताएं.
 
teekam
इन कविताओं का मराठी से हिंदी अनुवाद किया है टीकम शेखावत ने. टीकम टाइम्स ऑफ़ इंडिया, पुणे के ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट में डिप्टी चीफ मैनेजर हैं. इसके अलावा कवि और ट्रांसलेटर हैं. उनका ये अनुवाद एक पॉपुलर साहित्यिक वेबसाइट समालोचना पर पर प्रकाशित हुआ था. इसके संपादक है श्री अरुण देव. उन्होंने और टीकम ने हमें इन कविताओं को पोस्ट करने की इजाजत दी, उसके लिए शुक्रिया दोनों का. 
   

1.

धूप की साज़िश के खिलाफ़

इस सनातन बेवफ़ा धूप से घबराकर क्यों हो जाती हो तुम एक सुरक्षित खिड़की की सुशोभित बोन्साई! और बेबसी से, मांगती हो छाया. इस अनैतिक संस्कृति में नैतिक होने की हठ की खातिर क्यों दे रही हो एक आकाशमयी मनस्वी विस्तार को पूर्ण विराम तुम क्यों खिल नहीं जाती आवेश से गुलमोहर की तरह धूप की साज़िश के ख़िलाफ़.
 

2.

दोस्त

एक ही स्वभाव के हम दो दोस्त एक दूसरे के अजीज़ एक ही ध्येय एक ही स्वप्न लेकर जीने वाले कालांतर में उसने आत्महत्या की और मैंने कविता लिखी.
 

3.

मेरे हाथो में न होती लेखनी

मेरे हाथो में न होती लेखनी तो तो होती छीनी सितार, बांसुरी या फ़िर कूची मैं किसी भी ज़रिये उलीच रहा होता मन के भीतर का लबालब कोलाहल
 

4.

‘क’ और ‘ख’

क. इश्तिहार में देने के लिए खो गये व्यक्ति की घर पर नहीं होती एक भी ढंग की तस्वीर. ख. जिनकी घर पर एक भी ढंग की तस्वीर नहीं होती ऐसे ही लोग अक्सर खो जाते हैं.
 

5.

जनगणना के लिए

जनगणना के लिए ‘स्त्री / पुरुष’ ऐसे वर्गीकरण युक्त कागज़ लेकर हम घूमते रहे गाँव भर और गाँव के एक असामान्य से मोड़ पर मिला चार हिजड़ो का एक घर
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