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ओलंपिक्स में जिमनास्ट लड़कियों को छोटे कपड़े पहनना क्यों है जरूरी?

मेरी एक दोस्त है, छोटे शहर से है. वहां परिवार के साथ रहती थी, कई तरह की पाबंदियां थीं, खासतौर पर कपड़ों को लेकर. कुछ साल पहले वो नौकरी के लिए दिल्ली आई. पैसे कमाने के बाद मनमुताबिक जीने की हिम्मत आई उसमें. उसने शॉर्ट्स पहने पहली, और फोटो खिचाई. उसकी एक दोस्त ने तस्वीर कर दी फेसबुक पर अपलोड. रिश्तेदारों के कॉल्स पहुंच गए उसकी मम्मी के पास. फिर गुस्से में मम्मी ने अपनी बेटी को कॉल किया और जमकर डांट लगाई. अब आप सोच रहे होंगे कि ये घटना मैंने आपको क्यों सुनाई. ये बताने के लिए कि आज भी लड़कियों को हर कदम पर अलग-अलग तरह के संघर्ष का सामना करना पड़ता है. और कपड़ों के मामले में तो हालात ज्यादा नहीं बदले हैं. फिर चाहे वो एक आम लड़की हो या फिर कोई नामी खिलाड़ी या एथलीट. अब टोक्यो ओलंपिक्स में ही देख लीजिए, हारने और जीतने वालों पर तो खबरें बन ही रही हैं, लेकिन महिला खिलाड़ियों और एथलीट्स को क्या पहनना चाहिए, इस पर भी एक बार फिर बहस छिड़ गई है. दरअसल, टोक्यो ओलंपिक्स में भाग ले रही जर्मनी की महिला एथलीट्स ने एक बेहद खास कदम उठाया है, उन्होंने पूरे शरीर को ढकने वाला अटायर पहनकर नई शुरुआत की है. क्या है पूरा मामला, आपको डिटेल में बताएंगे

क्या है मामला?

टोक्यो ओलंपिक्स 2020 चल रहा है. बीते रविवार यानी 25 जुलाई को क्वालिफिकेशन राउंड हुए, इसमें जर्मनी की महिला जिमनास्ट्स ने लियटार्ड्स (leotards) की जगह यूनिटार्ड्स (unitards) पहनकर हिस्सा लिया. लियटार्ड्स उस कपड़े को कहते हैं जो वन पीस में होता है और गर्दन से लेकर पैरों के ऊपर तक कसकर फिट बैठता है. इस पर्टिकुलर अटायर को डांसर्स और कुछ स्पोर्ट्स में महिलाएं पहनती हैं. इन्हीं स्पोर्ट्स में शामिल है जिमनास्ट. वहीं यूनिटार्ड्स वो वन पीस अटायर है, जो पूरे शरीर को कवर करता है, ये गर्दन से लेकर पैरों के टखनों तक फिट बैठता है.

बरसों से महिला जिमनास्ट्स बिकनी-कट वाले लियटार्ड्स पहनकर ही परफॉर्म करते आई हैं. ऐसे में ओलंपिक्स में जर्मन की महिला जिमनास्ट्स का यूनिटार्ड्स पहनना, वाकई हैरान करता है और इसी वजह से ये मुद्दा खबरों में है. ‘CNN’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मन जिमनास्ट एलिसाबेथ साइट्ज़ (Elisabeth Seitz)का कहना है-

“मुद्दा ये है कि आप किसमें कम्फर्टेबल महसूस करते हैं. हम हर महिला को ये दिखाना चाहते थे कि हर किसी को अपनी पसंद के अटायर पहनने का अधिकार है.”

जर्मन टीम ने पहली बार यूनिटार्ड्स इस साल अप्रैल में पहने थे, यूरोपियन आर्टिस्टिक जिमनास्टिक्स चैम्पियनशिप्स के दौरान. उस वक्त जर्मन जिमनास्टिक्स फेडरेशन ने कहा था-

“ये आउटफिट्स ‘जिमनास्टिक्स में सेक्शुअलाइज़ेशन” के खिलाफ एक स्टेटमेंट हैं. इसका मकसद खुद को सौंदर्यपूर्ण रूप से प्रस्तुत करना है- बिना असहज महसूस किए.”

German Gymnasts At Tokyo Olympics (1)
जर्मन महिला जिमनास्ट्स ओलंपिक्स में. (फोटो- इंस्टाग्राम)

एलिसाबेथ साइट्ज़ ने बताया कि बाकी एथलीट्स ने भी इस फैसले का स्वागत किया है. वो उम्मीद करती हैं कि भविष्य में ज्यादा से ज्यादा एथलीट्स अपनी पसंद के गारमेंट्स पहनने को लेकर आज़ाद महसूस करेंगे. उन्होंने आगे कहा-

“ज्यादातर लोग यूनिटार्ड्स को लेकर पॉज़िटिव थे, लेकिन यूरोपियन चैम्पियनशिप्स के बाद बहुत ही कम समय था, इस वजह से बाकी लोग अपना यूनिटार्ड्स डिज़ाइन नहीं करवा पाए. हो सकता है कि भविष्य में ऐसा हो.”

जब अप्रैल में एलिसाबेथ ने यूनिटार्ड्स पहने थे, तब उन्होंने इंस्टाग्राम पर स्टेटस भी लगाया था. लिखा था-

“ये हर उस जिमनास्ट के लिए उदाहरण है जो नॉर्मल सूट्स में असहज या सेक्शुअलाइज़्ड महसूस करता है. क्योंकि हमारे नज़रिए में, हर जिमनास्ट ये फैसला लेने में सक्षम होना चाहिए कि वो किसमें सबसे ज्यादा सहज महसूस करती है और फिर वो जिमनास्टिक्स करे.”

पुरुष जिमनास्ट्स की बात करें, तो वो यूनिटार्ड्स पहनकर ही परफॉर्म करते हैं. उनकी अटायर ऐसी होती है जो पूरे शरीर को कवर करती है. लेकिन महिला जिमनास्ट्स को हमने ज्यादातर बिकनी-कट लियटार्ड्स में ही देखा है. वॉग मैगज़ीन के एक आर्टिकल की मानें तो 1930 से लियटार्ड्स पहनने का चलन चला आ रहा है. अब नियमों कि अगर बात करें, तो अटायर को लेकर इंटरनेशनल जिमनास्टिक्स फेडरेशन ने नियम बनाए हैं, ये फेडरेशन जिमनास्टिक्स की गवर्निंग बॉडी है. ये नियम कहता है-

“जिमनास्ट्स को एक सही स्पोर्टिव नन-ट्रांसपैरेंट लियटार्ड्स या यूनिटार्ड्स पहनना होगा. यूनिटार्ड्स माने वो वन-पीस लियटार्ड्स जो पूरे पैर को टखनों तक कवर करता है. ये एलिगेंट डिज़ाइन के होने चाहिए. महिला जिमनास्ट फुल लेग कवरिंग भी पहन सकती है, लेकिन वो लियटार्ड्स के रंग से मेल खाना चाहिए, उस कवरिंग को चाहे तो लियटार्ड्स के ऊपर पहने या अंदर से पहने.”

जर्मन महिला जिमनास्ट सारा वॉस ने भी 25 जुलाई को यूनिटार्ड्स पहने थे. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, वॉस का कहना है-

“हम औरतें अपनी स्किन में अच्छा महसूस करना चाहती हैं. जिमनास्टिक्स में जब आप बच्चे के शरीर से वयस्क के शरीर में प्रवेश करते हो तो ये महसूस करना मुश्किल होता जाता है. जब मैं छोटी थी, तब मैंने कभी टाइट जिम आउटफिट्स को बड़ी बात नहीं समझी थी. लेकिन जब मुझे प्यूबर्टी आई, जब पीरियड्स आए, तब मैं असहज महसूस करने लगी.”

German Gymnasts At Tokyo Olympics (5)
सारा वॉस का अप्रैल वाला पोस्ट.

हालांकि जर्मन महिला जिमनास्ट्स का ये कहना है कि यूनिटार्ड्स पहनने का ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि वो लियटार्ड्स नहीं पहनेंगी. वो क्या पहनेंगी, ये उन पर निर्भर करता है. अगर किसी दिन वो लियटार्ड्स में सहज महसूस करेंगी, तो वो पहनेंगी. ओलंपिक्स में कॉम्पिटिशन वाले दिन वो क्या पहनेंगी, इस पर अभी तक फैसला नहीं लिया गया है. बहुत से लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है. फेमस अमेरिकन जिमनास्ट सिमोन बाइल्स का कहना है कि वो पर्सनली लियटार्ड्स पहनना पसंद करती हैं, क्योंक इससे वो लंबी दिखती हैं. लेकिन वो जर्मन महिला एथलीट्स के फैसले की तारीफ भी करती हैं और सपोर्ट भी. उनका कहना है कि जिसमें सहज महसूस करें, वो पहनना चाहिए.

जब शॉर्ट्स पहनने पर जुर्माना लगा

महिला खिलाड़ी या एथलीट्स को क्या पहनना चाहिए, क्या नहीं पहनना चाहिए, इसे लेकर कई बरसों से बातें हो रही हैं. तब से, जब से औरतों ने स्पोर्ट्स में आना शुरू किया था. कुछ मामले तो ऐसे भी आए, जहां महिला खिलाड़ियों के कपड़ों की वजह से उन पर जुर्माना तक लगा दिया गया. हम बात कर रहे हैं नॉर्वे की ‘बीच हैंडबॉल टीम’ के बारे में. करीब एक हफ्ते पहले की ही घटना है. बुल्गेरिया में यूरोपियन बीच हैंडबॉल चैम्पियनशिप हुई. यहां नॉर्वे की महिला टीम का मुकाबला स्पेन के साथ था. इसमें महिला खिलाड़ियों ने बिकनी बॉटम की जगह बाइक शॉर्ट्स पहने. इस पर ‘यूरोपियन हैंडबॉल फेडरेशन’ ने 1500 यूरोज़ का यानी करीब डेढ़ लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया टीम के ऊपर. ये कहते हुए कि उनके कपड़े ‘इम्प्रॉपर’ थे, “एथलीट यूनिफॉर्म नियमों के अनुसार नहीं थे.” इस फैसले को लेकर बड़ा वबाल हुआ, नॉर्वेजियन हैंडबॉल फेडरेशन ने भी अपने खिलाड़ियों को सपोर्ट किया और जुर्माने को गलत बताया.

दरअसल, यूरोपियन हैंडबॉल फेडरेशन जिस नियम की बात कर रहा था, वो नियम इंटरनेशनल हैंडबॉल फेडरेशन (IHF) ने बनाए थे. जिसके मुताबिक, बीच हैंडबॉल में पुरुषों को शॉर्ट्स पहनने होते हैं और महिलाओं के लिए बिकनी बॉटम्स पहनने का नियम है. नॉर्वे बीच हैंडबॉल टीम की खिलाड़ी बिकनी बॉटम्स में सहज नहीं महसूस कर रही थीं, इसलिए उन्होंने बाइक शॉर्ट्स पहने थे. खैर, जुर्माना लगने के बाद इसका विरोध हो रहा है. US पॉप स्टार पिंक ने भी नॉर्वे की खिलाड़ियों का सपोर्ट किया और कहा-

“यूनिफॉर्म को लेकर बने इतने सेक्सिस्ट नियम का विरोध करने पर मुझे खिलाड़ियों पर गर्व है. यूरोपियन हैंडबॉल फेडरेशन पर सेक्सिज़्म के लिए फाइन लगना चाहिए. मैं इन खिलाड़ियों का फाइन देने के लिए तैयार हूं.”

सेरेना विलियम्स के कैटसूट पर बैन

एक और घटना बताते हैं. इसके लिए हमें ज्यादा पीछे भी नहीं जाना होगा. अगस्त 2018 का मामला है. एक बड़ी फेमस टेनिस प्लेयर, जो तुरंत-तुरंत मां बनी थीं, उनके एक ब्लैक सूट को बैन कर दिया गया था. याद आया कुछ? हम किस खिलाड़ी की बात कर रहे हैं? यहां बात हो रही है टेनिस स्टार सेरेना विलियम्स की. 2018 फ्रेंच ओपन में सेरेना कोर्ट में उतरीं, एक ब्लैक कैटसूट पहनकर. जो पूरे ब्लैक कलर में था, सही फिटिंग का था और बीच में लाल पट्टी थी. पूरे शरीर को कवर करता हुआ ये सूट था. लेकिन इसे बैन कर दिया गया. फ्रेंच टेनिस फेडरेशन ने ये फैसला इसलिए लिया था क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस सूट से खेल का अपमान हो रहा है. प्रेसिडेंट बर्नार्ड गूदिचेली ने कहा था-

‘हम किसी भी महिला खिलाड़ी को कैटसूट में खेलने की इजाज़त नहीं दे सकते. कभी-कभी बात हद से आगे निकल जाती है. खेल की एक गरिमा है और हमें उसका सम्मान करना चाहए.’

Serena Williams Catsuit
सेरेना विलियम्स के इस ‘कैटसूट’ पर बैन लगा था.

‘vox डॉट कॉम’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सेरेना ने बताया था कि उन्हें ब्लड क्लॉट्स की दिक्कत हो रही थी, और डिलीवरी के बाद से समस्या और बढ़ गई थी. उनकी डिलीवरी काफी कष्टदायक थी. इसलिए उन्होंने ये सूट बनवाया और पहनने का फैसला किया था. नाइकी कंपनी ने खासतौर पर ये सूट बनाया था, ये कम्प्रेशन सूट था, जिससे खून के थक्के न जमें. सेरेना ने यह भी कहा था कि ये कैटसूट पहनने पर उन्हें सुपरहीरो जैसा महसूस होता है. उन्होंने इस सूट को दुनिया की हर उस मां को समर्पित किया था, जिन्हें प्रेग्नेंसी में काफी दिक्कत हुई थी. लेकिन ये सूट बैन कर दिया गया था. दरअसल, टेनिस में महिला खिलाड़ियों के लिए स्कर्ट या फ्रॉक को स्टैणडर्ड माना गया है. और ज़ाहिर है कैटसूट से सेरेना के शरीर के कर्व्स दिख रहे थे, इसलिए ज्यादा दिमाग लगाने वालों ये ड्रेस आपत्तिजनक लगी थी. इस फैसले को उस वक्त नस्लभेदी और सेक्सिस्ट भी कहा गया था.

सानिया मिर्ज़ा की स्कर्ट पर उठा सवाल!

अब बात करते हैं भारत की टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा के बारे में. इन्हें तो न जाने कितनी ही बार इनके टेनिस वाले स्कर्ट को लेकर ट्रोल किया गया. शुरुआत तो तब से हो गई थी, जब सोशल मीडिया का ज़माना ही नहीं था. ‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2005 में सानिया के खिलाफ कुछ मौलवियों के ग्रुप ने आदेश जारी कर दिया था कि सानिया स्कर्ट न पहनें. क्योंकि ये “गैर-इस्लामिक” और “करप्टिंग” है. तब सानिया महज़ 18 साल की थीं. करियर में आगे बढ़ रही थीं. सोचिए, इतनी कम उम्र में ही इस तरह के विरोध का सामना उन्हें करना पड़ा था. इस पर सानिया ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा था-

“जब तक मैं जीत रही हूं, लोगों को इस बात के बारे में नहीं सोचना चाहिए कि मैं 6 इंच लंबा स्कर्ट पहन रही हूं या फिर 6 फीट. मैं कैसी ड्रेस पहनती हूं, ये पर्सनल बात है. ये बहुत डरावना है कि जब भी मैं टी-शर्ट पहनती हूं, अगले तीन दिनों तक बातें होती हैं.”

Sania Mirza
सानिया मिर्ज़ा को उनकी स्कर्ट को लेकर कई बार ट्रोलिंग झेलनी पड़ी. (फोटो- रॉयटर्स)

क्यों इस मुद्दे पर बात ज़रूरी है?

ये तो हमने कुछ घटनाएं आपको बताईं, अगर खोजने और लिखने बैठेंगे, तो न जाने कितने शो बनाने पड़ जाएं. कभी-कभी हम सोचते हैं कि आप एक स्पोर्ट्स पर्सन हो तो इतना कपड़ों के बारे में सोचने की क्या ज़रूरत है. पुरुषों को लेकर तो हमें कोई डिबेट ऐसी सुनाई नहीं देती, तो महिलाओं को इतनी टेंशन क्यों है? आराम से कपड़े पहनों और खेलो. लेकिन यहां ये बात बतानी ज़रूरी है कि महिलाओं की लड़ाई कई स्तरों पर चलती है. पहले तो उनकी लड़ाई इस चीज़ के लिए होती है कि वो स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट कर सकें. खासतौर पर भारत में. क्योंकि उनके पैरेंट्स उन्हें करियर ही नहीं बनाने देते. फिर जब वो इसमें आती हैं तो उनके इस तरह के संघर्ष शुरू होते हैं.

दूसरा ये है कि कभी भी पुरुष के शरीर को लेकर चार तरीके से सवाल नहीं उठाए जाते. लेकिन महिलाओं के शरीर को लेकर उठाए जाते हैं. लड़कियों को हमारे देश में 12-13 साल की उम्र में खेलना ही बंद करा दिया जाता है. शॉर्ट्स पहनकर बाहर जाना तो एक अलग ही बात हो गई. तमाम मिथ्स जुड़े रहते हैं. कि लड़कियां ज्यादा हैवी खेलों में इन्वॉल्व होंगी तो उनकी वर्जिनिटी चली जाएगी. महिलाओं का संघर्ष कई स्तरों का है. महिलाओं की बॉडी को लेकर तमाम तरह के सवाल उठते हैं. चाहे वो ब्रेस्ट हों, चाहे उनके कूल्हे हों. इन सबको लेकर लोग बहुत ज्यादा स्क्रूटनाइज़ करते हैं. सेरेना विलियम्स के बॉडी शेमिंग वाले केस को हमने यही देखा था. इसलिए ज़रूरी है कि उनके स्पोर्ट्स के इतर भी ये बहुत सारी चीज़ें उठाई जाएं, क्योंकि उनके स्पोर्ट्स से जुड़े ये बहुत ही असल संघर्ष हैं.


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