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ट्रांसजेंडर्स से सुनिए, पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करना बुरे सपने से कम नहीं

आज सुबह जब मैं खबरें पढ़ रही थी, तो दो खबरों में मेरी नज़रें अटक गई. पहली दिल्ली से थी, और दूसरी महाराष्ट्र के वसई से थी. दिल्ली वाली खबर ये थी कि यहां NDMC यानी न्यू दिल्ली मुनिसिपल काउंसिल ने ट्रांसजेंडर्स के लिए एक पब्लिक टॉयलेट का उद्घाटन किया है. ये उद्घाटन 28 जून को हुआ था. वहीं वसई में एक NGO ने ट्रांसजेंडर्स के लिए स्कूल खोला है. जहां ट्रांसजेंडर्स कम्युनिटी के लोगों को मुफ्त में शिक्षा दी जाएगी. दोनों ही खबरें उस कम्युनिटी से जुड़ी है, जिसे बरसों तक हम, हमारा समाज और हमारी सरकारें नज़रअंदाज़ करती रही थीं. लेकिन पिछले कुछ साल में इस समुदाय के लिए कुछ-कुछ अहम काम हो रहे हैं. आज जानेंगे कि ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग से पब्लिक टॉयलेट की ज़रूरत क्यों है? टॉयलेट का इस्तेमाल करने में और स्कूली शिक्षा के दौरान उन्हें किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

पब्लिक टॉयलेट कहां खोला गया?

NDMC ने 28 जून को एक ट्वीट किया, जो आप अभी अपनी स्क्रीन पर देख रहे होंगे. जानकारी दी कि शास्त्री भवन के पास प्रेस क्लब पार्किंग में ट्रांसजेंडर्स के लिए एक्सक्लूसिव पब्लिक टॉयलेट का इनोग्रेशन किया गया है. ये उद्घाटन ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लोगों द्वारा ही किया गया. NDMC के चेयरमैन और सेक्रेटरी की मौजूदगी में. इस टॉयलेट का इस्तेमाल केवल ट्रासजेंडर के लोग ही करेंगे. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, सिविक बॉडी के एक सीनियर अधिकारी ने जानकारी दी कि NDMC एरिया के तहत आने वाले इलाकों में इस तरह के और भी पब्लिक टॉयलेट खोलने की प्लानिंग है. इस साल जनवरी में ही NDMC ने अपने एनुअल बजट में ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग से पब्लिक टॉयलेट बनाने का ऐलान किया था. दिल्ली सरकार ने अपने सभी विभागों, अधिकारियों, मुनिसिपल कॉर्पोरेशन्स और ऑटोनॉमस बॉडीज़ को निर्देश दिया है कि नेशनल कैपिटल में ट्रांसजेंडर्स के लिए ज़रूरत के हिसाब से टॉयलेट बनाए जाएं.

कहा जा रहा है कि दिल्ली में ये पहला ऐसा टॉयलेट है, जो केवल और केवल ट्रांसजेंडर्स के लिए है. हालांकि देश के कुछ अन्य ज़िलों में भी ऐसे टॉयलेट्स बनाए जा चुके हैं. इस साल फरवरी में यूपी के बनारस में ट्रांसजेंडर्स के लिए एक टॉयलेट बनाया गया था. तब कहा गया था कि ये इस तरह का यूपी का पहला टॉयलेट है. मेसूर और भोपाल में भी ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग पब्लिक टॉयलेट बनाया जा चुका है. भोपाल में साल 2017 में ये टॉयलेट खोला गया था, तो मेसूर में इसके पहले.

स्कूलों के क्या हाल हैं?

वहीं अब स्कूलों की बात करते हैं. महाराष्ट्र के पालघर के वसई इलाके में एक NGO ने ट्रांसजेंडर्स के लिए स्कूल की शुरुआत की है. समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, ये स्कूल ट्रांसजेंडर समुदाय से आने वाले लोगों को फ्री में शिक्षा मुहैया कराएगा. NGO की फाउंडर और चेयरपर्सन रेखा त्रिपाठी कहती हैं-

“कुछ साल पहले एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ने मुझे बताया था कि इस समुदाय के बहुत सारे लोगों को नौकरी पाने में बहुत दिक्कत होती है, क्योंकि उन्हें बेसिक स्कूली शिक्षा भी नहीं मिली होती है. तंग आर्थिक हालात और सोशल स्टिगमा का इस सबमें बड़ा योगदान है. चाहे व्यक्ति किसी भी जेंडर का हो, हर किसी के पास शिक्षा और अवसर की समान पहुंच होनी चाहिए. अभी तक इस स्कूल में 25 वयस्क और कुछ बच्चों ने दाखिला ले लिया है.”

Transgender School
वसई में खुला ट्रांसजेंडर्स का स्कूल. (फोटो- ANI)

इस स्कूल के लिए भी कहा जा रहा है कि ये अपने आप में पहला ऐसा स्कूल है, जो ट्रांसजेंडर्स की शिक्षा पर फोकस करता है. लेकिन ये जान लीजिए कि ऐसे स्कूल देश के कुछ हिस्सों में पहले भी खोले जा चुके हैं. जैसे केरल के कोच्ची में साल 2016 में ही इस तरह के एक स्कूल की शुरुआत हुई थी, नाम था सहज इंटरनेशनल स्कूल. 2019 में भी ऐसी रिपोर्ट्स आई थीं कि यूपी में भी ट्रांसजेंडर्स के लिए एक स्कूल खोला जाएगा.

हमने ये पता लगाने की बहुत कोशिश की, कि अब तक कितने पब्लिक टॉयलेट्स और स्कूल ट्रांसजेंडर्स के लिए खोले गए हैं, लेकिन इसका एग्जेक्ट आंकड़ा हमें मिला नहीं. हालांकि इतना पता चला कि बहुत से राज्यों ने और NGOs ने इस दिशा की तरफ काम करना शुरू कर दिया है. लेकिन सच ये है कि स्पीड बहुत ही धीमी है. कुछ के उदाहरण हमने आपको पहले ही दे दिए हैं.

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

ट्रांसजेंडर्स के लिए पब्लिक प्लेसेस में अलग से टॉयलेट बनाने की कवायद की शुरुआत साल 2014 से हम मान सकते हैं. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही अहम फैसला सुनाया था. दिन था 15 अप्रैल 2014. कोर्ट ने कहा था कि हिजड़ा या ट्रांसजेंडर्स को अब ‘थर्ड जेंडर’ समझा जाए. ताकि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हो. पहले ट्रांसजेंडर्स को कई सरकारी कागज़ों में खुद को या तो मेल बताना पड़ता था या फिर फीमेल, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें ‘थर्ड जेंडर’ का दर्जा दिया गया.

अपने फैसले में कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि ‘थर्ड जेंडर’ के तहत आने वाले लोगों को सभी प्रकार के अधिकार दिए जाएं, उन्हें सामाजिक तौर पर भी एकसमान ट्रीट किया जाए. उनके लिए HIV सेरो-सर्विलेंस सेंटर्स बनाने के भी निर्देश दिए गए. ट्रांसजेंडर्स या हिजड़ा समुदाय के लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जैसे डर, सामाजिक शर्मिंदगी, जेंडर डिसफोरिया, सोशल प्रेशर, डिप्रेशन, सुसाइडल टेंडेंसी, सोशल स्टिगमा वगैरह-वगैरह. इन सारी दिक्कतों को कम करने के लिए भी कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को अहम कदम उठाने के निर्देश दिए. साथ ही कहा कि इस समुदाय के लोगों के लिए अलग पब्लिक टॉयलेट्स की व्यवस्था भी की जाए.

माने हमारी सरकारों का फर्ज़ है कि वो ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग पब्लिक टॉयलेट बनाएं. इस फैसले को आए हुए छह से सात साल हो चुके हैं. लेकिन अभी भी आप अगर कहीं पब्लिक टॉयलेट देखें, तो आपको दो कैटेगिरी दिखती होंगी, या तो मेल या फिर फीमेल. ज्यादा ही हो गया तो दिव्यांग. आपने कहां किसी पब्लिक टॉयलेट के आगे “फॉर ट्रांसजेंडर” लिखा देखा है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दो साल बाद 2016 में मैसूर में ट्रांसजेंडर के लिए पहला पब्लिक टॉयलेट खोला गया था. ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 की जनगणना बताती है कि भारत में करीब पांच लाख, अगर एकदम सटीक आंकड़ों में जाएं तो 488,000 ट्रांसजेंडर्स हैं. हालांकि ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट्स ये दावा करते हैं कि असर संख्या आधिकारिक आंकड़ों से छह से सात गुना ज्यादा होगी. क्योंकि बहुत सारे लोग सोशल स्टिगमा के चलते अपनी आइडेंटिटी रिवील नहीं कर पाते.

खैर, वापस पब्लिक टॉयलेट के मुद्दे पर आते हैं. 2017 में केंद्र की तरफ से एक गाइडलाइन्स जारी की गई थी, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) को. जिसमें कहा गया था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति को उसकी मर्ज़ी के हिसाब से पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करने दिया जाए, ये उसकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है कि वो पुरुषों के टॉयलेट का इस्तेमाल करे या फिर महिलाओं के. हालांकि आप ये भी जान लीजिए कि ट्रांसजेंडर्स का एक बड़ा हिस्सा खुद को न तो आदमी मानता है और न ही औरत. ऐसे में उन्हें पुरुषों या औरतों के लिए बने पब्लिक टॉयलेट को इस्तेमाल करने में खासी दिक्कत आती है. उनकी दिक्कतें जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने कुछ ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से और उनके लिए काम करने वाले लोगों से बात की. पुणे में रहने वाले ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट ऋषिकेश राउत कहते हैं-

“ट्रांसजेंडर पर्सन के तौर पर पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करने में बड़ी दिक्कत होती है. लोग मुझे फॉलो करते हैं. देखते हैं ऊपर-नीचे कि मैं कौन हूं. लड़का हूं या लड़की हूं या ट्रांसजेंडर हूं. बहुत ज्यादा वायलेंस होता है, सेक्शुअल वायलेंस भी. काफी टाइम जब मैंने मेल वॉशरूम इस्तेमाल किया है, इवेंट्स में या फिर पब्लिक प्लेसेस में, पीछे से लोग आकर मुझे पकड़ लेते हैं. कोई खींचता है, बहुत ह्यूमिलिएशन होता है पब्लिकली. बहुत डरावना है. जनरली मैं पब्लिक प्लेस में मेल टॉयलेट इस्तेमाल करती हूं क्योंकि अगर बिना मेकअप किए, बिना बाल खोले या बिना फेमिनिन कपड़े पहने मैं फीमेल टॉयलेट में चली गई, तो बहुत प्रॉब्लम होगी. मुझे पीट भी सकते हैं. वो ये सोचेंगे कि कोई लड़का आ गया. इसलिए मैं मेल वॉशरूम इस्तेमाल करती हूं. लेकिन अगर मैं किसी प्रोग्राम में हूं, कंपनी या इंस्टीट्यूशन में हूं, तो रिक्वेस्ट करके डिसेबल वॉशरूम, जो जेंडर न्यूट्रल होता है उसे इस्तेमाल करती हूं. अगर फीमेल वाले कपड़े पहने हैं या मेकअप किया है, तो फिर फीमेल वॉशरूम इस्तेमाल करती हूं. हम लोग, मतलब मैं और मेरे ट्रांसजेंडर दोस्त पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल करना अधिकतर अवॉयड करते हैं. हम पानी भी कम पीते हैं, क्योंकि हमको लगता है कि अगर हम ज्यादा पानी पिएंगे तो वॉशरूम भी ज्यादा जाना होगा.”

Rishikesh Raut
ऋषिकेश राउत.

ऋषिकेश ने अपने साथ वॉशरूम में हुई एक घटना के बारे में भी बताया-

“मेरे साथ ये हुआ है कि पीछे से आकर मुझे पकड़ा गया है. एक बार ये हुआ कि मैं ऑफिस में मेल वॉशरूम इस्तेमाल कर रही थी, वहां एक आदमी था, वो पेंट के बीच में हाथ रखकर खुजली करने लगा मुझे देखकर. मुझे लगा ये एक बार हुआ है, लेकिन मैंने देखा कि ये हर बार हो रहा है. वो आदमी जो वहां टॉयलेट साफ करता था, वो हर बार मुझे देखकर ऐसा ही करता था. एक बार वो मेरे पास आकर मुझे हाथ लगाने लगा, इसके बाद से मैं उस ऑफिस के वॉशरूम में कभी नहीं गई, ऑफिस ही छोड़ दिया.”

ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट सोनाली दल्वी कहती हैं-

“हम जब भी पब्लिक टॉयलेट में जाते हैं, तब लोगों की भौहें चढ़ जाती हैं. वो हमें घूरते हैं. तिरस्कार, कटाक्ष भरी नज़रों से हमें देखा जाता है कि ये लोग क्यों आ गए. इनका क्या काम है. इसलिए हर एक जगह पर जेंडर न्यूट्रल टॉयलेट होना बहुत ज़रूरी है. बचपन में एक ट्रांस बच्चा, जो अंदर से लड़की जैसा महसूस करता है, वो फीमेल टॉयलेट इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि वो लड़के के शरीर के साथ पैदा हुआ था. इसलिए उसे बॉयज़ टॉयलेट में भेजा जाता है. वहां जो बुलिंग-हैरेसमेंट होता है, वो बहुत बुरा होता है. इसी वजह से एजुकेशन फील्ड में दिक्कतें आती हैं. कठिनाई आती है. इसी वजह से हमारे बच्चे पढ़ नहीं पाते, आगे बढ़ नहीं पाते.”

Sonali

अब थोड़ा स्कूल वाले मुद्दे पर बात करते हैं. एक ट्रांसजेंडर बच्चा, जिसे बचपन में या तो लड़का समझा जाता है या लड़की. और जन्म के समय निर्धारित हुए इसी जेंडर के हिसाब से उसे स्कूल भेजा जाता है, नामकरण किया जाता है, उसी तरह पाला पोसा जाता है. ऐसे बच्चों की स्कूली लाइफ वैसी नहीं होती, जैसी होनी चाहिए. उन्हें कदम-कदम पर खुद के अंदर चल रहे सवालों से डील करना पड़ता है. अपने इसी स्कूली एक्सपीरियंस के बारे में हमें बताया डॉक्टर अक्सा शेख ने, जो एक ट्रांस वुमन हैं. जो बचपन में ऑल बॉयज़ स्कूल में गई थीं. उन्होंने बताया-

“ट्रॉमा कि हद ये कि मेरा एडमिशन एक ऑल बॉयज़ स्कूल में हो गया. तो घर आने के बाद तो मेरे पास सहेलियां थीं, लेकिन स्कूल में वो ऑप्शन नहीं था. मेरा स्कूल का समय काफी अकेलेपन में बीतता था. वॉशरूम जाने में भी मन सहम जाता था. इतना कि रिसेस के टाइम पर मैं कभी नहीं जा पाती थी क्योंकि दूसरे लोग वहां होते थे. मैं पीरियड के दौरान टीचर से परमिशन लेकर जाती थी.

Aqsa Shaikh 222
डॉक्टर अक्सा एक वैक्सिनेशन सेंटर की नोडल अधिकारी भी हैं. (फोटो- इंस्टाग्राम: dr.aqsa.shaikh)

केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, अलग-अलग समय पर कई सारी ऐसी खबरें आती रही हैं, जिन्हें सुनकर लगता है कि मानो सरकारें ट्रांसजेंडर्स के लिए काफी कुछ कर रही हैं. कहीं मेट्रो के पूरे एक स्टेशन की बागडोर ट्रांसजेंडर समुदाय से आने वालों के हाथ में दे दी जाती है, तो कहीं चुनाव में ड्यूटी लगाई जाती है. Transgender Persons (Protection of Rights) Bill भी आया था, जो दिसंबर 2019 में एक्ट बना. हालांकि ट्रांस कम्युनिटी के कई लोग इस एक्ट के विरोध में हैं. लेकिन हमारा अहम मुद्दा ये है कि ये सारे काम जो सरकारें ट्रांसजेंडर्स के भले के लिए करने का दावा करती हैं, वो असल में होते भी हैं या नहीं, इसका जवाब भी हमें दिया ट्रांसजेंडर समुदाय से आने वाले लोगों ने. एक्टिविस्ट सोनाली दल्वी कहती हैं-

“सरकार की तरफ से जो ऐलान होते हैं, वो फॉलो नहीं होते. कुछ भी नहीं हुआ. साथ काम करने वाले ट्रांसजेंडर्स बताते हैं कि उनके स्टेट में ये स्कीम आ रही है, वो हो रहा है. लेकिन पुणे महाराष्ट्र में ऐसा कुछ भी नहीं है. कोई स्कीम नहीं है. हेल्थ से रिलेटेड मुद्दों पर मैं दस बरसों से फाइट कर रही हूं. मैं अस्पतालों में ट्रांसजेंडर्स के लिए 20 बेड्स की मांग कर रही हूं. हर सरकारी अस्पताल में ट्रांसजेंडर्स के लिए टॉयलेट होने चाहिए, OPD होना चाहिए, एक वार्ड होना चाहिए, बेड्स होना चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. हमारे यहां एक वायरस आता है, उस पर सारी रिसर्च होती है, पर इंसान को ज़िंदा कैसे रखना है, कैसे ट्रीट करना है, ये पता नहीं. हमें हमेशा ही आइसोलेट किया गया है. हमारे लिए आइसोलेशन नया नहीं है. हेट्रोसेक्शुअल सोसायटी के लिए ये नया होगा, पर सोशल डिस्टेंसिंग हम लोग बचपन से झेलते आए हैं. ये आइसोलेशन पहले ब्रिटिशर्स ने किया, फिर हमारे समाज ने किया और अब कोरोना कर रहा है. तो हम लोग हमेशा ही आइसोलेट रहे हैं. हम अस्पतालों में मेल्स के बीच नहीं रह सकते, जब फीमेल में रखो तो कहा जाता है कि ऐसे क्यों चलते हो, ऐसे क्यों बोलते हो, आपको कब पता चला कि आप ऐसी हो.”

भारत में ट्रांसजेंडर्स को साल 1994 में वोटिंग अधिकार मिले थे. इसके बाद देश को पहली ट्रांसजेंडर विधायक मिली साल 1998 में. मध्य प्रदेश की पहली ट्रांसजेंडर विधायक बनीं शबनम मौसी. जो बताती हैं कि लोगों के कहने पर ही उन्होंने चुनाव लड़ा था. चुनाव के दौरान उन पर हमला भी हुआ था, हालांकि पुलिस ने तब उन्हें बचा लिया था. विधानसभा में तो ट्रांसजेंडर्स कम्युनिटी के लोग पहुंच गए, लेकिन अभी तक कोई भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति सांसद नहीं बना है.


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