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'मैं किले को जीतना नहीं, उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं'

पढ़िए नरेश सक्सेना की 4 छोटी कविताएं.

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17 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 17 जनवरी 2020, 07:33 AM IST)
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‘पुल पार करने से/ पुल पार होता है/ नदी पार नहीं होती’ यह कहने वाले नरेश सक्सेना की काव्य-संक्षिप्ति में अर्थ-बहुलता का जो वैभव है, वह शब्दों को मूल्यवान बनाता है और इसलिए जब कोई इस वैभव की व्याख्या करने का प्रयास करता है, यह विवश करता है चुप होने को. 16 जनवरी को नरेश सक्सेना जन्मदिन होता है.आज 'एक कविता रोज़' में हम आपको पढ़वाते हैं नरेश सक्सेना की लिखी 4 कविताएं. ये कविताएं जितनी छोटी हैं, इनकी गहराई उतनी ही ज्यादा. शुरू होते ही खत्म होती ये कविताएं, दरअसल खत्म होने के बाद शुरू होती हैं. मन के ठीक भीतर. पढ़िए नरेश सक्सेना की कविताएं..
1. दीमकें

दीमकों को पढ़ना नहीं आता

वे चाट जाती हैं पूरी क़िताब

2. सीढ़ी

मुझे एक सीढ़ी की तलाश है सीढ़ी दीवार पर चढ़ने के लिए नहीं बल्कि नींव में उतरने के लिए मैं किले को जीतना नहीं उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं

3. दरार

ख़त्म हुआ ईंटों के जोड़ों का तनाव प्लास्टर पर उभर आई हल्की-सी मुस्कान दौड़ी-दौड़ी चीटियां ले आईं अपना अन्न-जल फूटने लगे अंकुर जहां था तनाव वहां होने लगा उत्सव हंसी हंसी

हंसते-हंसते दोहरी हुई जाती है दीवार

4. अच्छे बच्चे

कुछ बच्चे बहुत अच्छे होते हैं वे गेंद और ग़ुब्बारे नहीं मांगते मिठाई नहीं मांगते ज़िद नहीं करते और मचलते तो हैं ही नहीं

बड़ों का कहना मानते हैं वे छोटों का भी कहना मानते हैं इतने अच्छे होते हैं

इतने अच्छे बच्चों की तलाश में रहते हैं हम और मिलते ही उन्हें ले आते हैं घर अक्सर तीस रुपये महीने और खाने पर.


वीडियो- एक कविता रोज़: दर्पण साह की बिना शीर्षक वाली कविता

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