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'एक नन्हा खरगोश लू की बौछार में हांफते-हांफते थक जाएगा'

आज विश्व पर्यावरण दिवस है. पढ़िए त्रिभुवन की कविता 'अरावली के आखिरी दिन'

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5 जून 2018 (अपडेटेड: 5 जून 2018, 10:00 AM IST)
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आज विश्व पर्यावरण दिवस है (5 जून 2018). तकनीक और बाज़ार के मकड़जाल में उलझा आदमी अपने आसपास से, अपने पर्यावरण से, प्रकृति से पूरी तरह बेख़बर है. इस बेख़बरी के परिणामों से भी बेख़बर है वो. पढ़िए त्रिभुवन की ये कविता और सोचिए कैसा उजाड़ हो सकता है हमारा और हमारी पृथ्वी का भविष्य.

अरावली के आखिरी दिन

अरावली के आखिरी दिन एक मधुमक्खी परागकणों के साथ उड़ते-उड़ते थक जाएगी. सभी बहेलिए जाल को देखकर उलझन में पड़ जाएंगे. एक नन्हा खरगोश लू की बौछार में हांफते-हांफते थक जाएगा. चेतना आकुलित बघेरे कहीं नहीं दिखेंगे इस निरीह-निर्वसन धरती पर. अरावली के आखिरी दिन युवतियां छाता लेकर सैर करने जाएंगी और लॉन में टहलकर लौट आएंगी. एक शराबी चंद्रमा की रोशनी में बहेलिए बस्तियों की ओर लौटते नजर आएंगे. कुछ पीले चेहरे सब्जियों के ठेले लेकर मुहल्लों में रेंगते हुए आवाजें देंगे. बिना तारों वाली सघन अंधेरी रात में रावण-हत्थे की आवाज के साथ तैरेगी बच रह गए एक गीदड़ की टीस. और जिन्हें नीले नभ में बिजलियां चमकने, बादल गरजने और वर्षा की बूंदों का इंतजार है, सूखे काले अंधेरे में आंख मिचमिचाते और कानों में कनिष्ठिकाएं हिलाते थक जाएंगे. और जिन्हें किताबें पढऩे का शौक होगा, शब्दकोश में सांप का अर्थ ढूंढक़र अपने बच्चों को कालबेलिया जोगियों की कथा सुनाएंगे और सुनहरे केंचुल ओढ़े कोई देवता सितारों की ओट में धरती को भरी आंख से निर्निमेष निहारेगा. हालांकि बात ऐसी है अरावली की कोई एक तस्वीर देखकर सूरज और चांद के नीचे सुन नहीं पाता कोई कभी खत्म न होने वाली बिलख, जो हर इमारत की नींव तले दबी फूटती रहती है. बड़ी आलीशान इमारतों में खिलते रहते हैं खूबसूरत गुलाबों जैसे नन्हे शिशु और इसीलिए किसी को विश्वास नहीं होता कि अरावली के आखिरी दिन अरावली ऐसी होगी? अरावली के आखिरी दिन ऐसा जरूर होगा एक अवतारी पुरुष आएंगे एक नबी पुकारेगा लेकिन बात ऐसी है कि वे दोनों आईफोन पर व्यस्त होंगे उन्हें न धनिए, न हरी मिर्च, न मेथी, न आलू, न टमाटर, न जीरे और न हरे चने की जरूरत होगी, क्योंकि उनके बैग में मैक्डॉनल्ड के बर्गर, मैकपफ और सालसा रैप होंगे. अरावली का इसके अलावा यहां और क्या अंत होगा? अरावली का इसके अलावा वहां और क्या अंत होगा?
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‘पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं’

‘ठोकर दे कह युग – चलता चल, युग के सर चढ़ तू चलता चल’

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‘दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में, अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे’


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एक कविता रोज़: 'प्रेम में बचकानापन बचा रहे'

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