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'अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे'

आज एक कविता रोज़ में पढ़िए धर्मवीर भारती का एक प्रेम-गीत.

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4 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 4 सितंबर 2017, 06:39 AM IST)
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प्रिय पाठको, आज एक कविता रोज़ में धर्मवीर भारती (25 दिसंबर 1926 – 4 सितंबर 1997). प्यार और रोमांस को अपने लिखे की केंद्रीय थीम बनाने वाले धर्मवीर भारती ने ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ जैसे उपन्यासों के साथ-साथ ‘अंधा युग’ जैसा नाटक भी लिखा. राधा-कृष्ण के प्रेम पर उन्होंने ‘कनुप्रिया’ जैसी लंबी कविता लिखी, तो साथ-साथ अपनी तमाम कविताओं और कहानियों में भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की मूल्यहीनता को अभिव्यक्त करने से भी नहीं चूके. उनके लिखे पत्र भी बहुत यादगार माने जाते हैं. ‘देशांतर’ जैसी किताब में उन्होंने अपने अनुवाद-कार्य के जरिए हिंदी कविता को विश्व कविता से वाकिफ कराया. ‘धर्मयुग’ के संपादन के लिए भी चर्चित धर्मवीर भारती जीवन भर जीवन के विविध आयामों को विविध विधाओं में अभिव्यक्त करते रहे. कहना मुश्किल है कि वह बड़े कवि थे या बड़े कथाकार या बड़े निबंधकार या बड़े संपादक.
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अब पढ़िए धर्मवीर भारती का एक बहुत लोकप्रिय प्रेम-गीत

अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे, अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे, महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो? महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो? तुम्हारा मन अगर सींचूं, गुलाबी तन अगर सींचूं, तरल मलयज झकोरों से तुम्हारा चित्र खींचूं प्यास के रंगीन डोरों से कली-सा तन, किरण-सा मन, शिथिल सतरंगिया आंचल, उसी में खिल पड़े यदि भूल से कुछ होंठ के पाटल, किसी के होंठ पर झुक जाएं कच्चे नैन के बादल, महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो? महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो? किसी की गोद में सिर धर, घटा घनघोर बिखरा कर, अगर विश्वास सो जाए धड़कते वक्ष पर, मेरा अगर अस्तित्व खो जाए न हो यह वासना, तो जिंदगी की माप कैसे हो किसी के रूप का सम्मान, मुझको पाप कैसे हो? नसों का रेशमी तूफान, मुझको पाप कैसे हो? अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे, अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे, किसी की सांस में चुन दूं, किसी के होंठ पर बुन दूं, अगर अंगूर की परतें, प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें यहां तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडंडियां घूमीं अगर मैंने किसी की मद भरी अंगड़ाइयां चूमीं, अगर मैंने किसी की सांस की पुरवाइयां चूमीं, महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो? महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो? *

धर्मवीर भारती कृत ‘अंधा युग’ का एक अंश उनकी संगिनी पुष्पा भारती की आवाज में यहां सुनें :

https://www.youtube.com/watch?v=Y79rUvGRXU8 धर्मवीर भारती की एक और कविता यहां पढ़िए :

टूटा पहिया


इनके बारे में भी पढ़ें : बच्चन भवानी प्रसाद मिश्र अज्ञेय जयशंकर प्रसाद घनानंद

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