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उस मेटाबॉलिज़म का पूरा गणित समझ लो, जिसके स्लो होने पर वज़न घटना बंद हो जाता है

25 साल की सीमा. दिल्ली में रहती हैं. जॉब करती हैं. एक साल से ज्यादा वक्त से वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं. महीनेभर पहले उन्होंने नोटिस किया कि उनका वजह कुछ ज्यादा बढ़ गया है. उन्होंने वर्कआउट शुरू किया. यूट्यूब पर एक्सरसाइज़ और डायट के वीडियोज़ उन्होंने देखे. कई सारी जगहों पर उन्हें एक ही शब्द बार-बार सुनाई दिया. मेटाबॉलिज़म. किसी वीडियो में कोई कह रहा है कि स्लो मेटाबॉलिज़म की वजह से वज़न कम करने में दिक्कत होती है. तो किसी में कुछ-कुछ खाने की सलाह दी गई, ताकि मेटाबॉलिज़म बढ़ जाए और वज़न तेज़ी से कम हो. सीमा हो गईं कन्फ्यूज़. पर ये कन्फ्यूज़न केवल सीमा को नहीं है. बल्कि, हर उस व्यक्ति को होती है जो वेट लॉस जर्नी की तरफ बढ़ता है. मेटाबॉलिज़म शब्द बार-बार घूम फिरकर सुनाई आता है. तो हमने सोचा कि आज इस शब्द का पूरा तिया-पांचा आपको बताएं.

क्या है मेटाबॉलिज़म?

शरीर के अंदर चौबीसों घंटे चलने वाली एक कॉम्प्लेक्स प्रोसेस है. शरीर में होने वाला हर एक केमिकल रिएक्शन, हर एक प्रोसेस, आपके शरीर के टिशू में या सेल्स के अंदर जो भी होता है, वो सब का सब मेटाबॉलिज़म है. आप जो खाते हैं, आपका शरीर उसे एनर्जी में बदलता है, ये प्रोसेस भी मेटाबॉलिज़म है. जब आपका शरीर आराम कर रहा होता है, तब भी उसके अंदर मेटाबॉलिज़म की प्रोसेस चल ही रही होती है, क्योंकि आपका दिल चौबीसों घंटे धड़कता है, आप चौबीसों घंटे सांस लेते हैं, ब्लड सर्कुलेशन भी लगातार होता है, हॉर्मोन लेवल भी लगातार एडजस्ट होता रहता है, आपके शरीर की सेल्स भी बनती और रिपेयर होती रहती हैं, इन सब प्रोसेस के लिए भी आपके शरीर को एनर्जी चाहिए होती है, ये एनर्जी मेटाबॉलिज़म प्रोसेस की वजह से ही मिलती है. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक-

“मेटाबॉलिज़म शरीर में होने वाली उन सभी फिज़िकल और केमिकल प्रोसेस को कहते हैं, जो एनर्जी बनाते हैं या फिर उनका इस्तेमाल करते हैं.”

वेस्ट बंगाल के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज की असोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर अनन्या मंडल अपने एक आर्टिकल में मेटाबॉलिज़म को कुछ इस तरह डिस्क्राइब करती हैं-

“किसी जीव और कोशिकाओं की जीवित अवस्था को बनाए रखने के लिए जो भी केमिकल रिएक्शन्स शरीर के अंदर होते हैं, वो सब मेटाबॉलिज़म हैं.”

‘ऑडनारी’ ने कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर परमजीत सिंह से भी बात की. उनके मुताबिक-

“कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट से आपको एनर्जी मिलती है. ये आपके शरीर के ईंधन हैं. मेटाबॉलिज़म का मतलब होता है कि इस ईंधन को आप कितनी तेज़ी से इस्तेमाल कर रहे हो. मतलब जितनी स्पीड से आपकी कार चल रही है, आपका मेटाबॉलिज़म उतना फास्ट है. ये एक पैरामीटर है. दूसरा है, कितनी बड़ी गाड़ी है. अगर ट्रक है, तो ज़ाहिर है ज्यादा पेट्रोल लगेगा, एक बाइक है तो कम लगेगा. ऐसा ही आपके शरीर के साथ होता है. आपका मेटाबॉलिज़म आपके साइज़ पर भी निर्भर करता है. जिसका साइज़ ज्यादा होगा, मेटाबॉलिज़म तेज़ होगा. स्पीड पर मेटाबॉलिज़म डिपेंड करता है, जो ज्यादा तेज़ी से काम करता है, उसका मेटाबॉलिज़म तेज़ होगा. आपकी मसल्स आपको चलाती हैं, जितनी ज्यादा मसल्स होंगी आपके अंदर, मेटाबॉलिज़म उतना तेज़ होगा. मेटाबॉलिज़म का मतलब सिर्फ इतना है कि आपके शरीर में जो ईंधन मौजूद हैं उसको कितनी तेज़ी से आप इस्तेमाल कर रहे हैं.”

Paramjeet Singh
कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर परमजीत सिंह

कितने तरीके का मेटाबॉलिज़म होता है?

इसका जवाब है दो- केटाबॉलिज़म और एनाबॉलिज़म. केटाबॉलिज़म उस मेटाबॉलिक प्रोसेस को कहते हैं, जिनमें एनर्जी प्रड्यूस करने के लिए बड़े मॉलिक्यूल्स छोटे-छोटे हिस्सों में टूटते हैं. इस एनर्जी का इस्तेमाल शरीर बाकी के कामों में करता है. अब बात एनाबॉलिज़म की, इसका मतलब है शरीर के अंदर कुछ बनना. जैसे- हड्डियों का बनना, मसल्स का बनना, फैट का, स्किन का, हेयर का बनना. इस काम में शरीर उस एनर्जी का इस्तेमाल करता है, जो केटाबॉलिक प्रोसेस से निकलती है. डॉक्टर परमजीत बताते हैं-

“मेटाबॉलिज़म के तीन मकसद हैं. पहला- शरीर में एनर्जी प्रड्यूस करना. इसके लिए शरीर या तो फूड का इस्तेमाल करता है या फिर फ्यूल का. फूड, जो हम खाते हैं उससे एनर्जी का बनना. अगर एनर्जी ज्यादा है, तो वो स्टोर हो जाती है फ्यूल के फॉर्म में. ये फ्यूल आपके शरीर का फैट, प्रोटीन, ग्लायकोजन वगैरह होते हैं. इसी फूड और फ्यूल से जो एनर्जी बनती है, उसे हम केटाबॉलिज़म कहते हैं, मतलब कुछ चीज़ के टूटने से एनर्जी का बनना. इसी तरह मेटाबॉलिज़म का दूसरा मकसद है- स्टोरेज या बिल्ड करना. आपके शरीर में चीज़ें बनाना. हड्डी, मसल्स, स्किन, हेयर, फैट ये सब जो बनता है, ये प्रोसेस होती है एनाबॉलिज़म. हर चीज़ में कुछ न कुछ प्रोटीन है, लिपिड है, ग्लायकोजन है. एक लाइन में कहें तो केटाबॉलिज़म का मतलब तोड़ना, एनाबॉलिज़म का मतलब बनाना. जब भी कुछ बनता या टूटता है, बहुत से साइड या वेस्ट प्रोडक्ट भी निकलते हैं, यही प्रोडक्ट आपके शरीर में इकट्ठा होते हैं, इनको शरीर से निकालना मेटाबॉलिज़म का तीसरा मकसद है.”

मेटाबॉलिज़म और वज़न का रिश्ता

अब सबसे अहम मुद्दे पर आते हैं. माने वज़न का मेटाबॉलिज़म से क्या रिलेशन है. देखिए, सबसे पहले तो ये जानिए कि दिनभर में हमारा शरीर तीन हिस्सों में एनर्जी का इस्तेमाल करता है. पहला हिस्सा है- थर्मिक इफेक्ट्स ऑफ फूड, माने आपके खाने को डाइजेस्ट करना. आपका शरीर दिनभर में जितनी कैलोरी एनर्जी बर्न करता है, उसका 10 फीसद हिस्सा खाने को डाइजेस्ट करने में लगता है. दूसरा हिस्सा है- फिज़िकल एक्टिविटी, माने आप दिनभर में कितनी और किस तरह की फिज़िकल एक्टिविटी करते हैं. और तीसरा है BMR. माने बेसल मेटाबॉलिक रेट. इसे आसान भाषा में कहें तो जब आपका शरीर आराम कर रहा हो, आप किसी भी तरह की न तो फिज़िकल एक्टिविटी कर रहे हों और न ही मेंटल एक्टिविटी, उस दौरान शरीर के बेसिक कामों में जैसे- सांस लेने में, ब्लड सर्कुलेशन में, पलक झपकाने में, हॉर्मोन के लेवल सेट करने में जिस दर पर आपका शरीर एनर्जी बर्न करता है, वो होता है BMR.

BMR हर किसी के शरीर का अलग-अलग होता है. कुछ फैक्टर्स हैं, जिस पर इसकी दर निर्भर करती है. एक फैक्टर आपके जीन्स हैं, जो आपको पैरेंट्स से मिलते हैं. दूसरा आपके शरीर का साइज़ और कंपोज़िशन. अगर शरीर में मसल्स ज्यादा हैं, तो BMR ज्यादा होगा. तीसरा उम्र, जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ते जाएगी आपका BMR स्लो होता जाएगा. BMR के दर को तय करना वैसे तो आपके हाथ में पूरी तरह नहीं होता, लेकिन कुछ हद तक आप कर सकते हैं. वर्कआउट करके अपने शरीर में फैट की जगह मसल्स का अमाउंट बढ़ाकर आप BMR बढ़ा सकते हैं.

Metabolism (2)
मेटाबॉलिज़म आपके शरीर के अंदर होने वाली सभी तरह की केमिकल रिएक्शन है.

माने BMR पर आपका ज्यादा कंट्रोल नहीं होता, लेकिन फिज़िकल एक्टिविटी के ज़रिए बर्न होने वाली कैलोरीज़ का अमाउंट आप तय कर सकते हैं. आप जितना ज्यादा एक्टिव रहेंगे, उतनी ज्यादा कैलोरी बर्न होगी, मेटाबॉलिक रेट भी उतना ही ज्यादा होगा. जिन लोगों के लिए ये कहा जाता है कि मेटाबॉलिज़म फास्ट है, तो उसका सीधा गणित ये है कि वो ज्यादा एक्टिव होते हैं. और स्लो मेटाबॉलिज़म का मतलब है, कि वो व्यक्ति ज्यादा एक्टिव नहीं है. डॉक्टर परमजीत कहते हैं-

“शरीर कार्बोहाइड्रेट से भी चर्बी बनाता है और फैट से भी. प्रोटीन भी ज्यादा हो जाए तो भी वो स्टोर होकर चर्बी ही बनता है. अल्टीमेटली सभी चीज़ें चर्बी बनकर स्टोर होती हैं. क्योंकि वो एकमात्र लॉन्ग टर्म एनर्जी स्टोरेज सोर्स है, जो आपका शरीर रख सकता है. मतलब ये है कि जिस इंसान का मेटाबॉलिज़म फास्ट होगा, जो उन ईंधन को जल्दी-जल्दी इस्तेमाल करेगा, तो स्टोरेज कम होगा, या फिर स्टोरेज ही इस्तेमाल होने लगेगा. आप अपनी चर्बी इस्तेमाल करने लग जाते हैं, एनर्जी बर्न करने लग जाते हो और पतले होने लग जाते हो. तो पतले होने के लिए या फिर मेटाबॉलिज़म बढ़ाने के लिए किसी गोली की ज़रूरत नहीं है. किसी दवा की ज़रूरत नहीं है. एक इंसान अगर अपनी गाड़ी सिर्फ सुबह एक बार और शाम को एक बार चलाता है, तो उसका मेटाबॉलिज़म नॉर्मल होगा. एक इंसान जो ड्राइवर है, सारा दिन गाड़ी चलाता रहता है, यानी सारा दिन चलता-फिरता रहता है, उसका मेटाबॉलिज़म ज्यादा तेज़ है. एक बुज़ुर्ग इंसान जो बैठा ही रहता है, उसका मेटाबॉलिज़म स्लो होगा.”

क्या आप मेटाबॉलिज़म को बूस्ट कर सकते हैं.

इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने बात की डायटिशियन स्वाति बथवाल से. वो बताती हैं कि मेटाबॉलिक रेट बहुत सारी चीज़ों पर डिपेंड करता है. जब इंसान छोटा बच्चा होता है, तब उसका मेटाबॉलिक रेट सबसे ज्यादा होता है. औरतों का मेटाबॉलिक रेट 30 साल की उम्र के बाद थोड़ा कम हो जाता है, क्योंकि मसल्स कम होने लगती हैं. पुरुषों की अगर बात करें तो उनमें 50-55 साल के बाद मेटाबॉलिक रेट कम होने लगता है. स्वाति बताती हैं-

“मेटाबॉलिक रेट बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है एक्सरसाइज़ करना. रिसर्च में देखा गया है कि जब आप एक्सरसाइज़ करते हैं, तो 48 घंटे तक आपका मेटाबॉलिक रेट बढ़ चुका होता है. एक्सरसाइज़ करें, वॉक पर जाएं या रनिंग करें. एक्सरसाइज़ से मसल्स भी बनते हैं. मसल्स मेटाबॉलिक रेट को बढ़ाने में मदद करते हैं. अगर आप एक्सरसाइज़ के लिए बाहर जाने से डरते हैं, तो कोशिश करिए कि हर घंटे आप कम से कम तीन बार 5 से 10 मिनट तक के लिए खड़े रहिए. कुछ खाने-पीने की चीज़ें भी हैं, जिन्हें खाने से देखा गया है कि आपका मेटाबॉलिक रेट थोड़ा सा बढ़ सकता है. एक चुटकी सौंठ, एक चुटकी मिर्च या एक चुटकी दालचीनी लेने से भी मेटाबॉलिक रेट बढ़ सकता है. ये सब घरेलू नुस्खे हैं, इन्हें प्लीज़ थोड़ा ही इस्तेमाल करें, ज्यादा न करें, इससे फायदा कम नुकसान ज्यादा हो जाएगा. चौथी चीज़ है काली चाय या ब्लैक कॉफी. जब हम चाय या कॉफी में दूध मिलाते हैं, तो वो मेटाबॉलिक रेट बढ़ा नहीं पाता, इसलिए कोशिश करें कि ब्लैक टी या कॉफी पीजिए. एक्टिव रहिए, मेटाबॉलिक रेट सही बना रहेगा, वज़न भी कंट्रोल में रहेगा.”

Swati Bathwal
डायटिशियन स्वाति बथवाल

क्यों चाय पीने या मिर्च से मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है?

इस पर डॉक्टर परमजीत बताते हैं कि इन सारी चीज़ों से आपके जागने की क्षमता बढ़ जाती है. आप जब जागेंगे, तो ज़ाहिर है आप बैठेंगे, चलेंगे, थोड़ा काम करेंगे, इससे आपका एक्टिविटी लेवल बढ़ जाएगा. मतलब आपका मेटाबॉलिज़म भी बढ़ जाएगा. हर वो दवा जो धड़कन बढ़ाएगी, हर वो दवा जो आपके शरीर के अंदर एनर्जी इस्तेमाल करने की प्रोसेस को आसान करेगी, उसे हम मेटाबॉलिज़म बढ़ाने वाली दवा बोल सकते हैं. लेकिन अल्टिमेटली मेटाबॉलिज़म बढ़ा हुआ का मतलब यही है कि गाड़ी आपकी ज्यादा चल रही है, माने आप ज्यादा एक्टिव हैं.

क्या निष्कर्ष निकला?

इतने सारे आर्टिकल पढ़ने, डायटिशियन और कार्डियोलॉजिस्ट से बात करने पर हमें ये पता चला है आप जितना एक्टिव रहेंगे उतना ही आपका मेटाबॉलिज़म तेज़ होगा. आपके मेटाबॉलिज़म के तेज़ या स्लो होने से आपके वज़न पर फर्क नहीं पड़ता, बल्कि आपके वज़न से डिसाइड होती है मेटाबॉलिज़म की स्पीड. डॉक्टर्स कहते हैं कि एनाबॉलिज़म और केटाबॉलिज़म, दोनों ही तरह के मेटाबॉलिज़म का बैलेंस रहना ज़रूरी है. फैट, प्रोटीन टूटने के साथ ही ज़रूरी मात्रा में बनते भी रहना चाहिए. क्योंकि अगर केवल केटाबॉलिज़म ही होगा, तो आप बहुत दुबले होते जाएंगे. और अगर केवल एनाबॉलिज़म होगा, तो आपका वज़न ही बढ़ता चला जाएगा. इसलिए बैलेंस डायट लें, और पांच से छह लीटर पानी पिएं, एक्टिव रहें, कसरत करें या वॉक करते रहें.


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