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जानकारों ने कहा- 'धर्म में नहीं है दहेज का ज़िक्र', फिर क्यों और कैसे शुरू हुई ये कुप्रथा?

बचपन में जब किसी शादी में जाती थी, तब वरमाला के लिए बने स्टेज के बगल में मुझे नया पलंग, सोफा सेट, टीवी, फ्रिज, कूलर, कुर्सी, ढेर सारे बर्तन और भी न जाने क्या क्या रखा हुआ दिखता था. हम सभी बच्चे उन नए सामानों पर बैठते और खेलते थे. तब इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता था कि वो सारे सामान ‘दहेज’ थे. हमें तो लगता था कि, हां देते होंगे ये सब, कोई फर्क नहीं पड़ता था तब. लेकिन बड़े हुए, पढ़ाई-लिखाई की, तब समझ आया कि शादी के मंडप के पास रखा वो नया सामान गैरकानूनी था. अपराध था. वो अपराध, जिसे हमारी सोसायटी वाले बड़े ही आसानी से करते आ रहे हैं. दहेज जैसी कुप्रथा आज भी किसी न किसी तरीके से ज़िंदा ही है. भले ही उसका नाम अब प्यार से दिया हुआ गिफ्ट, या शगुन या संकल्प हो गया है. हाल ही में एक वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी पब्लिश हुई है, जिसमें बताया गया है कि भारत में दहेज गैरकानूनी होने के बाद भी आज तक धड़ल्ले से लिया और दिया जा रहा है. क्या कुछ सामने आया है स्टडी में और कैसे दहेज आज भी गिफ्ट के नाम पर हमारे बीच मौजूद है, सब जानेंगे एक-एक करके.

क्या कहती है स्टडी?

30 जून को वर्ल्ड बैंक ब्लॉग्स पर एक स्टडी छपी. बेसिकली ये स्टडी दो हिस्सों में पब्लिश हुई. ‘आइडियाज़ फॉर इंडिया’ के साथ मिलकर. ‘आइडियाज़ फॉर इंडिया’ इकॉनमिक और पॉलिसी पोर्टल है, जो भारत के कई मुद्दों पर विश्लेषण के आधार पर रिपोर्ट्स पब्लिश करता है. खैर, तो इस साठ-गांठ वाली रिपोर्ट दो टाइटल्स के साथ पब्लिश हुई. पहला था- The evolution of dowry in rural India: 1960-2008, माने 1960 से 2008 के बीच ग्रामीण भारत में दहेज का क्रमागत विकास. दूसरा टाइटल था- How dowry influences household decisions in rural India, ग्रामीण भारत में दहेज घरेलू फैसलों को कैसे प्रभावित करता है?

दहेज वो प्रॉपर्टी या कीमति सिक्योरिटी को कहते हैं, जो किसी शादी में शामिल दो पार्टियों में से एक के द्वारा दी जाती है या फिर देने पर सहमति जताई जाती है. अक्सर दहेज देने वाली पार्टी लड़की का परिवार होता है, और लेने वाली पार्टी लड़के का परिवार. बहुत ही पुराने समय से ये कस्टम फॉलो किया जा रहा है. 2006 में रूरल इकॉनमिक एंड डेमोग्राफिक सर्वे यानी REDS ने भारत में दहेज को लेकर एक स्टडी की थी, इसी स्टडी का विश्लेषण अब वर्ल्ड बैंक ने अपनी रिपोर्ट में किया है. REDS की स्टडी भारत में दहेज की मौजूदगी को लेकर हुई सबसे रीसेंट स्टडी है. इसमें देश के 17 बड़े राज्यों को कवर किया गया था, इन राज्यों में देश की 96 फीसद आबादी रहती है. REDS की स्टडी में 1960 से लेकर 2008 के बीच ग्रामीण भारत में हुईं 40 हज़ार शादियों का आंकलन किया गया था, पाया गया कि 95 फीसद शादियों में दहेज का लेन-देन हुआ था.

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शादी के समय कई तरह से दहेज का लेन-देन होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अब REDS की स्टडी को वर्ल्ड बैंक ने नेट दहेज के फॉर्म में कन्वर्ट किया. नेट दहेज कुछ इस तरह से कैल्कुलेट किया गया. लड़की के परिवार की तरफ से लड़केवालों को जितनी रकम का गिफ्ट दिया गया, उसमें से लड़के के परिवार द्वारा लड़कीवालों को जितनी रकम के गिफ्ट दिए गए, उसे माइनस कर दीजिए. ज्यादातर शादियों में ये नेट दहेज पॉज़िटिव ही मिला. माने लड़कीवालों ने ज्यादा पैसे लड़केवालों को दिए. बहुत ही कम शादियां ऐसी थीं, जहां लड़केवालों ने ज्यादा महंगे गिफ्ट्स लड़कीवालों को दिए. वर्ल्ड बैंक के विश्लेषण में ये सामने आया कि नेट दहेज 1975 से लेकर साल 2000 के बीच एक जैसा बना रहा. वहीं लड़कीवालों की तरफ से ज्यादा रकम के गिफ्ट दिए गए, जबकि लड़के वालों की तरफ से ये रकम काफी कम थी. आसान भाषा में बताएं तो जहां लड़केवालों ने लड़कीवालों को पांच हज़ार के गिफ्ट दिए, तो वहीं लड़कीवालों ने छह से सात गुना ज्यादा पैसे खर्च किए, माने 32 हज़ार के गिफ्ट दिए. टोटल 27 हज़ार का अंतर. ये औसत केवल आपको समझाने के लिए बताया गया है, असल मायनों में तो ये संख्या लाखों में होती है.

वर्ल्ड बैंक के विश्लेषण में ये भी रिवील हुआ कि भारत में लगभग सभी धर्मों में दहेज लिया और दिया जाता है. अगर कास्ट को ध्यान रखते हुए बात करें, तो अपर कास्ट में सबसे ज्यादा दहेज का लेन-देन होता है, उसके बाद OBC फिर SC और ST में दहेज चलता है. केरल, हरियाणा, पंजाब और गुजरात में नेट दहेज का ग्राफ बढ़ते हुए ही नज़र आया. जबकि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में एवरेज दहेज घटता हुआ दिखा.

वर्ल्ड बैंक के विश्लेषण में घर की बचत पर भी बात की गई. बताया गया कि जिस घर में पहली लड़की पैदा होती है, वहां परिवार वाले उसके जन्म के साथ ही दहेज के लिए पैसे जोड़ने लगते हैं. साथ ही ज्यादा पैसे कमाने और बचाने के लिए फर्स्ट बोर्न लड़की के पिता फर्स्ट बोर्न लड़के के पिता से ज्यादा काम करते हैं. अक्सर ही दहेज का अमाउंट घर की कई साल की कुल कमाई से कहीं ज्यादा होता है. कई परिवार दहेज देने के लिए कई साल की बचत खत्म कर देते हैं.

कब शुरू हुई थी दहेज प्रथा?

भारत में 1961 से ही दहेज का लेन-देन गैर-कानूनी है. लेकिन फिर भी ये प्रथा अभी तक ज़िंदा है. सवाल उठता है कि इस कस्टम का, जिसे कई जगहों पर Evil custom भी कहा जाता है, उसका जन्म आखिर कैसे हुआ. बहुत सारे आर्टिकल्स पढ़ने के बाद ये समझ आया है कि दहेज प्रथा हमारे देश में बरसों से चली आ रही है. उसके शुरुआत का एग्जेक्ट समय क्लीयर नहीं है. ‘pulitzer center’ की रिपोर्ट की मानें तो दहेज की जड़ मध्ययुगीन काल में दिखाई देती है, उस वक्त लड़की के माता-पिता उसकी शादी के दौरान उसे कई सारे गिफ्ट्स और पैसे देते थे, जिस पर केवल उस लड़की का ही हक होता था, उन पैसों का मकसद ये था कि लड़की शादी के बाद भी अपने दम पर ही रहे. ये पैसे किसी भी तरह से लड़की के पति या उसके ससुराल वालों के लिए नहीं होते थे. लेकिन जब भारत में अंग्रेज़ों का शासन आया, तब एक एक्ट के ज़रिए ब्रिटिशर्स ने ज़मीन पर प्राइवेट ऑनरशिप बंद कर दी. इस एक्ट में और बदलाव हुए और ज़मीन पर औरतों के मालिकाना हक को भी खत्म कर दिया गया. जब इस पर रोक लगी कि औरतों के नाम पर कोई ज़मीन नहीं हो सकती, तो यहां से दहेज प्रथा ने बुरा रूप ले लिया. फिर लड़कियों की शादी के वक्त लड़केवाले मुंह खोलकर अपने मन के मुताबिक पैसे मांगने लगे. दहेज प्रथा के बुरे रूप की शुरुआत की यही कहानी ‘अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन’ वेबसाइट पर भी दी गई है. ये दोनों ही फाउंडेशन और वेबसाइट काफी नामी हैं.

फिर क्या हुआ?

लड़केवाले शादी के वक्त नखरे दिखाने लगे, बड़ी-बड़ी रकम मांगने लगे. लड़की के परिवार वाले किसी तरह से लड़की की शादी करवा भी देते, तब भी उसे शादी के बाद दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा. इस पर आया Dowry prohibition Act, 1961. इसके तहत दहेज लेना और देना दोनों को ही गैरकानूनी करार दे दिया गया. दहेज प्रथा का पालन करने वालों के खिलाफ सख्त नियम बनाए गए.

लेकिन इस कानून के आने के बाद भी दहेज प्रथा का अंत नहीं हुआ. हमारे सामने आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि दहेज प्रताड़ना के चलते लड़की ने सुसाइड कर लिया या उसकी हत्या कर दी गई. NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में डाओरी डेथ्स के देशभर में कुल 8455 मामले रजिस्टर हुए थे, 2015 में 7634 और 2016 में 7621 मामले दर्ज हुए थे.

ये तो डाओरी डेथ्स के दर्ज हुए मामले हैं, और न जाने ऐसी कितनी औरतें हमारे देश में होंगी जो दहेज के चलते ससुराल वालों के हाथों प्रताड़ित हो रही होंगी. बहुत सारी औरतें ऐसी भी हैं जो पुलिस तक पहुंच नहीं पातीं, कुछ ऐसी हैं जो NGO से मदद लेती हैं. बहुत सी औरतें केवल इतना चाहती हैं कि उनके ससुराल वाले दहेज के लिए उन्हें प्रताड़ित करना बंद कर दें, वो न तो पुलिस केस चाहती हैं न ही शादी तोड़ना. ऐसा क्यों? इसके बारे में ठीक से जानने के लिए हमारे साथी ने एक हमसफर NGO से जुड़ीं रिचा से बात की. वो कहती हैं-

“जितनी भी महिलाएं दहेज मामले को लेकर हमारे पास आती हैं, उनमें से 80 फीसद ये चाहती हैं कि हम उनके परिवार वालों के साथ बात करें, उनकी काउंसलिंग करें, और मीडिएशन के ज़रिए दिक्कत को हल करें. इसका बड़ा कारण जो मुझे समझ आया वो ये है कि महिलाओं का अपने पैरों पर न खड़ा होना. हमारे यहां कभी भी लड़कों को इस तरह से नहीं देखा जा सकता कि वो शादी का रिश्ता छोड़कर वापस मायके की तरफ रुख कर सकती हैं. या शादी के रिश्ते को अगर वो छोड़कर निकलती हैं बाहर, तो सबसे बड़ा सवाल उनके सामने ये खड़ा होता है कि वो अपना खर्चा कैसे करेंगी. अगर बच्चे हैं तो उनका पालन-पोषण कैसे करेंगी. ये सवाल उनके सामने सबसे बड़ा होता है. क्योंकि आज भी विवाहित लड़की अगर शादीशुदा रिश्ते से बाहर निकल रही है तो फैमिली के नाम पर मायका या कोई भी दूसरा नहीं मिलता.”

Richa
रिचा रस्तोगी, को- ऑर्डिनेटर, हमसफर सपोर्ट सेंटर फॉर विमन, लखनऊ

धर्म क्या कहते हैं?

हमने कई लोगों को ऐसी दलील देते सुना है कि दहेज तो परंपरा है, हम तो शादी में परंपरा निभा रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या वाकई दहेज एक परंपरा है? हमने बात की प्रोफेसर आर्कनाथ चौधरी से. ये श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय गुजरात में वाइस चांसलर हैं. हिंदू धर्म में दहेज क्या वाकई परंपरा है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा-

“शास्त्रों में दहेज की कोई परंपरा नहीं है. इसका ज़िक्र ही नहीं हुआ है. हां लेकिन पहले के समय में शादी के वक्त कन्या के परिवार वाले उसे कुछ रुपए और उपहार वगैरह देते थे. इसे स्त्री धन कहा जाता था. इसका केवल एक ही मकसद था, कि शादी के बाद भी कन्या सबल रहे, उसे पैसों से जुड़ी कोई दिक्कत न हो. वो आर्थिक रूप से सक्षम रहे. इन पैसों पर केवल और केवल कन्या का ही अधिकार होता था, उसके पति का नहीं. लेकिन समय के साथ इसका रूप बदल गया. ससुराल वाले इसी स्त्री धन पर अपना हक जताने लगे. और मन मुताबिक रकम लड़की के घरवालों से मांगने लगे. ये एक सामाजिक कुरीती है. लोगों ने ही इसे जन्म दिया है. और अब एक-दूसरे को कॉपी करने के चक्कर में ढेर-ढेर सारा पैसा दे दिया जाता है.”

Arknath Choudhary
प्रोफेसर आर्कनाथ चौधरी

मुस्लिम धर्म में दहेज को लेकर क्या परंपरा है इसके बारे में हमारे साथी नीरज ने प्रोफेसर जुनैद हारिस से बात की. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में डिपार्टमेंट ऑफ इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर हैं. वो बताते हैं-

“इस्लाम के अंदर, टीचिंग के हिसाब से देखा जाए, तो दहेज लेने-देने की कोई परंपरा नहीं है. देखा जाए तो ये सोसायटी के मुताबिक परंपरा बनी है. इस्लाम के मुताबिक, दहेज या तो रिश्वत है, या भीख है, या डकैती है, किसी भी तरह से इसे गिफ्ट नहीं कह सकते.” 

सिख धर्म के बारे में हमें बताया डॉक्टर मनविंदर सिंह ने. ये गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ गुरु नानक स्टडीज़ में प्रोफेसर हैं. वो कहते हैं-

“गुरु ग्रंथ साहिब में दहेज का कोई ज़िक्र नहीं है. हमारे गुरुओं ने भी शादी की थी, लेकिन उन्होंने किसी किस्म का दहेज नहीं किया था. ऐसी कोई परंपरा नहीं थी. औरतों को हमारे गुरु बहुत सम्मान देते थे. उन्हें औरतों की अहमियत पता थी. लेकिन अब सिख धर्म में भी शादियों में दहेज का लेने-देने हो रहा है.”

जैन धर्म में दहेज को लेकर क्या परंपरा है, ये हमें बताया प्रोफेसर वीर सागर जैन ने, ये SLBSNSU में डिपार्टमेंट ऑफ जैन दर्शन में प्रोफेसर हैं. वो कहते हैं-

“जैन धर्म के किसी भी ग्रंथ में दहेज लेने को सही नहीं बताया गया है. बल्कि इसका विरोध ही किया गया है. लेकिन फिर भी समाज एक-दूसरे को देखकर सीखते हैं, वही यहां भी हुआ.”

इसाई धर्म में दहेज किस तरह से व्याप्त है, इसका जवाब दिया आशीष आर्चर ने. ये एक पादरी हैं. उन्होंने कहा-

“दहेज की प्रथा का वर्णन मिलता है पुराने समय में. क्रिश्चियनिटी एक धर्म के तौर पर बहुत पहले विकसित हुआ था. उस समय वर्णन मिलता है कि दहेज था, लेकिन उल्टा होता था. मतलब वर पक्ष की तरफ से वधू पक्ष को दिया जाता था. उसकी भी जड़ मेरा मानना है कि पैट्रियार्की में ही रही होगी.”

दहेज के बदलते रूप 

लगभग सभी धर्मों के जानकारों ने ये बताया कि दहेज एक कुरीति है, धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता, लेकिन फिर भी ये खुलेआम लिया और दिया जा रहा है. माने ज्यादा कुछ बदलाव नहीं आया है. हां दहेज देने और मांगने के तरीके में ज़रूर बदलाव आ चुका है. जैसे कई लोग सीधे तौर पर कुछ मांगते नहीं हैं, रकम सेट नहीं करते, लेकिन ये ज़रूर कहते हैं कि अपने हिसाब से आप अपनी बेटी को जो गिफ्ट देना चाहें दे सकते हैं. मतलब ‘गिफ्ट’ शब्द धीरे-धीरे दहेज शब्द का पर्यायवाची बनता जा रहा है. लड़कीवाले भी ये सोचकर कि अपनी ही बेटी है कई सारा कैश देते हैं, या बाइक या फोर-व्हीलर ये सब देते हैं. घर का सारा सामान भी दे देते हैं. ये सोचकर कि ये तो ‘गिफ्ट’ है. जबकि ये दहेज का ही एक रूप है. कुछ पैरेंट्स तथाकथित संकल्प या शगुन के नाम पर बेटी की शादी में बहुत सारी चीज़ें दे देते हैं. किसी-किसी जगहों पर लड़के वाले भले ही कुछ न मांगें, लेकिन अपेक्षा रखते हैं कि लड़कीवाले अपने मन से बहुत कुछ देंगे. और अगर लड़कीवाले ऐसा नहीं कर पाए, तो आगे जाकर लड़की को ससुराल में ताने मारे जाते हैं.

माने दहेज का स्पैक्ट्रम फैलता जा रहा है. पहला होता है सीधा लेन-देन. दूसरा होता है- लड़के वालों का अपेक्षा रखना. तीसरी- ऐसी कैटेगिरी है, जिसमें लोगों को नॉलेज ही नहीं होता कि वो दहेज का लेन-देन कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि ये तो नॉर्मल है. कुछ केसेज़ में तो ऐसा होता है कि लड़की वाले एक गिल्ट लेकर चलते हैं, ये कि लड़केवालों ने तो कुछ मांगा ही नहीं, कितने सीधे लोग हैं, और इसी चक्कर में ढेर-ढेर सारा पैसा और सामान दे दिया जाता है. ऐसा नहीं है कि केवल लड़के वाली पार्टी ही दहेज की दोषी है या क्रूर है. लड़कीवाली पार्टी बराबर दोषी है. ठीक उसी तरह जिस तरह लड़केवाले हैं. क्योंकि वो भी कहीं न कहीं पैट्रियार्की को स्प्रेड कर रहे हैं, इस कुप्रथा को वैलिडिटी दे रहे हैं.


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