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पुलित्ज़र पाने वाली रिपोर्टर की कहानी, डरकर जिस पर चीन ने बैन लगा दिया था

मेघा राजगोपालन को जब पुलित्जर पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, तब वे इस प्रोग्राम को देख नहीं रही थीं. क्योंकि उन्हें नहीं लगा था कि वे पुरस्कार जीत सकती हैं. अचानक से उनके पास बजफीड न्यूज के एडिटर मार्क स्कूफ्स का फोन आया. उन्होंने मेघा को बताया कि चीन के शिनिजियांग प्रांत के डिटेंशन कैंप में कैद उइगर मुसलमानों की उनकी सीरीज को अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग श्रेणी में पुलित्जर पुरस्कार मिला है. ये मेघा के लिए एक अविश्वसनीय पल था.

बजफीड न्यूज ने 11 जून को अपना पहला पुलित्जर प्राइज जीतने के बाद इसी तरह अपनी प्रतिक्रिया दी. मेघा राजगोपालन भारतीय मूल की पत्रकार हैं. पुलित्जर पुरस्कार मिलने के बाद उनकी खासी चर्चा हो रही है. मेघा के साथ उनके दो सहयोगियों एलिसन किलिंग और क्रिस्टो बुश्चेक को इस पुरस्कार से नवाजा गया है. पुलित्जर पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने के लिए दिया जाने वाला अमेरिका का सबसे ऊंचा पुरस्कार है.

कौन हैं Megha Rajagopalan?

मेघा राजगोपालन मूल तौर पर तमिलनाडु से वास्ता रखती हैं. अभी लंदन में रहती हैं. उनका बचपन अमेरिका में बीता. वाशिंगटन डीसी के पास स्थित मैरीलैंड में. शुरुआती पढ़ाई मैरीलैंड में ही हुई. धीरे-धीरे उनकी रुचि मीडिया की तरफ होने लगी. मेघा राजगोपालन ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया-

“मैं अपने माता-पिता की बड़ी शुक्रगुजार हूं. मेरे परिवार में किसी ने भी मीडिया में काम नहीं किया. लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे सपोर्ट किया. शुरुआत से ही. जब मैं स्टू़डेंट थी.”

शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद मेघा राजगोपालन ने मैरीलैंड यूनीवर्सिटी के फिलिप मेरिल कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म में दाखिला लिया. यहां से 2008 में ग्रेजुएट हुईं. इसके बाद काम करना शुरू किया. बजफीड में वो पांच साल से काम कर रही हैं. वहां वो सीनियर करेस्पॉन्डेंट हैं. इंटरनैशनल मामलों पर खबरें करती हैं.

बजफीड से पहले उन्होंने चार साल रॉयटर्स के लिए भी काम किया है. रॉयटर्स में काम करने के दौरान उनकी पोस्टिंग बीजिंग में थी. उससे पहले वो अमेरिका के विदेश मंत्रालय में फुलब्राइट रिसर्च फेलो रहीं.

23 देशों से कर चुकी हैं रिपोर्टिंग

पुलित्जर पुरस्कार मिलने से पहले ही मेघा काफी कुछ हासिल कर चुकी हैं. उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक, वो अभी तक 23 देशों से रिपोर्टिंग कर चुकी हैं. इनमें इजरायल और फिलिस्तीन भी शामिल हैं. मेघा उत्तर कोरिया के परमाणु संकट से लेकर अफगानिस्तान की शांति वार्ता तक पर रिपोर्टिंग कर चुकी हैं. उनके काम का सात भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है. साथ ही साथ उनके काम को कोलंबिया और न्यूयॉर्क यूनीवर्सिटी में पढ़ाया भी जाता है.

शिनजियांग स्थित एक डिटेंशन कैंप की सैटेलाइट फोटो. (फोटो: AP)
शिनजियांग स्थित एक डिटेंशन कैंप की सैटेलाइट फोटो. (फोटो: AP)

पुलित्जर कमेटी ने मेघा के लिए लिखा,

वो उइगर मुसलमानों को नजरबंद रखने वाले चीन के डिटेंशन कैंप में जाने वाली पहली पत्रकार हैं.

पुलित्जर से पहले मेघा को इसी रिपोर्ट के लिए 2018 में ह्यूमन राइट्स प्रेस अवॉर्ड भी मिल चुका है. इसके अलावा उन्हें 2019 में इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के लिए मिरर अवार्ड भी मिला. यह अवॉर्ड उन्हें फेसबुक और श्रीलंका में सांप्रदायिक हिंसा के बीच लिंक खोजने के लिए दिया गया था.

अपने काम के बारे में वे हॉवर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, यूरोपियन काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशंस, ओस्लो फ्रीडम फोरम, कैनेडियन म्यूजियम फॉर ह्यूमन राइट्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में बोल चुकी हैं. इसके अलावा वे नियमित तौर पर अंतरराष्ट्रीय न्यूज चैनल्स पर भी डिबेट्स में नज़र आती हैं. उन्हें अंग्रेजी के अलावा तमिल और मैंडारिन (चीन की आधिकारिक भाषा) भी आती है.

चीन ने लगा दिया बैन

पुलित्जर मिलने के बाद मेघा राजगोपालन ने एक ट्वीट किया. जिसमें उन्होंने अपने संस्थान और टीम के साथ उन उइगर मुसलमानों के लिए भी धन्यवाद व्यक्त किया, जिनकी बदौलत उनकी रिपोर्टिंग की की सीरीज पूरी हो पाई. उन्होंने लिखा,

“मैं अपनी टीम और उन संस्थानों की शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने हमें सपोर्ट किया. सबसे ज्यादा मैं उन लोगों का शुक्रियादा करती हूं जिन्होंने हमें बताया कि उनके साथ शिनिजियांग के कैम्प्स में क्या हुआ. हम पर उनके साहस का कर्ज है. अभी भी बहुत कुछ करना है.”

मेघा के मुताबिक, जिन उइगर मुसलमानों ने उनसे बात की, उन्होंने बहुत साहस दिखाया. दूसरी तरफ यह कहना गलत नहीं होगा कि शिनिजियांग के लेबर कैम्प्स पर रिपोर्टिंग करते हुए मेघा ने भी साहस का परिचय दिया. चीन की सरकार ने उन्हें रोकने की काफी कोशिश की. दरअसल, जिस समय मेघा इस सीरीज पर काम कर रही थीं, उस समय उनके संपादक बेन स्मिथ थे. मेघा को पुरस्कार मिलने के बाद स्मिथ ने एक घटना को याद किया. उन्होंने ट्वीट किया-

“डिटेंशन कैंप पर स्टोरी के चलते चीन की सरकार ने मेघा का वीजा रीन्यू करने से मना कर दिया. मैंने और बजफीड के दूसरे सीनियर लोगों ने सरकारी कर्मचारियों से बात की. उन्होंने कहा कि हम मेघा के अलावा किसी और रिपोर्टर को भेज सकते हैं.”

हालांकि, चीन की सरकार द्वारा बैन किए जाने के बाद भी मेघा का काम रुका नहीं. वे शिनिजियांग प्रांत से लगे कजाकिस्तान गईं. वहां भागकर आए उइगर मुसलमानों की आपबीती सुनी. उसके बाद लंदन में रहकर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ हजारों सैटेलाइट फोटो देखीं. ये फोटो चीन के डिटेंशन कैंप की थीं. पुलित्जर कमेटी के मुताबिक, मेघा और उनके सहयोगियों ने ऐसे करीब 260 डिटेंशन कैंप की पहचान की. उनकी रिपोर्टिंग के बदौलत ही चीन द्वारा किए जा रहे उइगर मुसलमानों के मानवाधिका हनन के बारे में दुनिया को पता चला. हाल ही में हुई G-7 देशों की बैठक में एक बार फिर से इस मुद्दे पर चीन की जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई है.


 

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