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आदिवासी लड़कियों के यौन उत्पीड़न पर बात की, तो प्रोफेसर को 'डायन' बताने लगे लोग

झारखंड का सोहराई पर्व. यह पर्व अब विवादों में है. दरअसल, झारखंड के गोड्डा कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर रजनी मुर्मु ने दुमका के एसपी कॉलेज में मनाए गए सोहराई पर्व को लेकर बीते दिनों एक पोस्ट लिखा. इस पोस्ट में उन्होंने कहा कि सोहराई पर्व महिलाओं के यौन शोषण को बढ़ावा देता है. देखते ही देखते ये पोस्ट वायरल हो गया. रजनी मुर्मू के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां हुईं. उनके ऊपर आदिवासी संस्कृति को बदनाम करने के आरोप लग रहे हैं. उनके बहिष्कार की बात हो रही है. रजनी के खिलाफ दुमका सिटी थाने में FIR दर्ज हुई है.

क्या है पोस्ट में?

प्रोफेसर रजनी मुर्मु दुमका के एसपी कॉलेज में आयोजित सोहराई कार्यक्रम में शामिल होती रही हैं.  उन्होंने इन आयोजनों को लेकर बीती  7 जनवरी को एक फेसबुक पोस्ट लिखा. इस पोस्ट में उन्होंने इस फेस्टिवल में जो देखा वो अपने पोस्ट में लिखा है. उन्होंने लिखा,

“संथाल परगना में संथालों का सबसे बड़ा पर्व सोहराई बडे़ ही धूम धाम से मनाया जाता है. जिसमें हर गांव अपनी सुविधानुसार 5 से 15 जनवरी के बीच अपना दिन तय करते हैं. ये त्योहार लगातार 5 दिनों तक चलता है. इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत स्त्री और पुरूषों का सामूहिक नृत्य होता है. इस नृत्य में गांव के लगभग सभी लोग शामिल होते हैं. मां-बाप से साथ बच्चे मिलकर नाचते हैं.”

“पर जब से संथाल शहरों में बसने लगे तो यहां भी लोगों ने एक दिवसीय सोहराई मनाना आरंभ किया. खासकर के सोहराई मनाने की जिम्मेदारी सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों ने उठाई… मैंने दो बार एसपी कॉलेज दुमका का सोहराई अटेंड किया है…. जहां मैं देख रही थी कि लड़के शालीनता से नृत्य करने के बजाय लड़कियों के सामने बद्तमीजी से ‘सोगोय’ करते हैं… सोगोय करते- करते लड़कियों के इतने करीब आ जाते हैं कि लड़कियों के लिए नाचना बहुत मुश्किल हो जाता है.. सुनने में तो ये भी आता है कि अंधेरा हो जाने के बाद सीनियर लड़के कॉलेज में नई आई लड़कियों को झाड़ियों की तरफ जबरजस्ती खींच कर ले जाते हैं… और आयोजक मंडल इन सब बातों को नजरअंदाज कर चलते हैं…”

सोहराई क्या है?

सोहराई आदिवासी समाज में मनाया जाने वाला एक उत्सव है. जिसमें लोग प्रकृति और पालतू जानवरों जैसे गाय, भैंस आदि की पूजा करते हैं. दीवारों पर कोहबर (म्यूरल्स) बनाए जाते हैं. यह पर्व झारखंड के छोटा नागपुर इलाकों में दिवाली के अगले दिन और संथाल परगना में फसल कटने के बाद जनवरी के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है.

यह पर्व पांच दिनों तक चलता है.पूरे  दिन खाना-पीना होता है. शाम के वक्त गांव वाले जमकर नाचते गाते हैं और खुशियां मनाते हैं. सिदो कान्हू मुर्मु यूनिवर्सिटी के कॉलेजों के हॉस्टलर्स द्वारा भी ये पर्व मनाया जाता है. जिसमें कॉलेज के लड़के- लड़कियां मिलकर नाचते हैं. लड़कियां गीत गाकर नाचती हैं तो वहीं लड़के ‘सोगोय’ यानी कि एक तरह का रैप करते हैं. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि रजनी मुर्मु ने अपने पोस्ट में सोहराई पर्व पर नहीं बल्कि एसपी कॉलेज में मनाए जाने वाले सोहराई पर लड़कों के गलत व्यवहार और इसपर आयोजक मंडली की चुप्पी पर टिप्पणी की है.

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संथाली लोग अपना लोक नृत्य करते हुए (तस्वीर : विकीपीडिया)

प्रोफेसर मुर्मु के बहिष्कार की बात

प्रोफेसर मुर्मु के पोस्ट के बाद लोगों ने उनके खिलाफ खूब आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं. उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया. कुछ लड़कों ने रजनी मुर्मु को‘बिठलहा’ यानी आदिवासी समाज द्वारा निष्कासित करने की धमकी दी. विरोध के नाम पर अभद्रता के बहुतेरे नमूने रजनी मुर्मु की उस फ़ेसबुक पोस्ट के कमेन्ट सेक्शन में भी दिखे. आप भी देखिए,

एक फ़ेसबुक यूज़र ने लिखा.

” सुनने में आता है कि एक डायन संथाल परगना कॉलेज में सोहराई पर्व (गोंड पूजा) भी बंद कराना चाहती है “

रजनी
फ़ेसबुक यूज़र का कमेन्ट

एक और यूज़र ने लिखा,

“पैदाइश में आदिवासी होने के बावजूद जिनका आपण समाज से नाता रिश्ता, लगाव नहीं है और जो अपने माता – पिता को भी पहचानने से इनकार कर सकता है वही लोग रजनी मुर्मु जैसे घटिया महिला के पक्ष में बोलते हैं.”

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फ़ेसबुक यूज़र का कमेन्ट

इसी तरह के और कमेंट्स से प्रोफेसर रजनी मुर्मू की फेसबुक पोस्ट अटी पड़ी है. कुछ तो उनके ऊपर बेहद ही व्यक्तिगत हमले करने से बाज नहीं आए. दरअसल, ऐसा कम ही होता है कि जब एक औरत खुले तौर पर अपने विचार व्यक्त करे, तो उसके कैरेक्टर और व्यक्तिगत संबंधों पर टिप्पणी ना हो.

एक यूज़र ने कमेन्ट सेक्शन में उनके रिलेशनशिप स्टेटस का स्क्रीनशॉट लगाते हुए लिखा ” ये खुद रिलेशनशिप में हैं.”

Murmu
फ़ेसबुक यूज़र का कमेन्ट

दरअसल रजनी अपने पति से अलग रहती हैं. इस बात को जानने वालों ने उनके विरोध में इसे पर्सनल अटैक की तरह इस्तेमाल किया है. क्या पति को छोड़ने के बाद एक औरत को चुप्पी साध लेनी चाहिए क्योंकि वो अब इस सोसाइटी की ‘गुड वुमन’ लिस्ट से बेदखल कर दी गई है?

दुमका के ही एक दूसरे असिस्टेंट प्रोफेसर निर्मल मुर्मु ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा,

“आदिवासी समाज को धता बताकर गैर आदिवासी समाज से आपका ज़्यादा लगाव है. आपको ना भाई पसंद है, आपको ना पति पसंद है. आपको बस अपना मनपसंद है.”

अब रजनी का क्या कहना है?

इस पूरे मामले पर हमने रजनी मुर्मु से बात की. उन्होंने हमें बताया,

“सोहराई पर्व पर लड़कियां गाती हुई नाचती हैं और लड़के सोगोय करते हैं, जो रैप की ही तरह होता है. लड़कियों को लेकर कमेंट कभी- कभी अश्लील हो जाते हैं. वहां कुछ छीना-झपटी भी होने लगती है. मैं भी कार्यक्रम का हिस्सा बनी थी और मुझे लगा कि कुछ लड़के बद्तमीजी कर रहे हैं. फिर कुछ लड़कियों ने भी बताया कि रात के समय कुछ लड़कियों को लड़के झाड़ी की तरफ़ भी खींचने की कोशिश करते हैं. लड़कों ने यूनिवर्सिटी के बाहर मुर्दाबाद के नारे लगाए, समाज से निष्काषित करने की धमकी दी और ये ऐलान किया कि अगर मैंने इस्तीफ़ा नहीं दिया तो यूनीवर्सिटी के पांचों कॉलेजों पर ताला लगा दिया जाएगा.”

रजनी Murmu
फ़ेसबुक पर रजनी मुर्मु की एक तस्वीर

वहीं लोगों द्वारा डायन कहे जाने पर कुछ कमेंट्स के स्क्रीनशॉट के साथ रजनी मुर्मु ने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा कि झारखंड में 2015 से 2020 के बीच 207 आदिवासी महिलाओं की डायन के नाम पर हत्या कर दी गई. वहीं इन 5 सालों में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम के तहत 4,560 मामले दर्ज किए गए हैं. फिलहाल मुझे ये अंदेशा हो रहा है कि डायन के नाम पर मेरी भी हत्या हो सकती है.

समर्थन में आए लोग

एक तरफ जहां रजनी मुर्मू के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां की जी रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके समर्थन में भी लोग खड़े हैं. क्या किसी समुदाय में होकर उसकी किसी कमी पर सवाल उठाना, उस समुदाय के साथ बेईमान होना है. इसका जवाब हमें आदिवासी कवि, लेखक और असिस्टेंट प्रोफेसर अनुज लुगुन की एक फ़ेसबुक पोस्ट में मिला. जिसमें उन्होंने लिखा.

“रजनी मुर्मु ने सोहराई पर्व को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की है और ना ही उसका अनादर किया है. उन्होंने सोहराई पर्व की परंपरा को लेकर कोई आपत्तिजनक बात नहीं कही है. वे तो खुद भी उस महा-उत्सव में शामिल होती हैं. उन्होंने तो केवल एक कॉलेज में उस महा-उत्सव के आयोजन में घुस रही आपराधिक प्रवृत्ति पर सवाल उठाया है और आदिवासी लड़कियों की सुरक्षा पर चिंता जाहिर की है.”

रजनी मुर्मू के समर्थन में #standwithrajnimurmu का ट्रेंड चलाया गया. आदिवासी समाज से आने वालीं कवियत्री जसिन्ता केरकेट्टा ने लिखा,

“उनकी टिप्पणी पितृसत्तात्मक समाज को चुभ गई है. संथाल समाज के युवा छात्र नेता चाहते हैं कि रजनी मुर्मू जैसी कोई स्त्री फिर कभी आलोचना करने की हिम्मत ना कर सके इसलिए वे उन्हें नौकरी से हटाए जाने की पुरजोर मांग कर रहे हैं. यह हर उस स्त्री की बात है, जिसके पास अपना एक नजरिया है और जो अपनी बात कहना चाहती है.”

उन्होंने आगे लिखा,

” आदिवासी समाज शिकायतों को सुनना नहीं सीख पाया है. “

किसी भी समाज, धर्म , वर्ग या समुदाय की औरत मुखर होकर किसी मुद्दे पर अपने विचार रख रही है तो ये उसकी अभिव्यक्ति की आज़ादी है. अगर वो कोई आरोप लगाती है, तो ज़रूरी है कि उस आरोप कीए जांच हो, कोई तर्क रखती है तो उसका जवाब तर्क या फैक्ट्स से देना चाहिए ना कि उसका चरित्र हनन किया जाना चाहिए.


ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के लिए जारी की गई कोरोना की गाइडलाइन्स में क्या कहा गया है?

 

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