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पति ने पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए और कोर्ट ने उसे छोड़ दिया

हमारे देश में जनता को अधिकार देने के लिए कई सारे कानून बने हैं. अच्छी बात है. ये कानून हमारे अधिकारों को हनन होने से बचाते हैं. लेकिन एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर कई बरसों से कानून बनाने की मांग हो रही है, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. ये मुद्दा है- “मैरिटल रेप”. यानी शादी के बाद ज़बरन सेक्शुअल रिलेशन बनाने का मुद्दा. यदा-कदा ये मैटर खबरों में आ ही जाता है, जैसे एक बार फिर आया है. दरअसल, इस बार छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कह दिया है कि पति अगर शादी के बाद पत्नी से सेक्शुअल रिलेशन बनाए, फिर चाहे वो पत्नी की मर्ज़ी के खिलाफ ही क्यों न हो, वो रिलेशन रेप नहीं कहलाएगा. आज हम इसी मुद्दे पर डिटेल में बात करेंगे. हर पहलुओं को जानने की कोशिश करेंगे.

क्या है पूरा मामला?

साल 2017 में छत्तीसगढ़ में एक महिला और पुरुष की शादी हुई. लेकिन शादी के कुछ समय बाद महिला ने बेमेतरा पुलिस स्टेशन में पति और ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत की. बताया कि शादी के बाद कुछ दिन तक सब ठीक था, लेकिन फिर दहेज की मांग होने लगी और इसे लेकर ससुराल वाले उसे प्रताड़ित करने लगे, मारपीट की जाने लगी. इसके अलावा महिला ने ये भी आरोप लगाया कि उसके पति ने कई बार ज़बरन उससे अनैचुरल फिज़िकल रिलेशन बनाया था. आरोप लगाया कि पति ने उसकी वजाइना में उंगली और मूली इन्सर्ट की थी. शिकायत के बाद पुलिस ने छानबीन की और एक चार्जशीट फाइल की. महिला के पति और ससुराल वालों के खिलाफ 498-ए, यानी शादीशुदा महिला पर अत्याचार, सेक्शन 377 यानी अनैचुरल सेक्शुअल रिलेशन बनाना, 376 यानी रेप और 34 यानी एक ही इरादे से कई लोगों का मिलकर अपराध करना. इन सबके तहत केस दर्ज किया गया. बेमेतरा में एडिशनल सेशन्स जज ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आरोपियों के खिलाफ इन्हीं चार सेक्शन्स में चार्जेस फ्रेम किए. ट्रायल कोर्ट के इसी आदेश को आरोपियों ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी.

हाई कोर्ट में आरोपियों के वकील ने कहा कि इस केस में महिला और पुरुष, दोनों कानूनी तौर पर शादीशुदा पति-पत्नी हैं. ऐसे में सेक्शन 376 और 377 के तहत आरोप तय नहीं होने चाहिए. क्योंकि भारत में मैरिटल रेप को मान्यता नहीं है और न ही IPC में उसे अपराध का दर्जा गिया गया है. 377 सेक्शन के लिए कहा गया कि इसके तहत आरोप तय होने के लिए कारनल इंटरकोर्स ज़रूरी होता है, जो इस केस में नहीं है. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 23 अगस्त को इस मामले में फैसला दिया. कोर्ट ने कहा-

“IPC के सेक्शन 375 के एक्सेप्शन 2 में ये साफ किया गया है कि एक पति द्वारा उसकी पत्नी से सेक्शुअल रिलेशन बनाना, तब तक रेप नहीं होगा जब तक पत्नी की उम्र 18 से कम न हो. इस मामले में महिला और पुरुष कानूनी तौर पर शादीशुदा हैं. इसलिए पुरुष अगर महिला से सेक्शुअल रिलेशन बना रहा है, तो वो रेप के दायरे में नहीं आएगा, तब भी जब ये रिलेशन ज़बरन हो या फिर महिला की मर्ज़ी के खिलाफ हो. इसलिए पति के ऊपर सेक्शन 376 के तहत जो चार्ज लगे हैं वो गलत और अवैध हैं. इसलिए उसे सेक्शन 376 के चार्ज से मुक्त किया जाता है.”

हालांकि हाई कोर्ट ने सेक्शन 498-ए और 34 के तहत लगे चार्जेस में बदलाव नहीं किया. साथ ही सेक्शन 377 के तहत लगे आरोपों को भी गलत नहीं माना. हाई कोर्ट ने कहा-

“इस केस में महिला ने साफ तौर पर कहा है कि उसकी मर्ज़ी के बिना उसके पति ने कई बार अनैचुरल सेक्शुअल रिलेशन बनाए थे. उसके प्राइवेट पार्ट में उंगली और मूली इन्सर्ट की थी. हालांकि और किस तरह के अनैचुरल रिलेशन बनाए गए, उसके बारे में महिला ने नहीं बताया. इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा 377 के तहत चार्जेस फ्रेम करने के फैसले पर हमें कोई गलती या अवैधता नहीं दिखती.”

ये तो आपने जान लिया पूरा केस. इसमें दो बातें साफ तौर पर हमारे सामने आई. पहला- मैरिटल रेप को भारत में कंसिडर ही नहीं किया जाता. दूसरा- महिला के प्राइवेट पार्ट में कोई ऑब्जेक्ट डालना अनैचुरल सेक्स के दायरे में आता है. पहले बात करते हैं मैरिटल रेप के मुद्दे पर. IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना था साल 1860 में. ज़ाहिर है तब दुनिया वैसी नहीं थी, जैसी आज है. हालांकि समय-समय पर इस कोड में ज़रूरत के हिसाब से बदलाव होते रहे, लेकिन मैरिटल रेप के मुद्दे पर कोई बदलाव नहीं हुआ. ये कानून ब्रिटिशर्स ने बनाए थे, जब वो चले गए तो यही कोड आगे बढ़ता गया. हालांकि, यूनाइटेड किंगडम ने तीस साल पहले मैरिटल रेप को अपराध कंसिडर कर लिया था. लेकिन भारत में ये रेप की श्रेणि से बाहर बना रहा.

मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए क्या-क्या हुआ?

मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए देश भर की अलग-अलग अदालतों में समय-समय पर कई याचिकाएं लगाई गईं. लेकिन अब तक कोई भी याचिका अपना मकसद पूरा नहीं कर पाई. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला की इसी मुद्दे पर डाली गई याचिका खारिज कर दी थी. कहा था कि एक व्यक्ति के लिए पूरे कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता. BBC की मई 2015 में छपी एक रिपोर्ट में, मैरिटल रेप झेलने वाली एक महिला ने बताया था- “मुझे आज भी याद है. वो 14 फरवरी 2014 की रात थी. इस दिन उसका बर्थडे होता था. हमारे बीच झगड़ा हुआ और फिर उसने मेरे साथ ज़बरदस्ती की. मैं जितना कर सकती थी विरोध किया, लेकिन वो रुका नहीं. उसने मेरे अंदर टॉर्च तक इन्सर्ट कर दिया. मुझे अस्पताल में एडमिट होना पड़ा और मैं 60 दिनों तक ब्लीड करती रही.”

दिल्ली हाई कोर्ट में साल 2015 में NGO RIT फाउंडेशन और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमन्स असोसिएशन ने भी मैरिटल रेप को क्रिमिनलाइज़ करने की मांग रखते हुए याचिका डाली थी. इस याचिका का विरोध किया था NGO मेन वेलफेयर ट्रस्ट ने, इन्होंने भी एक याचिका डाली थी. इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जुलाई 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने बहुत अहम बात कही थी. कहा था-

“शादी का ये मतलब नहीं है कि फिज़िकल रिलेशन्स के लिए औरतें हमेशा तैयार रहेंगी और कंसेंट देंगी. आदमी को ये साबित करना होगा कि वो यानी महिला भी कंसेंटिंग पार्टी है.”

खैर, कोर्ट ने ये केवल टिप्पणी की थी, कोई फैसला तब नहीं सुनाया था. “द क्विंट’ की एक रिपोर्ट की मानें तो इस मामले में दोनों पक्षों ने अपने तर्क दे दिए थे, सुनवाई करीब करीब खत्म हो गई थी, लेकिन कोविड-19 की वजह से कोर्ट के कामकाज पर असर पड़ा और अभी तक फैसला सामने नहीं आया है.

इसी साल मार्च में तब के CJI एसए बोबड़े ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था-

“पति चाहे कितना भी क्रूर हो, अगर दो व्यक्ति पति-पत्नी के तौर पर साथ रह रहे हैं, तो उनके बीच होने वाला सेक्शुअल इंटरकोर्स क्या रेप कहला सकता है?”

इसी तरह की और भी अदालतों ने समय-समय पर मैरिटल रेप के मुद्दों पर सुनवाई की, लेकिन इसे अपराध नहीं माना गया. हां कई बार अदालतों ने संवेदनशीलता के साथ इन मामलों को हैंडल किया. जैसे केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था-

“एक पति का मनमाना रवैया, जिससे पत्नी के शरीर पर खुद के अधिकार का हनन हो, मैरिटल रेप है. भले ही मैरिटल रेप अपराध के दायरे में नहीं आता, लेकिन यह शारीरिक और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में जरूर आता है.”

अपराध क्यों नहीं?

मैरिटल रेप अपराध के दायरे में क्यों नहीं आता, ये जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की एडवोकेट प्रांजल से. उन्होंने बताया-

“मैरिटल रेप के लिए कानून नहीं है, ये दुर्भाग्य की बात है. लेकिन इसके कुछ कारण भी हैं. जैसे, भारत में गरीबी और अशिक्षा बहुत ज्यादा है. लोगों में उतनी समझ है नहीं. दूसरा- भारत का जो फैमिली कल्चर है, उसमें अगर मैरिटल रेप को क्राइम बना दिया जाता है, तो बहुत सारे ऐसे मामले आएंगे पति-पत्नी के बीच के झगड़े के, जिसमें एक नॉर्मल सेक्शुअल इंटरकोर्स को लेकर भी मेल मेंबर्स के ऊपर रेप का आरोप लगाया जा सकता है. ये सबसे बड़ा कारण है. पर अगर कोई महिला अपने ससुराल में रोज़ फिज़िकली या मेंटली हैरेस हो रही है, और इन मामलों में भी आप शादी को बचाने के लिए मैरिटल रेप को क्राइम नहीं बना रहे हो, तो ये सही ऑब्ज़र्वेशन नहीं है किसी भी कोर्ट या सरकार का. कोर्ट्स ने भी कई बार ये मेंशन किया है कि भारत में मैरिटल रेप पर कानून होना चाहिए.”

हमारे देश में शादी को सेक्स के लाइसेंस के तौर पर देखा जाता है. इसलिए जब भी कोई महिला शादी के बाद होने वाले यौन शोषण की शिकायत करती है, उसे रेप की धाराओं के तहत इंसाफ नहीं मिल पाता. हां घरेलू हिंसा एक्ट में कई प्रावधान ऐसे हैं, जिसमें क्रूरता के बेसिस पर औरत को इंसाफ देने का प्रावधान है, लेकिन रेप की धाराओं में नहीं. ये समझा जाता है कि शादी के बाद पति-पत्नी के बीच बनने वाले शारीरिक संबंध, फिर चाहे वो पत्नी की मर्ज़ी के खिलाफ ही क्यों न हो, रेप नहीं होगा. यहां तक कि हमारी सरकार ने भी साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मैरिटल रेप को क्राइम कंसिडर नहीं किया जाना चाहिए, इस आधार पर कि ऐसा होने से ‘शादी का संस्थान अस्थिर’ हो जाएगा.

अगर दुनिया के बाकी देशों की बात करें, तो ऑस्ट्रेलिया ने साल 1976 में ही मैरिटल रेप को क्राइम कंसिडर कर लिया था. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नॉर्वे, डेनमार्क, पौलैंड में भी ये अपराध है. यूएस में 1970 से 1993 के बीच 50 राज्यों में इसे अपराध के दायरे में लाया गया था. UN विमन्स 2011 की एक रिपोर्ट की मानें तो 179 देशों में से 52 देशों ने मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने के लिए अपने कानूनों में स्पष्ट तौर पर बदलाव किए हैं.

आखिर में आपको हम सेक्शन 377 के तहत आने वाले अनैचुरल सेक्शुअल रिलेशन के बारे में भी बताते हैं. हमें इस मुद्दे पर जवाब भी वकील प्रांजल ने दिया. उन्होंने बताया-

“सेक्शन 377 में ये लिखा है कि कोई भी सेक्शुअल इंटरकोर्स अगर प्रकृति के ऑर्डर के खिलाफ होता है, तो वो अप्राकृतिक कहलाएगा. मतलब अगर कोई दो लोग सेक्शुअल इंटरकोर्स कर रहे हैं और उसके रिज़ल्ट से बच्चे नहीं हो सकते, तो इस केस में इसे अप्राकृतिक सेक्शुअल ऑफेंस बोलेंगे. जैसे ओरल सेक्स हो गया. उससे बच्चे नहीं हो सकते, तो उसे अप्राकृतिक सेक्स की कैटेगिरी में रखेंगे. ऐसे जितने भी एक्ट्स हैं, जिससे बच्चे नहीं हो सकते, ऑर्डर ऑफ नेचर के खिलाफ जो है, वो अप्राकृतिक है.”

खैर, हमारे देश में मैरिटल रेप को लेकर कब ज़रूरी बदलाव होंगे, हमें नहीं पता. लेकिन उम्मीद है कि आने वाला समय बेहतर होगा.


वीडियो देखें: मैरिटल रेप केस में पति से आरोप हटाते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

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