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कोरोना के दौरान बच्चा साथ लेकर ट्रैफिक संभालती ये कॉन्स्टेबल सरकार के मुंह पर तमाचा है

मध्य प्रदेश का इंदौर ज़िला. यहां का एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है. एक महिला पुलिसकर्मी सड़क पर ट्रैफिक मैनेज करते दिख रही हैं, और पास ही उनकी ढाई साल की बच्ची भी बैठी है. दरअसल, बच्ची को संभालने के लिए घर पर कोई नहीं था, इसलिए महिला पुलिसकर्मी उसे अपने साथ ड्यूटी पर ले आईं. अब हर कोई तारीफ कर रहा है. इस तरह की ये कोई पहली घटना नहीं है. कई सारे ऐसे मामले सामने आ चुके हैं. इन सारी खबरों को देखकर मन में एक सवाल आता है. इस तरह की मांओं की कई तस्वीरें वायरल होती हैं, कंस्ट्रक्शन साइट से लेकर संसद तक, माएं अपने बच्चे को छाती से चिपकाए बैठी रहती हैं, मगर कभी इस तरह की किसी पुरुष की तस्वीर देखने को नहीं मिलती. ऐसा क्यों? इसी सवाल का जवाब हम आपको देंगे.

कब-कब हुईं ऐसी घटनाएं?

इंदौर की जिस पुलिसकर्मी के बारे में हमने आपको बताया, उनका नाम है दीपिका शर्मा. ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल हैं. पति भी पुलिस की क्राइम ब्रांच में पोस्टेड हैं. दीपिका बताती हैं कि दोनों मिलकर बच्ची को संभालते हैं, लेकिन एक-दो दिन पहले अचानक उनकी ड्यूटी ऐसे वक्त पर लग गई थी, जब बच्ची को संभालने वाला कोई नहीं था. इसलिए वो उसे अपने साथ लेकर गई थीं.

Female Frontline Workers
बच्ची के साथ महिला कॉन्स्टेबल दीपिका.

अब चलिए यूपी के ललितपुर. यहां महरौनी थाने में श्रुति सिंह नाम की एक महिला सिपाही पोस्टेड हैं. इनकी भी एक तस्वीर वायरल हो रही है. जिसमें दिख रहा है कि श्रुति अपनी नौ महीने की बेटी को साथ लेकर ड्यूटी कर रही हैं. इस तस्वीर की भी लोग जमकर तारीफ कर रहे हैं. कह रहे हैं कि इससे बाकी महिला सिपाहियों का मनोबल बढ़ेगा.

अब थोड़ा पीछे चलिए. मार्च महीने के शुरुआती दिनों में की बात है. चंडीगढ़ में पोस्टेड एक महिला ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल अपने पांच महीने के बच्चे को गोद में लेकर ड्यूटी करते नज़र आई थीं. इस पर भी लोगों ने काफी तारीफ की थी. हालांकि कुछ ने सवाल भी किया था. पुलिस कॉन्स्टेबल ने मीडिया को बताया था कि उनके पति और सास-ससुर महेंद्रगढ़ में रहते हैं, घर पर कोई नहीं है जो उनके बच्चे की देखरेख कर सके. हालांकि वीडियो वायरल होने पर ट्रैफिक SSP ने जानकारी दी थी कि प्रियंका को लाइटर ड्यूटी दे दी गई है. और इस बात की जांच हो रही है कि ऐसा क्या हुआ था कि उन्हें अपने बच्चे को साथ लाना पड़ा.

Female Frontline Workers (1)
बाएं से दाएं: श्रुति सिंह बच्ची के साथ. चंडीगढ़ में ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल बच्चे के साथ.

इस तरह की तस्वीरें न केवल पुलिस विभाग से सामने आ रही हैं, बल्कि ग्रामीण इलाकों से भी आ रही हैं. मध्य प्रदेश के बालाघाट में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एक वीडियो में अपने बच्चे को गोद में लिए सर्वे करते नज़र आई थीं. बिहार के अररिया में भी करीब 24 दिन पहले एक ANM अपने 11 महीने के बच्चे के साथ कोरोना संक्रमितों का पता करते दिखाई दी थीं. बड़े अधिकारियों ने कहा था कि ये ANM दूसरे स्वास्थ्य कर्मियों का हौंसला बढ़ा रही हैं.

Female Frontline Workers (2)
बाएं से दाएं: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चे के साथ. ANM बच्चे के साथ.

इस तरह की खबरों की लिस्ट काफी लंबी है. हमने तो इक्का-दुक्का खबरें ही आपको बताई हैं. जैसे ही ऐसा कोई वीडियो या तस्वीर सामने आती है, लोग महानता बताकर तारीफों के पुल बांधने लगते हैं. जबकि ऐसी घटनाओं पर हमें गर्व न करके, शर्म से सिर झुंकाना चाहिए.

क्यों औरतें अपने बच्चों को काम पर ले जाने के लिए मजबूर हैं?

इस सवाल का जवाब हम देते हैं-

पहला- मैटरनिटी लीव का ठीक से न मिल पाना. हमारे देश में इंडियन मैटरनिटी बेनिफिट (एमेंडमेंट) एक्ट-2017 लागू है, जो गर्भवती औरतों को छह महीने की मैटरनिटी लीव की सुविधा मुहैया कराता है. हर ऑर्गेनाइज़्ड सेक्टर में ये एक्ट लागू होना ज़रूरी है. लेकिन फिर भी कई सारे सेक्टर्स ऐसे हैं, जो ये लीव देने में बड़ा घोटाला करते हैं. अपने स्तर पर अजीबों-गरीब नियम बनाकर औरतों का शोषण करते हैं. इस शोषण का जीता-जागता उदाहरण देखना है तो आप हमारे शो का एक ऐपिसोड देख सकते हैं, जिसका लिंक आपको डिस्क्रिप्शन पर मिल जाएगा.

दूसरा- मैटरनिटी लीव को अभी भी कई लोग एक लग्ज़री मानते हैं. उन्हें लगता है कि एक औरत को छह महीने बिना काम के पैसे देना सही नहीं है. ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं, जहां पर कुछ औरतें मैटरनिटी लीव को बीच में ही छोड़कर काम पर लौट जाती हैं. और फिर इन औरतों का महिमामंडन किया जाता है. पिछले साल अक्टूबर में मोदीनगर की SDM सौम्या पांडे की तस्वीर काफी वायरल हुई थी. वो डिलीवरी के महज़ 14 दिन बाद अपनी नवजात बच्ची को गोद में लेकर काम पर लौट आई थीं. इस तस्वीर पर जो कमेंट्स आए थे, वो थे- मातृशक्ति को नमन, सलाम है, यही सच्ची महिला सशक्तिकरण है, सुपर वुमन, कर्तव्यनिष्ठा की जितनी दाद दी जाए कम है, गर्व है. यानी सौम्या के फैसले की जमकर तारीफ हुई थी. मान लेते हैं कि सौम्या ने कोविड की वजह से ज्यादा काम होने के चलते अपनी मैटरनिटी लीव पूरी नहीं ली हो. और वो शारीरिक तौर पर भी पूरी तरह से फिट हों. लेकिन हर औरत के साथ ऐसा नहीं होता. प्रेग्नेंसी एक महिला के शरीर को पूरी तरह से बदल देती है. पीरियड्स से लेकर कई तरह की दिक्कतें होती हैं, शरीर में चर्बी भी काफी बढ़ जाती है, कमज़ोरी भी होती है, ऐसे में एक कामकाजी महिला का पूरा हक बनता है कि वो मैटरनिटी लीव ले. ये उसके लिए कोई लग्ज़री नहीं है, बल्कि ज़रूरत है. न केवल बच्चे के लिए, बल्कि मां के लिए भी.

तीसरा है पैट्रियार्की. यानी पुरुष प्रधान समाज का होना. हमारे यहां आज भी ये माना जाता है कि बच्चा संभालने की ज्यादा ज़िम्मेदारी मां की ज्यादा होती है. इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वो काम के साथ-साथ बच्चे को भी संभालें. ऐसे में मैटरनिटी लीव खत्म होने के बाद औरतें मजबूर हो जाती हैं अपने बच्चे को साथ काम पर ले जाने के लिए. आपने कभी भी किसी पुरुष की ऐसी तस्वीर नहीं देखी होगी, जिसमें वो ड्यूटी पर अपने बच्चे को साथ लेकर गया हो. कम से कम भारत में तो नहीं ही देखी होगी. जो ऊपर कुछ घटनाएं हमने आपको बताई हैं, उनमें क्या बच्चे के पिता ये काम नहीं कर सकते थे? अब अगर आप स्तनपान वाला मुद्दे को तर्क में शामिल करें, तो ये जान लीजिए कि आजकल कई तरह के ब्रेस्ट मिल्क पम्प मार्केट में आ रहे हैं. जिसके ज़रिए मां अपना दूध निकालकर अपने बच्चे के लिए छोड़कर आराम से काम पर जा सकती है. बॉटल से तो कोई भी दूध पिला सकता है, मां की क्या ज़रूरत? डाइपर भी कोई भी बदल सकता है. ज़रूरी नहीं कि ये काम भी मां ही करे.

बच्चा होने के बाद एक औरत से कहा जाता है कि उसकी प्राथमिकता अब उसका परिवार होना चाहिए. ऐसे में जो औरतें अपने काम और बच्चे को साथ में मैनेज नहीं कर पाती हैं, उन्हें मजबूरन कई दफा अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है. फिर जब वो पांच से छह साल बाद वापसी करती हैं, तो करियर में बहुत पिछड़ जाती हैं. तब उनसे कहा जाता है कि थोड़े से पैसे के लिए क्यों इतना खट रही हो.

चौथा और सबसे बड़ा कारण है- सिस्टम का नाकाम होना और क्रेश सुविधा का अभाव होना. अब सरकार ने मैटरनिटी लीव की सुविधा तो दी है, लेकिन क्या मां बनने वाली औरत का काम छह महीने की छुट्टी के बाद खत्म हो जाता है. जवाब है नहीं. अगर महिला की फैमिली और पति सपोर्टिव हैं, तो ठीक है. लेकिन अगर परिवार सपोर्टिव नहीं है, या फिर परिवार वाले साथ नहीं रहते हैं, तो मां के सामने दिक्कत आती है कि वो अपने बच्चे को कहां छोड़े. इसका एक समाधान क्रेश हो सकता है. क्रेश माने वो जगह जहां पर आप अपने बच्चे को छोड़कर काम पर जा सकते हो. मैटरनिटी एक्ट में भी क्रेश का प्रावधान है. कहा गया है कि वो सभी ऑर्गेनाइजेशन, जिनमें 50 या उससे ज्यादा कर्मचारी हों, उनमें एक निश्चित दूरी पर क्रेश सुविधा होनी चाहिए. मां दिन में चार बार काम के दौरान क्रेश जाकर अपने बच्चे को देख सकती है.

माने कानून तो क्रेश सुविधा की बात करता है, लेकिन क्या वाकई 50 कर्मचारी से ज्यादा संख्या वाले हर ऑर्गेनाइजेशन में क्रेश की सुविधा है? जवाब है नहीं. न केवल मैटरनिटी एक्ट में क्रेश की बात की गई है, बल्कि कई सारे लेबर कानूनों में भी इसका ज़िक्र है. श्रम और रोजगार मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक- फैक्ट्रीज़ एक्ट 1948 का सेक्शन 48 कहता है कि फैक्ट्रीज़ में भी छह साल से कम के बच्चों के लिए क्रेश होना चाहिए. Inter State Migrant Workmen (RECS) Act, 1979 का सेक्शन 44 भी क्रेश सुविधा मुहैया कराने की बात करता है. Plantations Labour Act, 1951 का सेक्शन 12 और Beedi and Cigar Workers (Conditions of Employment) Act, 1966 का सेक्शन 14 भी क्रेश पर ज़ोर देता है. यहां तक कि कंस्ट्रक्शन साइट्स पर भी क्रेश सुविधा देने का प्रावधान रखा गया है. ये प्रावधान Building and other Constructions (Regulation of Employment and Conditions of Service) Act, 1996 के सेक्शन 35 में है.

पुरुष प्रधान समाज पुरुषों के लिए भी सही नहीं

हमने अभी पुरुष केंद्रित समाज होने की बात की. क्या आपको लगता है कि इसका नतीजा केवल महिलाएं भुगगती हैं? नहीं. इसका नतीजा पुरुष भी भुगगते हैं. किस तरह, बताते हैं. जो पुरुष अपने बच्चों का सचमुच ख्याल रखना चाहते हैं, उनको भी सिस्टम ख्याल नहीं रखने देता. बहुत सारे पुरुष ऐसे हैं जो अपनी पत्नियों का हाथ बंटाना चाहते हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें छुट्टियां मुहैया ही नहीं कराता. पैटर्निटी लीव के कॉन्सेप्ट को ही देख लीजिए. इंडियन लेबर लॉ में तो इसका कोई प्रावधान ही नहीं है. सेंट्रल सिविल सर्विसेज़ (लीव) रूल्स- 1972 में एक छोटा सा प्रावधान है. ये कि सरकारी नौकरी करने वाले पिताओं को 15 दिन की पैटर्निटी लीव मिलेगी. लेकिन प्राइवेट सेक्टर में ये कंपनी पर निर्भर करता है कि वो कितने दिन की दे रहे हैं, और दे भी रहे हैं या नहीं. ऐसे में अगर किसी को चार दिन की, सात या दस दिन की ही छुट्टी मिलती है, तो वो पिता बच्चे का ख्याल रखने में अपनी पत्नी की मदद कैसे कर पाएगा? क्या बच्चे पालना दोनों का फर्ज़ नहीं है? अगर है तो छुट्टी पिता को क्यों नहीं मिलती है. हाल ही मे झांसी में पोस्टेड एक सर्कल अधिकारी को अपनी कोविड पॉज़िटिव पत्नी और बच्ची की देखभाल करनी थी, छुट्टी मांगी, नहीं मिली, ऐसे में उन्होंने इस्तीफा दे दिया. ये कैसा समाज है जो पुरुष को छुट्टी नहीं दे सकता और मजबूरी में उसे इस्तीफा देना पड़ता है.


वीडियो देखें: कोरोना में बच्ची के साथ इंदौर का ट्रैफिक संभालती लेडी कांस्टेबल की मजबूरी भी जानिए!

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