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13 साल की उम्र में वेश्यालय भेज दी गई लड़की घर लौटी, लेकिन पुलिस ने निराश कर दिया

बशीरहाट, पश्चिम बंगाल. यहां की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची. उम्र मुश्किल से 13 साल. घर में पिता नहीं थे, और सबसे बड़ी बच्ची वही थी. काम करना चाहती थी. कुछ दिनों तक उसने दमदम में एक फैक्ट्री में काम भी किया. लेकिन जब वो फैक्ट्री बंद हो गई, तो उसने अपनी जान-पहचान की एक महिला से संपर्क किया. काम के बहाने उस महिला ने नीलिमा (बदला हुआ नाम) को पुणे के एक वेश्यालय पहुंचा दिया. वहां से किसी तरह भागकर वापस आई. 23 साल की उम्र में. पुलिस के पास पहुंची, लेकिन उसकी शिकायत नहीं लिखी जा रही.

क्या है पूरा मामला?

‘द टेलीग्राफ’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, नीलिमा अब तक नॉर्थ 24 परगना के लोकल पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाकर थक चुकी है. लेकिन उसकी शिकायत की सुनवाई नहीं हो रही. रिपोर्ट के मुताबिक़, नीलिमा ने बताया,

‘मैं खुद पांच से छह बार पुलिस स्टेशन जा चुकी हूं. हर बार मुझे वहां जाकर बताना पड़ता है कि मेरे साथ क्या हुआ. ये एक ऐसी चीज़ है, जो मैं नहीं करना चाहती, ख़ास तौर पर पब्लिक में तो बिलकुल नहीं. और उन्हें ये करना भी क्यों है? सब कुछ तो लिखा है मेरी पिटिशन में. इसीलिए तो फ़ाइल कर रही हूं मैं पिटिशन’.

जब नीलिमा को वहां पुणे के वेश्यालय में ले जाया गया था, तब उन्हें वहां बहुत यातनाएं दी गईं. नीलिमा ने बताया कि उनके दांत तोड़ दिए गए, ताकि वो कस्टमर के साथ सोने के लिए ‘हां’ कह दें. उसके बाद उन्हें डेंटिस्ट के पास ले जाया गया और सिल्वर कैप फिट कराये गए उनके दांतों में.

मानव तस्करी के शिकार हुए लोगों को सरकार की तरफ से मुआवजा मिलता है. लेकिन उसके लिए FIR का दर्ज होना जरूरी है. जब नीलिमा गायब हुई थी, तब उसकी मां ने उसके गुम होने की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन पुलिस ने कहा कि उनकी पिटिशन अभी एक्सेप्ट नहीं हुई है, उस पर जांच चल रही है.

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छोटी सी नीलिमा अपने घरवालों के लिए काम करना चाहती थी. लेकिन जिससे उसने संपर्क किया, उसने उसे वेश्यालय पहुंचा दिया. (सांकेतिक तस्वीर)

जिस वेश्यालय में नीलिमा को ले जाया गया था, उनमें से अधिकतर बंगाल से थीं. उन्हें दाल-चावल दिया जाता था खाने को. जो भी कमाई होती थी, उनसे छीन ली जाती थी. नीलिमा ने कुछ-कुछ पैसे बचाकर रखने शुरू कर दिए. जब उनके पास तकरीबन 20,000 रुपए इकट्ठे हो गए, तब वो एक और लड़की के साथ वहां से भाग निकलीं. उन्हें सिर्फ इतना याद है कि जिस दिन वो भागीं, वो महीने की 15वीं तारीख थी. क्योंकि पूरे महीने में सिर्फ 15 तारीख को ही मांस बनता था, जो उस दिन बना था.

23 अक्टूबर, 2016 को घर लौटने के बाद नीलिमा ने किसी को अपनी हालत के बारे में नहीं बताया. अपनी मां को भी नहीं. लेकिन एक NGO की मदद ज़रूर ली. गोकुलपुर सेबा सदन के नाम से चलने वाला ये NGO तस्करी रोकने के लिए काम करता है. जब नीलिमा NGO के संपर्क में आईं, तब उन्होंने FIR कराने का निर्णय लिया.


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