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300 महिला वकीलों की एक चिट्ठी ने एडवोकेट्स के बड़े ग्रुप की सच्चाई खोलकर रख दी

बॉम्बे हाई कोर्ट और मुंबई की अदालतों से जुड़ी महिला वकीलों ने एक लेटर लिखा है. केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरण रिजिजू को. मांग की है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया और विभिन्न राज्यों की बार काउंसिल्स में महिला वकीलों को आरक्षण दिया जाए. क्योंकि मौजूदा समय में बार काउंसिल्स में महिला वकीलों की संख्या या तो बहुत कम है या न के बराबर है. महिला वकीलों ने इक्वल रिप्रेजेंटेशन के लिए बाकायदा एक फॉर्मूला भी सुझाया है. वो फॉर्मूला क्या है? और ये बार काउंसिल आखिर होता क्या है? ये जानेंगे. साथ ही ये भी जानेंगे कि महिला वकीलों को महिला होने के नाते क्या भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है, अगर हां तो किस तरह के भेदभाव से वो गुज़रती हैं. सब बताएंगे तसल्ली से.

क्या है पूरा मामला?

‘Interactive Session of Women Advocates’ नाम का एक ग्रुप है. इसमें करीब 300 महिला वकील शामिल हैं. ये सभी महिलाएं या तो बॉम्बे हाई कोर्ट की प्रैक्टिसिंग वकील हैं या फिर मुंबई या उसके आसपास जो भी अदालते हैं या ट्रिब्यूनल हैं, उसकी प्रैक्टिसिंग वकील हैं. इसी ग्रुप ने किरण रिजिजू को लेकर लिखा है. ‘एडवोकेट्स एक्ट 1961’ में संशोधन की मांग की है. कहा है कि इसके कुछ सेक्शन्स में बदलाव करके बार काउंसिल्स में महिला वकीलों को रिज़र्वेशन दिया जाए. महिला वकीलों की और क्या मांगें हैं और उन्होंने इसे लेकर क्या तर्क रखे हैं. ये जानने से पहले आपको बताते हैं कि बार काउंसिल्स आखिर है क्या.

हमारे देश में वकीलों के लिए एक बेहद अहम एक्ट काम करता है, जिसे ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’ कहते हैं. इस एक्ट का सेक्शन 3 स्टेट बार काउंसिल्स के बारे में बात करता है, और सेक्शन 4 बात करता है बार काउंसिल ऑफ इंडिया के बारे में. देखिए, किसी भी संस्था या ग्रुप या कोई भी ऑर्गेनाइज़ेशन को चलाने के लिए कई सारे नियम कानून बनाए जाते हैं, इसके अलावा कुछ अहम लोगों का ग्रुप बनाया जाता है, जो उस पर्टिकुलर संस्था के लिए नियम कानून बनाता है और उस संस्था में शामिल लोगों को सुरक्षा देता है, या उनके मामलों को डील करता है. इसी तरह से भारत में वकीलों के काम काज और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए बार काउंसिल्स बनाए गए हैं. इन काउंसिल्स में सबसे ऊपर आता है बार काउंसिल ऑफ इंडिया. और इसके तहत राज्यों के बार काउंसिल्स काम करते हैं.

Letter (2)
वो लेटर जो किरण रिजिजू को लिखा गया.

‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ का क्या काम है?

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कुछ अहम कामों के बारे में भी बताते हैं. ये वकीलों के प्रोफेशनल कंडक्ट और शिष्टाचार के लिए ज़रूरी मानक तैयार करता है. डिसिप्लिनरी कमिटीज़ द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया डिसाइड करता है. वकीलों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा करता है. कानून सुधार को बढ़ावा और सपोर्ट देता है. स्टेट बार काउंसिल्स जो मैटर रेफर करते हैं, उनसे डील करता है और निपटाता है. यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेजों में कानून की पढ़ाई करने वालों को क्या पढ़ाया जाएगा, इसका फैसला भी बार काउंसिल ऑफ इंडिया करता है. हालांकि इसके लिए यूनिवर्सिटीज़ और स्टेट बार काउंसिल्स से भी कंसल्ट किया जाता है. इसके अलावा एक और अहम काम ये है कि गरीबों को कानूनी सहायता देने की व्यवस्था करता है. इसी तरह के कई सारे काम बार काउंसिल ऑफ इंडिया के ज़िम्मे है.

इसी तरह से स्टेट बार काउंसिल्स भी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले इलाकों और वकीलों के लिए काम करते हैं. स्टेट बार काउंसिल्स के सदस्यों की संख्या, उनके इलेक्टोरेट्स की संख्या पर निर्भर होती है. इलेक्टोरेट्स यानी स्टेट बार काउंसिल में इलेक्टोरल रोल पाने वाले वकीलों की संख्या. ‘एडवोकेट्स एक्ट 1961’ कहता है कि अगर किसी स्टेट काउंसिल में इलेक्टोरेट्स की संख्या पांच हज़ार या उससे कम है, तो उस बार काउंसिल में 15 मेंबर्स होंगे. जिन्हें इलेक्टोरेट्स चुनेंगे. अगर इलेक्टोरेट्स की संख्या पांच हज़ार से ज्यादा और 10 हज़ार से कम हो, तो मेंबर्स 20 होंगे, अगर इलेक्टोरेट्स की संख्या दस हज़ार से ज्यादा हुई, तो मेंबर्स 25 होंगे. साथ ही एडवोकेट जनरल ऑफ स्टेट, इस बार काउंसिल के एक्स ऑफिशियो मेंबर होंगे. माने पदेन सदस्य होंगे. अब बार काउंसिल ऑफ इंडिया की बात करें, तो सभी स्टेट बार काउंसिल्स का एक-एक सदस्य इसका मेंबर होगा. साथ ही अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया और सॉलिसिटर जनलर ऑफ इंडिया इसके एक्स ऑफिशियो मेंबर होंगे.

अब जो महिला वकीलों ने लेटर लिखा है, उसमें मांग रखी है कि हर बार काउंसिल में महिला वकीलों की सदस्यता को आरक्षित किया जाए. क्योंकि मौजूदा समय में ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ के मेंबर्स में एक भी महिला वकील नहीं है. वहीं महाराष्ट्र-गोवा स्टेट बार काउंसिल, समेत उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा, केरल, कर्नाटक, गुजरात और दिल्ली के स्टेट बार काउंसिल्स में भी एक भी महिला वकील मेंबर नहीं है. सात स्टेट बार काउंसिल्स ऐसे हैं, जिनके सदस्यों में एक महिला शामिल है. ये हैं आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु-पुडुचेरी, असम-नागालैंड-मिज़ोरम-अरुणाचल प्रदेश-सिक्किम के स्टेट बार काउंसिल्स. केवल बार काउंसिल ऑफ बिहार में दो महिला वकील सदस्य हैं.

क्या मांग है महिला वकीलों की?

महिला वकीलों की मांग है कि जिन स्टेट काउंसिल्स में 15 सदस्य हैं, उनमें कम से कम एक महिला वकील की सीट रिज़र्व की जाए, जहां 20 सदस्य हैं, वहां दो महिला वकील और जहां 25 सदस्य हैं, वहां तीन महिला वकीलों की सीट को रिज़र्व किया जाए. वहीं “बार काउंसिल ऑफ इंडिया” में रोटेशनल बेसिस पर कम से कम तीन महिला वकीलों की सीट रिज़र्व की जाए. महिला वकीलों ने लेटर में लिखा-

“काउंसिल वकीलों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों को सुरक्षा देता है. इसलिए महिला वकीलों समेत सभी वकीलों को जो दिक्कतें आती हैं, उनकी गहरी समझ होना अनिवार्य है. महिला वकील पुरुष वकीलों की तुलना में कुछ अलग मुद्दों का भी सामना करती हैं. बार काउंसिल ऑफ इंडिया और स्टेट बार काउंसिल्स में महिलाओं की गैर-मौजूदगी की वजह से महिला वकीलों से जुड़ी चिंताओं को दूर करने में एक गंभीर बाधा होती है, जिसके चलते महिला वकीलों को उनके खुद के वेलफेयर के लिए मुद्दे उठाने रास्ता नहीं मिलता.”

महिला वकीलों की दिक्कतें क्या हैं?

हमारी कई अदालतों ने हाल के कुछ बरसों में महिला सशक्तिकरण को लेकर कई सारे अहम फैसले सुनाए हैं, फिर भी इन काउंसिल्स में महिला वकीलों की मौजूदगी न के बराबर क्यों है? ये जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की कुछ महिला वकीलों से. एडवोकेट सीमा कुशवाहा इस मुद्दे पर कहती हैं-

“मुंबई की जो महिला वकील हैं, उन्होंने जो लेटर लिखा है, वो सही लिखा है. क्योंकि हमारे पूरे भारत के कोर्ट्स की बात करें या बार काउसिंल को देखें, तो महिलाओं की संख्या न के बराबर है. चाहे वो मेंबर हों या प्रेसिडेंट हों. साथ ही साथ हम जूडिशियरी में रिज़र्वेशन की बात करें, तो महिलाओं का वहां रिज़र्वेशन नहीं है, इसलिए उनका रिप्रेजेंटेशन नहीं है. इसलिए जो लेटर लिखा गया है, वो सही है. संविधान के आर्टिकल्स में भी महिलाओं और बच्चों को विशेष दर्जा दिया गया है. तो संविधान में अगर ये प्रावधान है, तो उसके पीछे बड़ी एप्रोच है. महिलाओं को कुछ शारीरिक दिक्कतें भी होती हैं. हॉर्मोनल दिक्कतें होती हैं, टाइम के साथ कई सारी प्रॉब्लम्स होती हैं. या परिवार की दिक्कतें होती हैं. अगर वो मां बनती हैं, तो चैलेंज होता है. तो ऐसे में उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट अगर नहीं दिया जाएगा, तो बहुत मुश्किल होगी उनके लिए इक्वल पार्टिसिपेट करके इस फील्ड में वकालत कर पाना, या जज बन पाना, या बार काउंसिल की मेंबर और प्रेसिडेंट बन पाना.”

Seema (2)

इसी मुद्दे पर एडवोकेट देविका गौर कहती हैं-

“महिलाओं की संख्या बार काउंसिल में कम होने का कारण भेदभाव से ही जुड़ा है. अगर जड़ की बात करें, तो शुरुआत होती है पैट्रिआर्कल सोसायटी से. अगर इसके दूसरे पहलू की बात करूं, तो वो आता है मैरिटल स्टेटस में. एक महिला जो शादीशुदा है, उसे बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. लगातार फैमिली प्रेशर होता है, एक परिवार को संभालने की ज़िम्मेदारी है, उसे लीगल प्रोफेशन में ऑफिस जाना है, फाइल्स बनानी है, ड्राफ्टिंग करनी है, उसे रिसर्च करनी है और उसके बाद घर जाकर एक परिवार को भी संभालना है, जिसमें घर में उसके बच्चे, पति-परिवार इंतज़ार कर रहे होते हैं. ऐसे कॉन्स्टेंट प्रेशर और अनसपोर्टिव बिहेवियर हमारे रिलेटिव्स का होता है, इसलिए कई बार औरत मजबूर होकर ये प्रोफेशन छोड़ देती है. वो औरतें जो इस प्रोफेशन में हैं और शादी नहीं की हैं, उन्हें भी घरवालों का प्रेशर रहता है कि शादी कर लो. ये भी परसेप्शन है कि लीगल प्रोफेशन से जुड़ी महिला से शादी नहीं करना चाहिए. कई सारे ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से फीमेल एडवोकेट्स को मजबूर किया जाता है कि वो ये छोड़ दें. अगर कोई महिला जब तक इस प्रोफेशन में सेटल होती है, तब तक माना जाता है कि इस प्रोफेशन में सेटल होते-होते काफी टाइम लग जाता है. ऐसे में कंसिडर किया जाता है कि उसकी बहुत एज हो गई है और अब वो शादी नहीं कर सकती. यही सारे कारण दिक्कत पैदा करते हैं. यही कारण एक फीमेल को मेल के मुकाबले इनकॉम्पिटेंट बनाते हैं. उसकी लीडरशिप पोटेंशियल पर सवाल करते हैं.”

Devika

महिला वकीलों ने जो लेटर लिखा, उसमें ये मेंशन किया कि महिला वकीलों को पुरुष वकीलों की तुलना में कुछ अलग दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, वो दिक्कतें क्या हैं, ये जानने के लिए नीरज ने बात की लेटर लिखने वाली ही कुछ महिला वकीलों से. एडवोकेट सोनल कहती हैं-

“महिलाओं के ऊपर परिवार संभालने का, घर के कामकाज करने का दायित्व ज्यादा होता है. इसलिए वर्क लाइफ को बैलेंस करने में दिक्कत होती है. दूसरी बात ये है कि समान काम के लिए समान पारिश्रमिक नहीं मिलता है. महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा कम पारिश्रमिक मिलता है, ये हमारी एक समस्या है. तीसरी हमारी समस्या है कि कई जगहों पर मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है. बहुत सी ऐसी जगहें हैं, कार्यालय हैं, कोर्टरूम्स हैं, जहां पर बिल्कुल मूलभूत सुविधाएं हैं, वो नहीं मिलती. जैसे टॉयलेट की सुविधा, लेडीज़ रूम की सुविधा.”

Sonal

एडवोकेट अनीता शेखर कस्टेलिनो कहती हैं-

“हमें बहुत दिक्कत होती है. मुंबई में ऐसे भी कोर्ट्स हैं जहां पर रेस्टरूम नहीं है महिलाओं के लिए. परिवारिक लाइफ का, करियर का बैलेंस बनाने में तकलीफ भी होती है. ऐसा नहीं है कि हम नहीं कर सकते. हम करते हैं. मैं खुद अपना परिवार संभालती हूं. काम भी करती हूं. मैं ब्रेक भी नहीं लेती. मतलब ऐसा नहीं है कि हम बैलेंस नहीं कर सकते. लेकिन थोड़ी बहुत दिक्कत होती है. बैलेंस करना ज़रूरी है, जो हम कर भी सकते हैं, लेकिन सही सिचुएशन दी जाए, समान फील्ड दी जाए, प्लेन फील्ड दिया जाए. पुरुषों के बराबर फील्ड मिले तो हम कर सकते हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट के एक असोसिएशन में टॉयलेट नहीं था, रेस्टरूम नहीं था, थे तो नीचे थे, लेकिन बार असोसिएशन के रूम में नहीं था, हमने एक रिप्रेजेंटेशन किया, चीफ जस्टिस ने इंटरेक्ट किया. कहा कि टॉयलेट फेसिलिटी वहां होना चाहिए.”

लैंगिक भेदभाव माने सेक्सिज़म, ये ऐसी दिक्कत है, जो लगभग हर फील्ड में देखने को मिलती है. कानूनी फील्ड में भी. महिला होने के नाते महिला वकीलों को किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है? इस सवाल का जवाब हमें दिया एडवोकेट सीमा कुशवाहा ने. वो बताती हैं-

“हाथरस केस में जो विक्टिम का गैंगरेप किया गया, मर्डर किया गया, उस केस को फाइट करने के लिए मैं हाथरस कोर्ट के अंदर खड़ी हूं. एक वकील वहां शराब पीकर कोर्ट रूम में आता है. एक पेपर कोर्ट में जज को देता है, कहता है ये प्रोसिक्यूशन इस केस को लड़ेगा और विक्टिम जो है उसका प्रावधान नहीं है कि वो कोर्ट में प्रेजेंट हो. मैंने उसे डांटा. वो मुझे घूर रहा था. मैंने कहा कि आप पहले प्रोविज़न देखिए कि जो भी रेप मैटर्स हैं उसमें विक्टिम को सुना जाना ज़रूरी है और विक्टिम अपने वकील के ज़रिए बात रखता है, तो ये मेरा अधिकार है कि मुझे यहां सुना जाए. उसने वो पेपर वापस ले लिया. वो एडवोकेट चला गया. फिर उसके पिता आए, वो और सीनियर वकील. पूरे कोर्ट रूम में मैं इकलौती महिला वकील थी. उस एडवोकेट के पिता ने एंट्री लेते साथ ही कहा ‘कौन सीमा कुशवाहा है, अपनी सीमा में रहे, यहां वकालत नहीं कर सकती वो’. अब आप सोचिए कोर्ट रूम के अंदर पुरुष वकील धमका रहे हैं और जज कुछ नहीं बोल पा रहे. जब हमारी लड़ाई होने लगी तो जज ने कहा कि आप लोग शांत हो जाइए. मैंने कहा कि मुझे कोर्ट का सीसीटीवी फुटेज चाहिए. अब उस मैटर को हाई कोर्ट ने संज्ञान में लिया है, लखनऊ बेंच ने.”

अगर कॉलेज के स्तर पर देखें, तो लॉ ग्रेजुएट्स में लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन फिर भी न्यायतंत्र में उनकी भागीदारी काफी कम है. देश के हायर जूडिशियरी में केवल 10 फीसद औरतें हैं. सुप्रीम कोर्ट में 2019 तक 416 वकीलों को सीनियर एडवोकेट्स का दर्जा मिला था, जिसमें केवल 18 औरतें हैं, इन 18 में से भी पांच औरतें अलग-अलग हाई कोर्ट्स की रिटायर्ड जज हैं. वकीलों में ही औरतों की संख्या इतनी कम है. तो जज के स्तर पर तो उनकी संख्या समझ जाइए क्या होगी. सुप्रीम कोर्ट में आज तक कोई महिला चीफ जस्टिस नहीं बनी है. अदालतों में जजों के स्तर पर महिलाओं की संख्या को लेकर हमने ऑलरेडी एक वीडियो किया हुआ है अपने यूट्यूब चैनल पर. उसका लिंक आपको डिसक्रिप्शन पर मिल जाएगा.


वीडियो देखें: बार काउंसिल में महिला वकीलों की आरक्षण की मांग कितनी जायज है?

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