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गोरेपन की क्रीम के डब्बे में क्रीम नहीं, ये ज़हरीली चीज़ होती है

कल्पना कीजिए. हसीन वादियां हैं. कभी हरियाली तो कभी बर्फ़. हमारी नायिका झीनी-सी साड़ी में है. नायक उसका पेट पकड़ता है. कंधा, गर्दन, गाल चूमता है. कभी वो नायिका के लिए घर छोड़ आता है, कभी दौलत. कभी उठी हुई तलवार को अपने हाथ से रोक लेता है. और कभी इतना प्रेम करता है कि जब उसकी शादी किसी और से हो रही होती है तो वो अपने आंसू पी जाता है. अब एक और काम करिए. इन नायिकाओं के चेहरों की कल्पना कीजिए. क्या रंग है इनका. गोरी दिखती हैं न? बेशक गोरी दिखती होगी.

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बीते हफ्ते खबर आई कि तमाम फेयरनेस प्रोडक्ट बनाने वाले अब इनकी रीब्रांडिंग करेंगे. मसलन ‘फेयर एंड लवली’ में से ‘फेयर’ हट जाएगा. फेयर एंड लवली इंडिया में 70 के दशक से बिक रही है. साल 2006 की एक स्टडी के हिसाब से गोरेपन के प्रोडक्ट बेचने वाले मार्केट में इसका शेयर 70 फीसद था. इसका अंदाज़ा आप ऐसे लगा सकते हैं. कि 90 के दशक में मेरी एक सहेली जो उस वक़्त एक अमीर व्यवसायी परिवार से आती थी की मां, मेरी मां जो मिडिल क्लास हाउस वाइफ थीं, और मेरे पड़ोस में एक कमरे के मकान में रहने वाले एक मजदूर की बेटी. तीनों के घर में ये क्रीम देखी जा सकती थी. बीते कुछ समय तक, ये ट्यूब मार्केट में 5 रुपये के पैक से शुरू हो रही थी.

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रंग ‘गोरा’ करने के दावों की सत्यता साबित करने का कोई जिम्मा नहीं है कम्पनियों पर. लेकिन इनके ऐड धड़ल्ले से चलते हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

पर क्या कुछ बदला?

ये हास्यास्पद है कि सालोंसाल इन क्रीम्स को लगा चुकी लड़कियों के स्किन कलर में कोई बदलाव नहीं आया. सिर्फ फेयर एंड लवली ही नहीं. गोरेपन की कोई भी क्रीम या साबुन लगाने वाली लड़की ये नहीं कह सकती कि 7 दिन में उसकी त्वचा वैसे ही बदल गई जैसे विज्ञापन में मॉडल की बदलती है. गोरेपन का वादा करती इन क्रीम्स ने आपको फेयरनेस मीटर तक दिया. कि आप अपनी त्वचा के बदलते रंग को मापते चलें. शायद इसका नाम इनसिक्योरिटी मीटर होना चाहिए था. जिससे हम अपने अंदर खुद की ही स्किन के लिए हुई निराशा को धीरे-धीरे घृणा में बदल पाएं. जो अपने प्रति घृणा में बदल जाए.

इन क्रीम्स का सफ़र देखिए.

– सबसे पहले इन्होंने बताया कि अगर आप काली हैं और आपकी शादी नहीं हो रही. तो ये तो आम बात है. गलती आपकी ओर से है. आप पैदा गलत रंग के साथ हुईं. आप क्रीम लगाएं. लड़के को मोहब्बत हो जाएगी. साथ ही लड़कों को ये संदेश दिया कि जब भी शादी करो. लड़की के गोरेपन का ध्यान ज़रूर रखो.
– फिर इन्होंने बताया कि आप अपनी हिरोइन्स को देखिए. यही प्रोडक्ट लगाकर तो ये ऐसी दिखती हैं.
– फिर इन्होंने बताया कि देखो इस लड़की को नौकरी नहीं मिली. जानते हो क्यों नहीं मिली. क्योंकि उसकी त्वचा पर निखार नहीं था. निखार न हो तो कॉन्फिडेंस कम करता है. और इंटरव्यू में रायता फ़ैल जाता है.

नन्ही बच्चियों, किशोरियों, महिलाओं ने इन विज्ञापनों को देखकर लगतार ये जाना कि कि जो शादी करने या नौकरी करने के लिए क्वालिटी चाहिए. वो उनमें नहीं है. उन्हें बाज़ार ने भरोसा दिलाया. कि तुमसे न हो पाएगा. नन्ही बच्चियों ने हिरोइनों को टीवी पर देखकर महसूस किया. वो ये नहीं हो सकतीं. ये दूसरी दुनिया की परियां हैं. रिश्तों को दिमाग के नहीं, स्किन कलर के मेल से पहचाना गया. और लड़कियों को बताया गया कि तुम जो हो. अपने रंग, अपने शरीर से हो. तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई, मेहनत का कोई काम नहीं है. जबतक तुम गोरी न हो जाओ.

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पॉपुलर कल्चर में भी हीरोइनों को गोरा चिट्टा दिखाया गया. सांवली लड़कियां या तो ‘सेक्सी’ के डेफिनिशन तक बांध दी गईं, या फिर किसी साइड कैरेक्टर के तौर पर रख दी गईं. (फिल्म मोहब्बतें से एक सीन)

क्रीम बेचने वालों की तो सोशल प्रेशर से आंखें खुल रही हैं. लेकिन हम अभी भी गहरी नींद में सोते दिख रहे हैं. फिल्मों में गोरी हिरोइनें ही लीड में हैं. बच्चों की किताबों में बने चित्रों में लड़कियों के चेहरे गोरे हैं. बुरे व्यक्ति को हम काले दिल का कहते हैं. परियों को गोरा बनाते हैं. राक्षसों को काला. काली बिल्ली, कुत्ते, जानवर, पक्षी को अशुभ मानते हैं. यहां तक काली को छोड़कर जिन भी देवियों को हम पूजते हैं, उनको फोटो, किताबों, कैलेंडरों पर गोरे रंग का पाते हैं. जबकि इन देवियों को हमने कभी नहीं देखा.

वैसे तो हम पुरुषों को भी काला-कलूटा कहकर उनका मजाक बनाने से नहीं चूकते. लेकिन अगर कालापन लड़कियों में हो तो ये मज़ाक से कहीं ऊपर एक बड़ा इशू बन जाता है. लड़कियों को 25 की उम्र तक ब्याहकर निपटा देने का ख्वाब देखने वाले मां-बाप की बेटी अगर काली हो. तो उनका सर थोड़ा और नीचे झुकता है. वो थोड़ा और दहेज जमा करने की सोचते हैं. या सोचते हैं कि कोई उसके ही रंग का मिल जाए तो जोड़ी पर सवाल न उठाया जाएगा. क्योंकि वो जानते हैं कि जिस घर में बेटी की फोटो देखने के लिए भेजी गई है. वहां वो किसी की फर्स्ट चॉइस कभी नहीं होने वाली.

सालोंसाल जिसे क्रीम कहकर बेचा गया. वो ट्यूब क्रीम की नहीं. हताशा की थी. कुंठा की थी. असुरक्षा की थी. बदलते बाज़ार में अब हमसे कोई कहकर जाएगा. डार्क इस ब्यूटीफुल. और मार्केट की हवा बदलेगी. मगर हमें एक कदम और आगे बढ़कर सोचना चाहिए. डार्क हो या फेयर. हम ब्यूटी के फेर में ही क्यों पड़ें. हम सुंदरता के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा ही क्यों दें. क्या हमारा होना ही काफ़ी नहीं?


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