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आपके घर का हेल्दी लगने वाला बच्चा भी कुपोषित हो सकता है, नज़रअंदाज़ न करें ये लक्षण

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो भी सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछ लें. लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

विकास पटना के रहने वाले हैं. पिछले हफ़्ते उनका हमें मेल आया. बता रहे थे वो एक एनजीओ के साथ काम करते हैं. जो कूपोषित बच्चों और लोगों की मदद करता है. हमारे देश में कुपोषण हमेशा से एक दिक्कत रहा है. पर पिछले एक साल में कोविड और लॉकडाउन की वजह से ये और भी ज़्यादा बढ़ गया है. अपने आसपास कुपोषण देखने के लिए ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है. बस अपने घर से निकलकर पास के सिग्नल तक चले जाइए.

डाउन टू अर्थ मैगज़ीन के मुताबिक, बच्चों और मांओं में पाए जाने वाला कुपोषण देश में 15 प्रतिशत बीमारियों के पीछे ज़िम्मेदार है. वैसे कुपोषित होने का मतलब ये नहीं है कि कोई बहुत दुबला है. कुपोषण का मतलब है शरीर में ज़रूरी पोषक तत्वों की कमी. हो सकता है कुपोषण सुनकर आपके दिमाग में सूडान या अफ्रीका में रहने वाले बच्चे ही ज़हन में आएं. पर ऐसा नहीं है. National Center for Biotechnology Information यानी NCBI के मुताबिक, इंडिया में पांच साल से कम के बच्चों में कुपोषण एक बड़ी चुनौती है.

आज तक में एक रिपोर्ट छपी है. उसके मुताबिक PTI ने बताया है कि देश में 10 लाख बच्चे कुपोषित हैं. विकास कुपोषित बच्चों और लोगों के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने हमसे रिक्वेस्ट की है कि हम इस मुद्दे पर बात करें. तो चलिए आज इसी पर बात करते हैं.

कुपोषण क्या और क्यों होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर सुजीत.

डॉक्टर सुजीत रंजन, एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर, द कोएलिशन फॉर फ़ूड एंड न्यूट्रिशन सिक्यूरिटी
डॉक्टर सुजीत रंजन, एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर, द कोएलिशन फॉर फ़ूड एंड न्यूट्रिशन सिक्यूरिटी

कुपोषण और कुपोषण की अवस्था की जानकारी होना हम सभी के लिए महत्वपूर्ण है. हम स्वस्थ रहने के लिए भोजन के माध्यम से ऊर्जा और पोषकतत्व प्राप्त करते हैं लेकिन यदि भोजन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज तत्व नहीं मिलते हैं तो हम कुपोषण के शिकार हो सकते हैं. शरीर के लिए आवश्यक संतुलित आहार लंबे समय तक न मिलना ही कुपोषण है. कुपोषण के कारण बच्चों और महिलाओं की इम्युनिटी कम हो जाती है, जिससे वो आसानी से कई बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. इसीलिए कुपोषण की जानकारी होना बेहद आवश्यक है.  कुपोषण पर्याप्त संतुलित आहार के अभाव में होता है. ये बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, ये जन्म के बाद या उससे भी पहले शुरू हो जाता है. 6 महीने से 3 साल तक के बच्चों में कुपोषण की तीव्रता सबसे अधिक देखने को मिलती है. भूख से मुक्ति और अच्छा पोषण भावी पीढ़ी को बदलने और सशक्त बनाने की शक्ति रखता है. कुपोषण बच्चों के अस्तित्व और विकास के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है.

इंडिया में कुपोषण की क्या स्थति है?

हमारे देश में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ो के मुताबिक, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन ( लंबाई कम होने की समस्या ) या दुबलेपन की समस्या है. अंडरवेट यानी कम वज़न से एक बड़ी आबादी ग्रस्त है.

Why India remains malnourished
कुपोषण पर्याप्त संतुलित आहार के अभाव में होता है

इसके अलावा अति कुपोषित बच्चों की संख्या भी बहुत ज्यादा है. ये हमारे देश में कुपोषण के उच्च स्तर को दिखाता है, जिसके लिए उचित और मजबूत कदम ज़रूरी हैं और उसको नियोजित करने की आवश्यकता है.

कुपोषण के लक्षण

बच्चों के शरीर की वृद्धि का रूकना या मांसपेसियों का ढ़ीला पड़ जाना या सिकुड़ जाना कुपोषण की निशानी है. साथ ही साथ झुर्रियों युक्त पीले रंग की त्वचा, त्वचा का रंग बदल जाना, पीलापन आ जाना, कार्य करने या जल्द ही उसमें थकान या कमजोरी महसूस होना, चिड़चिड़ापन या घबराहट होना, बालों का रूखा होना या फिर चमक का खत्म हो जाना, वजन का कम होना और कमजोरी, साथ ही साथ नींद कम हो जाना और पाचनक्रिया का गड़बड़ होना कुपोषण की श्रेणी में आते हैं.

इलाज

कुपोषण से ग्रसित बच्चे के उपचार में सबसे महत्वपूर्ण है आहार परिवर्तन. बच्चा कुपोषित है तो ज़रूरी है कि बच्चे के आहार में पोषक तत्वों को शामिल किया जाए. बच्चे के जन्म के एक घंटे के अंदर उसे मां का दूध उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है

Why community matters in tackling malnutrition | The Indian Express
बच्चों के शरीर की वृद्धि का रूकना या मांसपेसियों का ढ़ीला पड़ जाना या सिकुड़ जाना कुपोषण की निशानी है

मां का पहला दूध बच्चे के लिए जीवनदान का काम करता है. इसके साथ ही साथ वो बच्चे के लिए इम्यूनाइजेशन है. पहले 6 महीने बच्चे को सिर्फ मां का दूध देना चाहिए उसके अलावा कुछ भी न दें. लेकिन 6 महीने के बाद सिर्फ मां का दूध पर्याप्त नहीं होता है. यही वो उम्र है जब बच्चा कुपोषण का शिकार हो सकता है. इस वक्त उसको ऊपरी आहार देना शुरू करना चाहिए. ये ऊपरी आहार भी उसकी क्वालिटी, क्वांटिटी और फ्रीक्वेंसी पर निर्भर करता है कि कितनी बार देना है. अगले 2 साल इन सभी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. इसके साथ ही बच्चे के खाने का हाइजीन मेनटेन करना जरूरी है ताकि वो किसी और बीमारी का शिकार न हो सके.

उम्मीद है कुपोषण से जुड़ी आपकी सारी ग़लतफ़हमियां दूर हो गई होंगी. सरकार कुपोषण से निपटने के लिए कोशिश कर रही हैं पर हालात सुधरते हुए नहीं दिख रहे. सरकार के साथ-साथ आप भी ऐसे बच्चों की मदद कर सकते हैं. कुछ NGOs हैं जो वाकई ऐसे बच्चों की मद कर रहे हैं. आप जांच-पड़ताल करके ऐसे NGOs के साथ जुड़ सकते हैं. मदद कर सकते हैं.


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