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ना बीमारी ना इन्फेक्शन, फिर क्यों हो जाती है नवजात बच्चों की मौत?

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

हमें सेहत पर मेल आया है मिथाली का. उन्होनें हमसे अपनी दिल तोड़ देने वाली कहानी शेयर की. दरअसल पिछले साल मिथाली की बड़ी बहन प्रेग्नेंट थीं. नवंबर का महीने में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया था. बेबी एकदम हेल्दी पैदा हुआ था. उसे कोई मेडिकल प्रॉब्लम नहीं थी. लेकिन इस साल मार्च में उसकी मौत हो गई.

अजीब बात ये है कि इन चार महीनों में उसे कोई भी बीमारी या इन्फेक्शन नहीं हुआ था. एक दिन सुबह जब मिथाली की दीदी ने अपने बेटे को दूध पिलाने के लिए जगाया तो वो ना उठा, ना रोया. घरवाले डर गए. उसकी सांसें और धड़कनें नहीं चल रही थीं. वो फौरन उसे डॉक्टर के पास लेकर भागे. चेकअप करने के बाद डॉक्टर्स ने उसे मृत घोषित कर दिया.

मिथाली के घरवाले सदमे में थे. उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हुआ. एक हेल्दी बच्चा, जिसे कोई मेडिकल इशू नहीं था वो कैसे अचानक गुज़र गया. मिथाली के परिवारवालों को आगे पता चला कि बेबी की मौत SIDS से हुई थी. यानी Sudden Infant Death Syndrome. इसमें एक साल से कम उम्र के बच्चों की मौत हो जाती है, भले ही वो हेल्दी हों.

इससे डरावनी बात ये है कि मौत का कोई कारण पता नहीं चलता. जब हमने हिंदुस्तान में SIDS के और मामले पता करने की कोशिश की तो हमें कोई पुख्ता आकड़े नहीं मिले. पर दुनियाभर में SIDS से हजारों बच्चों की मौत हो जाती है. मिथाली चाहती हैं कि हम इस मुद्दे पर लोगों को जागरूक करें. SIDS के बारे में अपने शो पर बात करें. तो सबसे पहले डॉक्टर्स से समझते हैं SIDS आख़िर है क्या.

SIDS क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर नीतू तलवार ने.

Dr. Neetu Talwar - in Gurgaon | Fortis Healthcare
डॉक्टर लवलीना नादिर, फोर्टिस एंड अपोलो हॉस्पिटल, दिल्ली

-SIDS या सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम का मतलब है कि अचानक नवजात या एक साल से कम उम्र के बच्चे की मौत हो जाना.

-मौत का कारण साफ़ तौर पर पता नहीं चलता.

-बाहर के देशों में SIDS एक साल से कम उम्र के बच्चों में मौत की एक बड़ी वजह है.

-भारत में SIDS के आकड़े काफ़ी कम हैं.

-मगर हो सकता है इंडिया में SIDS के मामले रिपोर्ट ना होते हों.

-मौत के पीछे का कारण समझ में ना आता हो, इसलिए कम मामले सामने आते हैं.

-ये एक बहुत ही आम सिंड्रोम है पर इससे आसानी से बचा जा सकता है.

-अगर हमें इसकी पूरी तरह से जानकारी हो.

-ये पता हो कि क्या रिस्क फैक्टर्स अवॉयड करने चाहिए.

कारण

-SIDS के मामले सबसे ज़्यादा 2 से 4 महीने के बच्चों में रिपोर्ट किए जाते हैं.

-एक साल से कम उम्र के बच्चों का न्यूरोलॉजिकल डेवलपमेंट (दिमागी विकास) बहुत कम होता है.

Lovely newborn baby legs by leungchopan on Envato Elements
बाहर के दशों में SIDS एक साल से कम उम्र के बच्चों में मौत की एक बड़ी वजह है

-जिसके कारण बच्चा कोई सिग्नल नहीं दे पाता या बचाव नहीं कर पाता.

-अगर एक बड़े बच्चे को खांसी आएगी तो वो खुद को संभाल पाएगा.

-पर अगर एक छोटे बच्चे को खांसी आएगी तो हो सकता है वो चोक हो जाए, खुद को बचा ना पाए.

-दूसरा कारण. मां की उम्र 20 साल से कम है तो उनके बच्चों में SIDS के मामले ज़्यादा देखे जाते हैं.

-ऐसा कई कारण से हो सकता है. जैसे बच्चे को संभालने का अनुभव ना हो.

-तीसरा कारण. अगर घर के अंदर लोग सिगरेट पीते हैं तो उस घर में रहने वाले बच्चों में SIDS का ज़्यादा रिस्क है.

-कई तरह के इन्फेक्शन भी ज़िम्मेदार होते हैं. जैसे चेस्ट इन्फेक्शन और निमोनिया.

-अगर सही समय पर इनका पता ना चले, सही समय पर जांच ना हो तो ये इन्फेक्शन बच्चे पर हावी हो जाते हैं.

-बच्चे सीरियस हो जाते हैं और पता नहीं चलता.

-ऐसा किसी भी इन्फेक्शन में हो सकता है. जैसे यूरिन इन्फेक्शन या पेट का इन्फेक्शन.

-अगर इनका समय पर इलाज ना हो तो ये फैल सकते हैं, खून में इन्फेक्शन फैल जाता है.

-सेप्सिस हो सकता है और बच्चे को नुकसान हो सकता है.

-जेनेटिक डिसऑर्डर भी एक बड़ा कारण है. यानी ये डिसऑर्डर मां-बाप से बच्चों में आते हैं.

-इनमें बच्चों का डेवलपमेंट पूरी तरह से नहीं हो पाता, जिससे वो SIDS के शिकार हो जाते हैं.

बचाव

-घर का वातावरण साफ़ रखना चाहिए.

-घर के अंदर सिगरेट नहीं पीनी चाहिए.

There's A Chubby Baby Legs Competition, And The Pictures Are Gold
SIDS के मामले सबसे ज़्यादा 2 से 4 महीने के बच्चों में रिपोर्ट किए जाते हैं

-चूल्हा उस कमरे में नहीं जलाना है, जिसमें बच्चा हो.

-चूल्हे से निकलने वाला धुंआ बच्चे के लिए जानलेवा हो सकता है.

-सही समय पर डॉक्टर से संपर्क करें.

-सही समय पर बच्चे को टीके लगवाएं.

-समय-समय पर बच्चे का चेकअप करवाते रहें.

-ज़्यादातर घरों में बच्चों को साथ ही सुलाया जाता है.

-कई बार ये देखा गया है कि बहुत गहरी नींद लग जाए और हम करवट बदलें, जिससे चादर या कंबल बच्चे के ऊपर आ जाए तो ये घातक हो सकता है.

-इसलिए बच्चे को थोड़ी दूरी या अलग पलंग पर सुलाएं.

-टाइम-टाइम पर उठकर उसे देखते रहें.

-सबसे ज़रूरी बात. बच्चे को कभी भी उसके पेट के बल ना सुलाएं.

-उसे सीधे ही सुलाना चाहिए.

-क्योंकि सोते-सोते अगर बच्चे ने अपना चेहरा साइड पर किया तो उसकी नाक बंद हो सकती है.

आपने डॉक्टर की बातें सुनीं. SIDS कितना ख़तरनाक हो सकता है, आपको इसका अंदाज़ा तो लग ही गया होगा. जहां तक रही बच्चों को अपने ही बिस्तर पर सुलाने की बात, तो ये वाकई हमारे देश में बहुत आम है. ऐसे में अक्सर करवट बदलते समय हमारा हाथ या चादर बच्चे के ऊपर पड़ सकते हैं. जिससे उनका दम भी घुट सकता है. एक साल से कम उम्र के बच्चे ना अपना बचाव कर पाते हैं ना कुछ सिग्नल दे पाते हैं. ऐसे में दुर्घटना हो सकती है. इसलिए बच्चे को अपने से थोड़ी दूर ही सुलाएं. और उसपर नज़र रखें.


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