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क्या होता है ट्यूरेट सिंड्रोम, जिसमें अपने आप पर ही कंट्रोल नहीं रहता?

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो भी सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछ लें. लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

साल 2018 में रानी मुखर्जी की एक फ़िल्म आई थी, हिचकी. जिन लोगों ने ये फ़िल्म देखी है, उन्हें तो इसकी स्टोरी पता होगी. जिन लोगों ने नहीं देखी, उन्हें शॉर्ट में बता देती हूं. फ़िल्म में रानी एक टीचर हैं, जिन्हें ट्यूरेट सिंड्रोम है. इसकी वजह से उन्हें एकदम से हिचकी जैसी आने लगती है. ये उनके कंट्रोल के बाहर होती है. अपनी कंडीशन की वजह से उन्हें बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. लेकिन आख़िर में वो एक स्कूल में नौकरी करती हैं, और वहां पढ़ने वाले बच्चों की ज़िंदगी बदल देती हैं. नहीं आज हम इस फ़िल्म का रिव्यू नहीं कर रहे हैं. हम बात कर रहे हैं ट्यूरेट सिंड्रोम की. ये नर्वस सिस्टम का डिसऑर्डर है. इसमें न चाहते हुए भी लोग कुछ ऐसे मूवमेंट या आवाज़ निकालते हैं जिन्हें कंट्रोल करना उनके बस में नहीं होता. ऐसा लगातार होता रहता है. हमें कई ऐसे लोगों के मेल्स आए हैं जिन्हें ट्यूरेट सिंड्रोम है. वो चाहते हैं हम इस टॉपिक पर एक एपिसोड बनाएं ताकी लोगों को इस डिसऑर्डर के बारे में पता चले. वो ट्यूरेट सिंड्रोम से ग्रसित लोगों का मज़ाक उड़ाना, उन्हें हैरत से देखना बंद करे.

तो सबसे पहले जानते हैं ट्यूरेट सिंड्रोम होता क्या है और इसके लक्षण क्या हैं?

ट्यूरेट सिंड्रोम क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर गोविंद ने.

डॉक्टर गोविंद माधव न्यूरोलॉजिस्ट, AIIMS ऋषिकेश
डॉक्टर गोविंद माधव न्यूरोलॉजिस्ट, AIIMS ऋषिकेश

– ट्यूरेट सिंड्रोम की खास बात ये होती है कि इसकी शुरुआत बचपन से होती है

– ये एक कॉम्प्लेक्स जेनेटिक डिसऑर्डर होता है

– आनुवंशिक स्थिति ऐसी बनती है जिसमें हमारे अंदर कुछ खास जींस की कमी हो जाती है. कुछ बीमारियों में सिर्फ़ एक जीन जिम्मेदार होता है. इसमें कई जींस नहीं होते हैं.

– इसमें बचपन में ही यानी 5 साल से पहले ही हमारे अंदर फोनेटिक टिक्स या वोकल कॉड या मोटर टिक्स पैदा होते हैं

ट्यूरेट सिंड्रोम के लक्षण

– ट्यूरेट सिंड्रोम को लेकर पहले 3-4 बातें समझ लेनी चाहिए

– इसकी शुरूआत बचपन से होगी

– इसमें कोई न कोई टिक्स होगी

– इसके साथ अर्ज यानी कुछ करने की प्रबल इच्छा होगी

– ये कुछ हद तक दबाए जा सकते हैं

– इनकी इंटेसिटी भी अलग-अलग होती है, कभी कम और कभी ज्यादा

– इसीलिए कई बार लोगों को लगता है कि इसका मरीज जानबूझकर अटेंशन के लिए ऐसा कर रहा है लेकिन ऐसा नहीं होता है

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ये एक कॉम्प्लेक्स जेनेटिक डिस्ऑर्डर होता है जिससे लोगों में ट्यूरेट सिंड्रोम की समस्या बढ़ जाती है

– एक और खास बात होती है, इस सिंड्रोम में ये टिक्स माइग्रेट करते हैं

– हो सकता है कभी हाथ में आए, मोटर टिक्स हों तो कभी पैर या कभी पेट में आए

– तो ये माइग्रेशन होता है और अमूमन एक समय के बाद ये कभी कम, कभी ज्यादा हो सकते हैं

– अगर किसी में ये सारे लक्षण बचपन से दिख रहे हैं तो समझ लेना चाहिए कि उन्हें ट्यूरेट सिंड्रोम है

टेस्ट

– कैसे जानें कि कोई ट्यूरेट सिंड्रोम से ग्रस्त है?

– क्या कोई जांच है जैसे कई सारी बीमारियों में सीटी स्कैन, एमआरआई होता है या खून की जांच से पता चलता है

– अफ़सोस कि इस सिंड्रोम में ऐसी कोई जांच नहीं है जिससे ये साफ़ तौर पर बताया जा सके

– तो कैसे जानें? इसके लिए न्यूरोलॉजिस्ट मरीज की जांच करते हैं

– ऐसे मरीज जब डॉक्टर के पास जाते हैं, तो अपनी इन सभी गतिविधियों को दबाने की कोशिश करते हैं

– हालांकि इस सप्रेशन की वजह से उनके दिमाग में असहज सेंसेशन होती है

– इसीलिए उनके घरवालों से उनकी प्रकिया को रिकॉर्ड करने को कहा जाता है. उन्हे देखकर ही कंफर्म किया जा सकता है कि ट्यूरेट है या नहीं

इलाज

– इनमें जो माइल्ड केसेज होते हैं, जिनमें ये लक्षण कम होते हैं, उनमें कुछ बिहेवियरल थेरेपी दी जाती है

– बिहेवियरल थेरेपी में उनके घरवालों को ट्रेनिंग दी जाती है कि उनके साथ कैसा बर्ताव न करें

– जिससे मरीज के अंदर शर्मिंदगी या हीन भावना न आए क्योंकि ऐसे में उनके अंदर अवसाद की भावना आ सकती है

– उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है और वो अपने लक्षणों को छिपाने की कोशिश करेंगे लेकिन सफल नहीं होंगे

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अफ़सोस कि इस सिंड्रोम में ऐसी कोई जांच नहीं है जिससे ये साफ़ तौर पर बताया जा सके

– ये समझना ज़रूरी है कि ऐसा वो जानबूझकर नहीं कर रहे हैं और ये कोई पर्सनैल्टी का डिफेक्ट नहीं है

– उन्हें विश्वास दिलाएं कि जब भी उनमें ऐसी अर्ज हो तो उसके बदले में कोई दूसरा काम करें ताकी उनकी एनर्जी दूसरी जगह लग सके

– माइल्ड केसेज को काउंसलिंग के द्वारा ठीक किया जाता है

– जो गंभीर केसेज होते हैं, उन्हें दवाएं दी जाती हैं. एंटीसाइकोटिक या अल्फा ब्लॉकर कुछ ड्रग्स है, जो डॉक्टर के सुपरविजन में प्रॉपर गाइडलाइंस में दी जाती हैं

– सबसे जरूरी बात कि सिर्फ ट्यूरेट का इलाज नहीं होता बल्कि उसके साथ जो दूसरी बीमारियां होती हैं, उनका भी इलाज करना होता है

आपने डॉक्टर साहब की बातें सुनी. अब अगर आपके जानने वाले किसी बच्चे में इसके लक्षण दिख रहे हैं तो सही समय पर डॉक्टर की राय ज़रूर लें. सही समय पर इलाज लेने से कुछ केसेस में इसे कंट्रोल भी किया जा सकता है. दूसरी बात, अगर आप किसी ऐसे इंसान को जानते हैं जिसे ट्यूरेट सिंड्रोम है, और आपको कोई ऐसी आवाज़ बनाते या मूवमेंट करते हुए देखते हैं तो उसका मज़ाक न उड़ाएं. ये एक डिसऑर्डर के कारण है.


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