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विकलांग औरतों को क्यों है यौन शोषण और रेप का ज्यादा खतरा?

आठ साल पहले की बात है, एक महिला जो सुन और बोल नहीं सकती थी, वो बकरियों को चराने के लिए झाड़ियों में गई थी. तभी तीन आदमियों ने उसे पकड़ लिया और उसका रेप करने की कोशिश करने लगे. गनीमत रही कि उसी वक्त महिला के पिता वहां आ गए, जिन्हें देख आरोपी भाग गए. मामला कोर्ट में पहुंचा और ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी करार देते हुए सज़ा सुनाई. आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मद्रास हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए ये ऑब्ज़र्व किया कि डिसेबल्ड इंडियन औरतें अक्सर दोहरे भेदभाव का शिकार होती हैं, पहला तो औरत होने के चलते और दूसरा डिसेबल इंसान होने की वजह से. हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे. जानेंगे कि फिज़िकली डिसेबल्ड औरतों को किस तरह की दिक्कतें आती हैं और किस तरह वो अक्सर यौन शोषण का शिकार होती हैं.

क्या है मामला?

मद्रास हाई कोर्ट वाले जिस केस की हमने बात की, वो है साल 2013 का. ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, घटना तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले की है. 18 नवंबर 2013 के दिन ये घटना हुई थी. मुक बधिर महिला के साथ उस वक्त दो बच्चे भी थे, जब तीनों आदमियों ने महिला को पकड़ा, तब बच्चे दौड़कर महिला के पिता के पास पहुंचे और सारी बात बताई. इस पर महिला के पिता समय रहते घटनास्थल पहुंचे और महिला रेप का शिकार होने से बच गई. साइन लेंग्वेज के ज़रिए उसने स्टेटमेंट दर्ज कराया.

तिरुनेलवेली सेशन्स कोर्ट ने साल 2016 में तीनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए और सात साल की जेल की सज़ा सुनाई. साथ ही एक लाख रुपए फाइन भी जमा करने कहा गया. इसी सज़ा और फैसले के खिलाफ आरोपी पहुंचे थे मद्रास हाई कोर्ट. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सज़ा कम करने से मना कर दिया और सेशन्स कोर्ट की फैसले को ही जारी रखने का फैसला सुनाया. जस्टिस के. मुरली शंकर ने कहा कि कई तरह की सज़ाओं का प्रावधान होने के बाद भी सोसायटी का नज़रिया औरतों के प्रति बदला नहीं है. जस्टिस मुरली ने कहा-

“हिंसा वो चीज़ है जो उसके जन्म के समय से ही उसके साथ है, गर्भ से लेकर उसकी कब्र तक. हर कोई ये स्वीकार करे कि हमें औरतों को अच्छे से ट्रीट करना है. लेकिन ये काफी नहीं है. अब ये काम करने का समय है, ये सुनिश्चित करने का भी कि सभी पुरुष महिलाओं के साथ अच्छा बर्ताव करें.”

हमारे पास कई सारे कानून हैं, जो औरतों को यौन शोषण और रेप जैसी गंभीर अपराधों को सुरक्षा देते हैं. फिर भी ये अपराध इतने आम हो चुके हैं कि हर रोज़, हर वेबसाइट पर, अखबारों में आपको कुछ नहीं तो दो या तीन रेप या यौन शोषण की खबरें तो देखने को मिल ही जाएंगी. और अगर औरतें फिज़िकली डिसेबल रहें, तो अपराध करने वालों के लिए तो सोने पे सुहागा हो जाता है. अब हम आपको कुछ और ऐसी घटनाओं के बारे में बताएंगे, जहां फिज़िकली डिसेबल्ड औरतें या लड़कियां यौन शोषण या रेप का शिकार हुईं.

Madras High Court
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरई बेंच. (फोटो- मद्रास हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट)

‘TOI’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दो जुलाई के दिन एक महाराष्ट्र के कल्याण में एक और मुक बधिर महिला सेक्शुअल हैरेसमेंट का शिकार हुई. वो अपना काम खत्म करके घर लौट रही थी, तभी एक आदमी ने रेलवे स्टेशन के पास उसका पर्स छीन लिया. जब आदमी को ये अहसास हुआ कि महिला बोल सुन नहीं सकती है, तो वो उसे एक खाली बंगले में लेकर गया, जहां उसका यौन शोषण किया.

विराली मोदी की कहानी

आपने विराली मोदी का नाम तो सुना ही होगा. नहीं सुना तो बता दें कि वो डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट हैं. मॉडल भी हैं. इंडिया के होटलों और ट्रेन्स को डिसेबल फ्रेंडली बनाने का काम कर रही हैं. उन्हें करीब 12-13 साल पहले मलेरिया हुआ था, समय पर बीमारी का पता नहीं चला, जिसके चलते वो कोमा में चली गईं. बहुत मुश्किलों के बाद वो कोमा से बाहर आईं, लेकिन उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया था. फिर भी विराली ने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें घूमना बहुत पसंद है. लेकिन इसी घूमने के दौरान विराली का यौन शोषण भी हुआ. एक नहीं तीन बार. जिन कुली की मदद से वो ट्रेन में चढ़ती थीं, उन्हीं कुली ने उन्हें ऐसे छुआ था, जैसे वो कोई मांस का टुकड़ा हों. इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू विराली ने बताया था-

“एक आदमी ने मेरे पैरों के बीच से मुझे छुआ. और दूसरे ने मुझे मेरे अंडरआर्म्स में हाथ डालकर छुआ. मदद करने के बहाने मेरे साथ ऐसा किया. इतना ही नहीं, एक ने तो मेरे ब्रेस्ट को भी छुआ. मुझे पहले लगा कि हो सकता है कि ये गलती से हुआ हो, मुझे चढ़ाने-उतारने के समय, उनका इरादा ऐसा नहीं रहा हो. लेकिन फिर उसने कई बार मुझे गलत तरीके से छुआ, मुझे सीट पर बैठाते तक छूता रहा.”

Virali Modi
विराली मोदी के साथ खुद यौन शोषण की घटना हुई थी.

रिपोर्ट्स क्या कहती हैं?

साल 2018 में ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसका टाइटल था- Invisible Victims of Sexual Violence. इसमें बताया गया था कि डिसेबल औरतों का सेक्शुअल वायलेंस का शिकार होने की संभावना काफी ज्यादा होती है. खासतौर पर फिज़िकली डिसेबल्ड औरतों की. क्योंकि जो औरतें सुन, देख या बोल नहीं पातीं, वो जल्दी अपने साथ हुई घटना की रिपोर्ट भी नहीं कर पातीं. किसी से मदद भी जल्दी नहीं मांग पातीं, और सबसे अहम ये कि आसपास क्या हो रहा है, इसका उन्हें ज्यादा नॉलेज नहीं रहता इस वजह से उनके ऊपर ज्यादा अटैक होने की संभावना होती है. निर्भया केस के बाद हमारे देश में रेप के खिलाफ बने कानून और स्ट्रिक्ट किए गए थे. कई सारे संशोधन हुए थे. जिनमें डिसेबल्ड औरतों का भी ध्यान रखा गया था. उदाहरण के लिए, डिसेबल्ड औरतों या लड़कियों के पास अधिकार है कि वो पुलिस के पास अपना स्टेटमेंट अपने घर से ही रिकॉर्ड करवा सकती हैं या फिर अपनी पसंद की जगह से कर सकती हैं. साथ ही शिकायत दर्ज कराते टाइम या फिर ट्रायल के दौरान उन्हें इंटरप्रिटेटर या सपोर्ट पर्सन की मदद दी जाएगी.

ह्यूमन राइट्स वॉच की इस रिपोर्ट में 17 ऐसी डिसेबल्ड औरतों और लड़कियों से बात की गई थी, जो रेप या यौन शोषण का शिकार हुई थीं. जिसमें ये पाया गया था कि डिसेबल्ड रेप या यौन शोषण पीड़िताओं के सपोर्ट के लिए काफी सारे सुधार किए गए हैं, लेकिन असल में इनका पालन ठीक से नहीं होता. खासतौर पर पुलिस से इंटरेक्ट करना बहुत मुश्किल होता है. एक केस हम बताते हैं. फरवरी 2014 में कोलकाता में 26 साल की एक महिला गैंगरेप का शिकार हुई थी, महिला सायकोसोशल डिसेबिलिटी का शिकार थी. महिला के मुताबिक, पुलिस ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया था और उनकी डिसेबिलिटी को कारण बताकर केस दर्ज करने से मना कर दिया था. महिला बताती हैं-

“मैं जब पुलिस के पास गई, तो मुझसे बहुत घिनौने सवाल पूछे गए जैसे कि मुझे कैसा महसूस हुआ. मैंने उन्हें बताया था कि मैं होश में नहीं थी, तो मैं कैसे जानूंगी? पुलिस ने तब कहा था “ये तो मेंटल है, इसकी बातों पर क्यों ध्यान दिया जाए? ये तो गॉन केस है, इसे मैं क्यों सुनूं?”

इस केस में FIR तब दर्ज हुई जब महिला अपनी शिकायत लेकर मीडिया के पास पहुंची थी. हालांकि कुछ मामलों में पुलिस काफी सपोर्टिव भी रही. बहुत से मामलों में पुलिस अधिकारी संवेदनशीलता के साथ जांच करते हैं, लेकिन फिर भी सभी केस में ऐसा नहीं होता. कई डिसेबल्ड औरतों के यौन शोषण के मामले में पुलिस विश्वास ही नहीं करती, तो किसी में कम्युनिकेशन गैप की वजह से ठीक से बात समझ नहीं पाती.

हमारी अदालतें भी समय-समय पर ऐसे वर्डिक्ट्स और निर्देश देते रहे हैं, जिनमें गंभीर अपराधों का शिकार हुई डिसेबल्ड औरतों के मामलों को संवेदनशीलता के साथ हैंडल करने की बात कही गई है. इसी साल अप्रैल की बात है. सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्मट को डिसेबल्ड फ्रेंडली बनाने के लिए कई सारे डायरेक्शन्स जारी किए थे. कहा था-

“डिसेबल्ड औरतों के साथ होने वाले सेक्शुअल वायलेंस के मामलों को डील करने के लिए रेगुलर बेसिस पर पुलिस का संवेदीकरण किया जाना चाहिए. इस ट्रेनिंग में डिसेबल्ड महिला से जुड़े केस की पूरी लाइफ साइकल को कवर किया जाना चाहिए, जिसमें शिकायत दर्ज कराने से लेकर, ज़रूरी मदद, मेडिकल अटेंशन, सूटेबल लीगल रिप्रेजेंटेशन सब शामिल हों.”

कोर्ट ने डिसेबल्ड औरतों के साथ होने वाले अपराधों का डेटा तैयार करने के भी निर्देश दिए. साथ ही ये भी कहा कि डिसेबल्ड औरतों से जुड़े केस में जो भी अधिकारी शामिल होते हैं, उन्हें संवेदनशीलता के साथ काम लेना चाहिए. ये सारी बातें कोर्ट ने एक ब्लाइंड महिला के साथ हुए रेप केस की सुनवाई के दौरान कही थी.

विदेशों का हाल भी ठीक नहीं

न केवल भारत में बल्कि दुनिया के लगभग हर देश में डिसेबल्ड औरतों के साथ होने वाले अपराधों को संवेदनशीलता के साथ हैंडल नहीं किया जाता. BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूके के वेल्स में रहने वाली अंगहारद पेज जोनस ठीक से देख नहीं सकतीं. ऑलमोस्ट ब्लाइंड हैं. वो बताती हैं कि पब्लिकली कई बार मदद के नाम पर आदमियों ने उन्हें गलत तरीके से पकड़ा है. वो बताती हैं कि एक बार उन्होंने कुछ लड़कों के ग्रुप को ये कहते सुना था कि “तुम बस जाकर उसे पकड़ सकते हो. वो वैसे भी तुम्हें देख नहीं सकती.” पेज कहती हैं-

“डिसेबल औरतों की कोई कीमत नहीं हैं. हमें बस कमज़ोर की तरह देखा जाता है, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं. ये सोसायटी ने हमें कमज़ोर बनाया है.”

पेज ये भी बताती हैं कि उन्हें कई बार गंभीरता से नहीं लिया जाता है. उन्होंने बताया कि एक बार उनके साथ ट्रेन में एक घटना हुई थी, जिसकी शिकायत उन्होंने एक सिक्योरिटी अधिकारी से की थी, तब अधिकारी ने उनसे कहा था कि उनकी ड्रेस इतनी लो कट नहीं होनी चाहिए थी.

कानून क्या कहता है?

हर देश में डिसेबल्ड लोगों की रक्षा के लिए कानून हैं, भारत में भी हैं. THE RIGHTS OF PERSONS WITH DISABILITIES ACT, 2016, हमारे देश में डिसेबल्ड की सुरक्षा और उन्हें शक्ति देता है. डिसेबल्स के साथ अन्याय करने वालों के खिलाफ इस एक्ट में सज़ा का भी प्रावधान है. जिसमें एक पॉइंट है कि किसी डिसेबल्ड महिला को सेक्शुअली एक्सप्लॉइट करने वाले के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी. माने आदर्श स्थिति में देखें तो पेपर्स में बहुत सारे काम हुए हैं. लेकिन इन सबका असल में कितना पालन होता है, हम और आप जानते ही हैं.

डिसेबल्ड औरतों के साथ होने वाले भेदभाव और यौन शोषण के मुद्दे पर हमारे साथी नीरज ने बात की साइबा सैफी से. ये खुद एक डिसेबल्ड महिला हैं और दिल्ली में लॉ की स्टूडेंट हैं. उन्होंने बताया-

“पहला तो नॉर्मल औरत को ही इतनी दिक्कतें होती हैं, डिस्क्रिमिनेशन होता है. आप जानते हैं कि किस नज़र से सोसायटी देखती है औरतों को. उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि फिज़िकली डिसेबल इंसान को, खासतौर पर औरत को कितना फेस करना पड़ता होगा. फिज़िकली डिसेबल्ड औरत को उसके घरवाले ही घर से बाहर भेजने में कतराते हैं. अगर समानता की बात आती है तो हमारे संविधान में औरत और पुरुष को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया गया है, वहां सिर्फ एक पर्सन को कंसिडर किया गया है. लीगल फाइट में डिसेबल औरतों को काफी दिक्कत आती है, शिकायत से लेकर हर काम में चैलेंज है. शिकायत के लिए अगर वो पहुंच भी जाएं, तो कोई जल्दी सुनता भी नहीं है. केस या FIR करवाने के बाद ये बोलकर टाल दिया जाता है कि ऐसा नहीं हुआ होगा.”

अब अगर आंकड़ों पर जाएं तो साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में टोटल डिसेबल्स की संख्या दो करोड़ अड़सठ लाख ( 26814994 ) से भी ज्यादा है. इनमें पुरुषों की संख्या करीब एक करोड़ पचास लाख है. वहीं महिलाओं की संख्या लगभग एक करोड़ 18 लाख है.


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