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ब्लॉगः नौकरीपेशा औरतों पर बेतुकी बात लिखते हुए ये बातें भूल गईं मैत्रेयी पुष्पा!

आज हम बात नहीं करेंगे उनके साहित्य पर कि उन्होंने क्या लिखा, कैसा लिखा. पर ये ज़रूर बताएंगे कि वो महिलाओं की, खासकर ग्रामीण महिलाओं की प्रतिनिधि होने का दावा करती हैं. ये भी बताएंगे कि फेसबुक पर उनके साढ़े 19 हज़ार फॉलोअर्स हैं. और आखिर में हम बताएंगे कि कैसे उन्होंने महिला हितैषी होने का स्वांग रचकर एक महिला को दूसरी महिला के खिलाफ खड़ी करने की कोशिश की. कैसे उन्होंने उन तमाम महिलाओं को नीचा दिखाया जो रोज़ दफ्तर जाती हैं, अपने और परिवार के खर्च के लिए कुछ पैसे कमाती हैं.

हम मैत्रेयी पुष्पा की बात कर रहे हैं. फेसबुक पर एक पोस्ट में वो लिखती हैं कि वो किसान की बेटी हैं. और उन्हें पता है कि खेत में फसल के साथ खरपतवार जब उग आते हैं तो उन्हें उखाड़कर फेंक देना चाहिए. पर किसान की इन बेटी को शायद ये नहीं पता कि नौकरी पर जाने वाली औरतें सिर्फ दफ्तर नहीं जातीं. वो खेतों में भी जाती हैं, उन सड़कों के निर्माण में औरतों का भी पसीना बहा है जिनमें अब फर्राटे से कारें दौड़ती हैं. वो कंस्ट्रक्शन साइट्स और फैक्ट्रियों में भी काम करती हैं. ईंट के भट्ठों में जलती हैं. वो घरेलू सहायिकाएं भी होती हैं.

पता होता तो वो नौकरी पर जाने वाली औरतों को नीचा दिखाती हुई पोस्ट नहीं लिखतीं. उन्होंने लिखा,

नौकरी वाली स्त्रियों , तुम्हारा दावा है कि तुम दोगुना काम करती हो. घर में खटती हो और फिर वर्क प्लेस पर मेहनत में कमी नहीं छोड़तीं. लेकिन बहनों अपने शहीद रूप के लिये दुखी मत होना क्योंकि तुम खटती हो या खपती हो तो सिर्फ़ अपने लिये. अब तुम घर चलाने का आर्थिक बहाना मत लेना क्योंकि घर तो उनके भी चलते हैं जहां स्त्रियां नौकरी नहीं करतीं. यह भी तो सोचो तुम जब सुबह सबेरे लकदक कपड़ों में सजी गुड़िया सी जा रही होती हो, तो सारा दिन घर की ही सार सम्भाल करने वाली औरत देख रही होती है हसरत भरी निगाहों से. जानती हो तुम कि सबको नौकरी नहीं मिलती. सब सुबह सबेरे तैयार नहीं होतीं. वे अपने सबेरे के नहाने धोने को टालकर ऑफिस या स्कूल कॉलेज जाने वालों के लिये लंच पैक कर रही होती हैं. वे घर के सदस्यों की ज़रूरतों के लिये दौड़ रही होती हैं और उनको घर के लोग अपने कामों के लिये ही मान लेते हैं. अत: उनके यहां ज़्यादातर मेड नहीं होतीं तो वे ही कपड़े धोती हैं, घर द्वार बुहारती हैं और वे इसी में सकून ढूंढ लेतीं हैं कि गृहणियों के घर-घर होते हैं, गेस्टहाउस नहीं. वे तुम्हारी सम्माजनक पगार की एवज़ अपने किये कामों से हुयी बचत से मुक़ाबला करने लगती हैं और निश्चित ही अपनी बचत को ज़्यादा मूल्यवान मान लेती हैं. अपने-अपने जीने का तरीक़ा है. अपने-अपने धैर्य और संतोष का सलीका है. बस इतना ही है कि स्त्री हर हालत में सुख और ख़ुशी ढूंढ लेती है और अपने घर की सलामती चाहती है.

इस पूरे पोस्ट में दिखती है हिकारत. नौकरी पर जाने वाली औरतों के लिए. उनके काम को, उनकी मेहनत को शौकिया और सेल्फिश बताकर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश दिखती है. हम बिंदुवार उनकी बात का जवाब दिए देते हैं.

# अब हर व्यक्ति आपके जितना कलात्मक नहीं होता कि घर में रहकर ही किताब लिख ले. इससे लिखने का शौक भी पूरा हो जाए, पैसा और नाम भी आ जाएं और ‘नौकरीपेशा’ होने का टैग भी न लगे. पर क्या आपका सफर इतना ही आसान रहा होगा? शायद नहीं. जैसे आप अच्छा लिखती हैं, वैसे ही दूसरी औरतें दूसरी चीज़ों में बेहतर होती हैं. और उन्हीं फील्ड्स में अपना करियर बनाने के लिए घर से निकलती हैं, नौकरी करती हैं, काम की जगह पर खूब मेहनत करती हैं. मिलने वाले पैसों से अपना और अपने घर का खर्च उठाती हैं. वहीं, कुछ औरतें ऐसी भी होती हैं जिन्हें बचपन में पढ़ाई करने या करियर के बारे में सोचने की आज़ादी नहीं मिली. पर ये औरतें भी नौकरी पर जाती हैं, ताकि घर के खर्चे में अपना हाथ बंटा सकें.

Working Woman
इस तस्वीर में दिख रहे हैं चाय के बागान. और दिख रही हैं वहां काम करने वाली महिलाएं. ये कामकाज़ी महिलाओं की तस्वीर है. फोटो- Pixabay

# घर तो वो भी चलते हैं जहां स्त्रियां नौकरी नहीं करतीं! चलते हैं, सदियों से चलते रहे हैं. तो क्या सभी को अपने घरों में काम पर आने वाली दीदियों को निकाल देना चाहिए. ये कहकर कि दीदी, आपका घर तो वैसे भी चलता है. झाड़ू-पोछे का इतना शौक है तो अपने घर पर लगाओ. या उन तमाम महिला स्वास्थ्य कर्मियों को घर पर बैठा दिया जाए जो देश की हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर का बीड़ा उठाए हुए हैं. नर्सेज़, मिडवाइव्स वगैरह को देखें, 83.4 फीसद हेल्थ वर्कर्स औरतें हैं इस देश की. वैसे गाड़ी, दो पहिया वाला लॉजिक तो पता ही होगा आपको. वो घर ज्यादा बेहतर चलते हैं जहां खर्च और काम की जिम्मेदारी गाड़ी के दोनों पहिए यानी पति और पत्नी मिलकर उठाते हैं. और एक बात, बीते डेढ़ साल में कितने ही घरों के इकलौते कमाऊ सदस्यों की मौत हो गई, अब उनका घर कैसे चलता होगा? क्या अब भी उन घरों की स्त्रियों को नौकरी नहीं करनी चाहिए?

# आप क्यों दो स्त्रियों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ी कर रही हैं? नौकरी पर जाने वाली स्त्री की अपनी दिनचर्या होती है. कितनी औरतें होती हैं जो सुबह जल्दी उठकर परिवार के नाश्ते-खाने की व्यवस्था करती हैं. ताकि समय पर दफ्तर जा सकें. कई स्त्रियां अपने बजट के हिसाब से घरेलू सहायिका रखती हैं ताकि उन्हें घर के काम में खर्च न होना पड़े. कई स्त्रियां नौकरी पर नहीं जातीं, घर के सारे काम करती हैं. कुछ स्त्रियां नौकरी नहीं करतीं, किटी पार्टीज़ में जाती हैं, अपने शौक के हिसाब से चीज़ें सीखती हैं, घर के लिए उनके पास सहायिका होती है. कई और स्त्रियां होंगी, जो किसी और तरीके से अपना दिन बिताती होंगी. पर इनमें से कौन कैसी है, किसका जीवन आसान है, किसके क्या संघर्ष हैं, ये जज करने वाले हम कोई नहीं होते. न ही ये कहने वाले कि कौन किससे बेहतर है. हर स्त्री अपने स्तर पर एक या उससे ज्यादा संघर्ष कर रही होती है, ज़रूरत है कि हम उस संघर्ष को समझें. न कि अपना जजमेंट पास करें.

Working Women
इस तस्वीर में एक सफाई कर्मी एक पुलिस वुमन से बात कर रही हैं. ये दोनों कामकाज़ी महिलाएं हैं. फोटो- Pixabay

# मैत्रेयी एक तरफ लिखती हैं कि सबको नौकरी नहीं मिलती है, और काम पर न जा पाने वाली औरतें उन औरतों के हसरत से देखती हैं जो तैयार होकर नौकरी पर जाती हैं. साथ में ये भी लिखती हैं कि वो औरतें अपनी बचत की तुलना नौकरी पेशा औरतों की सैलरी से करती हैं, और अपनी बचत को मूल्यवान मान लेती हैं. यानी मैत्रेयी फायनेंशियल इंडिपेंडेंस और अपने पैरों पर खड़े होने की औरतों की चाह को समझती तो हैं. पर उनकी सोच पर पुरुषवाद इतना हावी हो जाता है कि वो औरतों के ‘लकदक’ कपड़ों पर टिप्पणी करने लगती हैं, ‘घर तो उनके भी चलते हैं’ वाला ज्ञान देने लगती हैं. घर और गेस्ट हाउस वाले बेतुके ताने देने लगती हैं. और कोई परिवार ये समझ लेता है कि घर की स्त्री उनके सारे काम करने के लिए ही है, तो इस सोच को गलत बताने की बजाए मैत्रेयी हर स्थिति में संतोष वाली बातें करने लगती हैं.

# और जब मैत्रेयी हर स्थिति में संतोष की बात करती हैं तो वो भूल जाती हैं कि देश में कई औरतें ऐसी हैं जिन्हें परिवार के दबाव में अपने सपनों को छोड़ना पड़ता है. और रसोई, घर-गृहस्थी को अपनी नियति मान लेना पड़ता है. हर परिस्थिति में संतोष की बात किसी ऐसे व्यक्ति की तरफ से आए तो और अखरती है जो खुद एक बड़ा नाम हों, जिन्होंने खुद एक पहचान बना ली हो. और ये लिखते हुए हम ये बात साफ कर दें कि हमारी नज़र में घर संभालने या खाना पकाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते किसी स्त्री ने ये जिम्मेदारी खुद चुनी हो. न कि उस पर थोपी गई हो. हमारे लिए एक होम मेकर भी उतनी ही सम्माननीय है जितनी एक वर्किंग वुमन. और वर्किंग वुमन से हमारा मतलब केवल दफ्तर जाने वाली औरतों से नहीं है, हर उस औरत से है जो काम करती है. फिर चाहे वो घर में काम करने वाली दीदी हो, खेतों में जाने वाली महिलाएं हों या कोई और.

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ईंट बनाने के काम में लगी एक कामकाजी महिला. फोटो – pixabay

ये पहली बार नहीं है जब मैत्रेयी ने इस तरह की बात की हो. सिलबट्टे पर जब बवाल हुआ था, तब उन्होंने उस व्यक्ति का समर्थन किया था जिन्होंने लिखा था कि औरतों ने अपनी सहूलियत के मशीनों का इस्तेमाल शुरू कर दिया और उनकी वजह से रसोई का स्वाद चला गया. तब मैत्रेयी ने लिखा था कि वो तो खुद सिलबट्टे पर चटनी पीसती हैं. वो खुद क्या-क्या करती हैं. पर ज़रूरी नहीं कि मैत्रेयी के अनुभव हर महिला पर लागू हों.

जैसे सबके चश्मे का नंबर अलग-अलग होता है, वैसे ही हर महिला का अपना संघर्ष होता है. अपने चश्मे से दूसरे का जीवन देखकर जजमेंट पास न करें. कई लड़कियों को पढ़ाई से लेकर नौकरी के बीच आने वाली हर सीढ़ी पर चढ़ने से पहले एक लड़ाई लड़नी पड़ती है. इसलिए अपना रूढ़िवाद और अपने अनुभव दूसरी महिलाओं पर मत थोपिए. इस तरह की बातें लिखकर उन्हें हतोत्साहित करने, उन्हें पीछे खींचने की कोशिश करने की बजाए, एक सशक्त महिला बनें जो दूसरी औरतों को आगे बढ़ता देख सके.


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