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क्या है 'गोल्ड डिगर' शब्द की कहानी, जो महिलाओं के कैरेक्टर पर सवाल उठा देता है?

सीन 1

सड़क किनारे खड़ी एक लड़की. दिन का समय. धूप निकली हुई. लड़की किसी का इंतज़ार कर रही है. बार-बार फोन चेक करती है. कैमरा उससे तकरीबन दस फुट की दूरी पर है. तभी वहां एक लड़का आता है. जीन्स-टीशर्ट पहने हुए. लड़की का ध्यान उस पर जाता है.

लड़का: हेलो! आप बहुत सुंदर हैं.

लड़की: थैंक्यू.

लड़का: मैं सोच रहा था कि क्या आप मेरे साथ डेट पर जाना पसंद करेंगी?

लड़की उसे ऊपर से नीचे तक देखती है. मुंह बनाती है.

लड़की: सॉरी. मेरा बॉयफ्रेंड है. मैं उसका वेट कर रही हूं.

लड़का: आपका नंबर भी नहीं मिल सकता?

लड़की: नहीं. प्लीज मुझे अकेला छोड़ दो. मुझे कोई बात नहीं करनी तुमसे.

कैमरा लड़की पर ज़ूम करता है. वो फिर फोन चेक करने लग जाती है.

सीन 2. उसी लोकेशन पर.

पंद्रह मिनट बाद एक चमचमाती स्पोर्ट्स कार लड़की के सामने आकर रुकती है. उसमें सूट पहने एक लड़का बैठा है. रे बैन का चश्मा लगा रखा है. वो लड़की के सामने वेव करता है. लड़की फोन से चेहरा उठाकर सामने देखती है. गाड़ी में बैठा लड़का चश्मा उतारकर लड़की से बात करना शुरू करता है.

लड़का: सॉरी मैं इस एरिया में नया हूं. मैं पास में कोई मॉल ढूंढ रहा हूं. शॉपिंग करनी है. क्या आपको पता है आस-पास कोई ऐसी जगह है क्या?

लड़की: हां आगे दस मिनट दूर एक मॉल है. उस रेड लाइट से दाएं मुड़ जाइएगा.

लड़का: आप गई हैं वहां?

लड़की: हां मैं हमेशा जाती हूं. (लड़की मुस्कुरा रही है)

लड़का: तो प्लीज क्या आप आकर मेरी मदद कर सकती हैं? मुझे बस आधा घंटा लगेगा. हम वहां कॉफ़ी पी सकते हैं.

लड़की: हां ठीक है चलिए. ये आपकी कार है?

लड़का: हां मेरी कार है. अभी कुछ महीने पहले ही ली. आपको पसंद आई? वैसे आप किसी का वेट तो नहीं कर रही हैं?

लड़की: हां बहुत अच्छी कार है. नहीं मैं किसी का वेट नहीं कर रही. कैब बुक कर रही थी. चलिए.

लड़का: हां आइये बैठिये.

लड़की गाड़ी की दूसरी तरफ चलकर जाती है. दरवाज़ा खोलने की कोशिश करती है. दरवाज़ा नहीं खुलता. तभी खिड़की का शीशा नीचे होता है. उस सीट पर वही लड़का बैठा होता है जिसे लड़की ने नंबर देने से मना किया था. दोनों लड़के उस लड़की को गालियां बकते हैं. और उसे ‘गोल्ड डिगर’ कहते हुए निकल जाते हैं. लड़की चीखती-चिल्लाती, बातें सुनाती रह जाती है.

आपने जो ऊपर पढ़ा, ये एक बानगी है. कमोबेश इसी स्क्रिप्ट के साथ यूट्यूब पर सैकड़ों वीडियो चलते हैं. सबके टाइटल में गोल्ड-डिगर शब्द लिखा होता है. और उसमें लालची लड़कियां दिखाई देती हैं. जो अमीर लड़कों को देखकर रीझ जाती हैं. और साधारण लड़कों को देखकर शक्ल बना लेती हैं. विदेश के बने ऐसे ही वीडियोज़ में अधिकतर ये लड़कियां छोटे कपड़े पहने हुए दिखाई देती हैं.

Gold Dig Yt
यूट्यूब पर ऐसे वीडियोज की भरमार है. (तस्वीर: यूट्यूब स्क्रीनशॉट)

ऐसा लगता है, जैसे प्लैन किया हुआ होता है सब कुछ. खैर, उस पर बात फिर कभी. अभी ज़रा इस शब्द पर आते हैं.

सुशांत सिंह राजपूत मामले में रिया चक्रवर्ती का नाम सामने आने के समय से ही उन्हें कई तरह के विशेषण दिए जा रहे हैं. विष कन्या, हत्यारिन, काला जादू करने वाली, लालची, और न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है. इसी में एक शब्द है ‘गोल्ड डिगर’.

Gold Digger Rhea Report
रिया को लेकर ऐसी कई रिपोर्ट्स इंटरनेट पर देखने को मिलीं.

क्या है इस शब्द की कहानी?

सीधे तौर पर देखें तो इस शब्द का मतलब है ऐसा व्यक्ति, जो सोने की खोज में खुदाई करे. लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत में ये शब्द ऐसी महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा, जो किसी रूमानी रिश्ते को बनाने में सामने वाले की धन-सम्पत्ति पर ज्यादा फोकस रखती थीं. यानी पैसों को देखकर रिश्ते बनाती थीं. इस शब्द का शुरुआती पॉपुलर इस्तेमाल 1919 में आए एक नाटक में देखा गया. ब्रॉडवे के नाटक ‘द गोल्ड डिगर्स’ में ऐसी महिलाएं दिखाई गई थीं, जो एक अमीर पति की तलाश में थीं. इसे एवेरी हॉपवुड ने डायरेक्ट किया था.

1920 के दशक में पेगी हॉपकिंस जॉयस नाम की एक्ट्रेस हुईं. अमेरिका में. इन्होंने छह शादियां की थीं. उस समय के पॉप कल्चर में, पेगी के लिए गोल्ड डिगर शब्द का इस्तेमाल किया गया. साल 2000 में एक किताब आई. ‘गोल्ड डिगर: द आउटरेजियस लाइफ एंड टाइम्स ऑफ पेगी हॉपकिंस जॉयस’ (Gold Digger: The Outrageous Life and Times of Peggy Hopkins Joyce) नाम से. इसे लिखा था कॉन्स्टेन्स रोजेनब्लम ने.

Peggy Imdb
एक्ट्रेस पेगी हॉपकिंस को गोल्ड डिगर कहा जाता था  (तस्वीर: imdb)

औरतों के लिए गोल्ड डिगर शब्द क्यों?

ओनाती इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर द सोशियोलॉजी ऑफ लॉ ने एक आर्टिकल छापा. नाम था ‘इन डिफेन्स ऑफ द गोल्ड डिगर’. लिखने वाली थीं शैरन थॉम्प्सन. उन्होंने लिखा,

1920 के दशक में अमेरिका में ऐसा समय था, जहां पुरुषों के पास पैसा आ रहा था, लेकिन महिलाएं कम पैसों और कम सम्मानित नौकरियों तक सीमित थीं. यही नहीं, अधिकतर अमेरिकी महिलाएं घर से बाहर काम भी नहीं करती थीं. एक अमीर पति, उन्हें एक बेहतर जीवन का मौका उपलब्ध कराता था. ये वो समय था, जब लेबर मार्केट में औरतों को बराबर की भागीदारी के मौके नहीं मिलते थे.

गोल्ड-डिगर शब्द की लोकप्रियता ये सुबूत नहीं देती कि कई महिलाएं पुरुषों के साथ सिर्फ आर्थिक वजहों से रिश्ते बना रही थीं. लेकिन महिलाओं और पुरुषों के बीच की आर्थिक और ढांचागत गैर-बराबरी ये ज़रूर बताती है कि इस शब्द को स्त्रियों से क्यों जोड़कर देखा गया. क्योंकि अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए महिलाओं का अमीर पुरुषों से शादी करना ज्यादा सम्भाव्य था, जबकि इसके उलटे मामले बेहद कम थे. यानी एक पुरुष का अमीर महिला से पैसों के लिए शादी करना.

आओ बहन घर-घर खेलें

भारत का उदाहरण लेते हैं. यहां पर भी गोल्ड-डिगर शब्द बड़ा पॉपुलर हुआ है. आया भले ही बाहर से हो. लेकिन वीडियो यहां भी इसके खूब बनते हैं. इंटरनेट पर महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में इसका स्थान टॉप टेन में मान सकते हैं आप. फेमिनाज़ी से ज़रा ही नीचे होगा पायदान में. यहां पर भी अगर कोई लड़की किसी अमीर व्यक्ति से शादी करती या रिलेशनशिप में आती दिख जाए, तो उसे गोल्ड-डिगर कह दिया जाता है.

Rhea Gold Digger
रिया चक्रवर्ती को गोल्ड डिगर कहने वाले तमाम वीडियो भरे पड़े हैं.

तो अमीर लड़कियां कहां हैं? किससे शादी कर रही हैं? कहां हैं वो अमीर लड़कियां, जो साधारण जीन्स-टीशर्ट पहनने वाले लड़कों की दुनिया बदल सकने की कूवत रखती हैं? हैं भी या नहीं?

नेशनल काउन्सिल ऑफ अप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च ने 2018 में एक स्टडी पब्लिश की थी. जेंडर गैप इन लैंड ओनरशिप नाम से. इसमें बताया गया कि खेती-बाड़ी के लिए जो ज़मीन उपलब्ध है, उसका 83 फीसद हिस्सा पुरुष सदस्यों के पास है. और मात्र दो फीसद महिला सदस्यों के पास. दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की सालाना मीटिंग 2018 में भी बताया गया कि भारत उन 15 देशों में से एक है, जहां पितृसत्तात्मक परम्पराओं की वजह से महिलाओं को जायदाद में बराबरी का अधिकार नहीं मिलता. ये 15 देश दक्षिण एशिया, लैटिन अमेरिका, और सब-सहारा अफ्रीका में आते हैं.

थोड़ा और गहराई में उतरते हैं. घर की बात करते हैं.

‘मम्मी अपनी मर्जी से काम नहीं करतीं, उनको आलस आता है. कहतीं, इतने साल हो गए घर चलाते, अब कहां धक्के खाऊं बाहर के. मेरे पापा तो सारे पैसे मम्मी के हाथ में लाकर रख देते हैं. वो चाहे घर जैसे चलायें. घर में कब क्या आयेगा, सब कुछ मम्मी ही डिसाइड करती हैं. पापा एक शब्द नहीं बोलते. कुछ पूछो तो कहते, होम मिनिस्टर की चलती है हमारे घर में, हीहीही’ .

इस तरह के डायलॉग आपने अक्सर सुने होंगे अपने आस-पास. अधिकतर महिलाएं, चाहे वो मिडल क्लास की हो या लोअर मिडिल क्लास की, या फिर किसी धनी अपर मिडल क्लास की, घर पर रहकर घर की देखभाल करती हैं. जो निम्न मध्यम आय वर्ग या निम्न आय वर्ग की महिलाएं काम के लिए निकलती हैं, उनमें से अधिकतर गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करती हैं. जहां न ट्रेनिंग होती है, न कोई जॉब सिक्योरिटी. मध्यम और उच्च आय वर्ग की जो महिलाएं काम करने बाहर जाती भी हैं, उनकी संख्या पुरुषों के मुकाबले बहुत कम है.

हमारी मत मानिए. अंतरराष्ट्रीय श्रम आयोग की रिपोर्ट की मानें तो साल 2019 में भारत के लेबर फ़ोर्स में महिलाओं की भागीदारी महज 20.5 फीसद रही. वहीं पुरुषों की भागीदारी इसी साल 76 फीसद रही. ‘द इकोनॉमिस्ट’ में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि 2005 से भारत की इंडस्ट्रियों में जितने भी जॉब शुरू किए गए हैं, उनका 90 फीसद पुरुषों के हाथों में गया है.

Kudi Kehndi
‘कुड़ी कैंदी बेबी पहले जगुआर ले लो’ गाना गाने दी की लोड़ पै गई मुंडयों? कुड़ी नू नौकरियां पवा दो, अपनी कमाई से खरीदी वैगनआर में भी खुश रह लेगी. 

दुनिया में महिलाओं को आधी आबादी कहा जाता है. इस समय फ़ोर्ब्स की टॉप 10 बिलियनेयर्स (अरबपति) की लिस्ट में एक भी महिला नहीं है. फ़ोर्ब्स की इसी लिस्ट के 100 शुरुआती अरबपतियों में महज 10 महिलाओं के नाम शामिल हैं. जो कुल संख्या का दस फीसद है.

आय से लेकर संपत्ति के मालिकाना हक़ में जो इतना बड़ा अंतर है, वो अगर गोल्ड-डिगर लिखने से भर जाता तो कितनी सहूलियत होती, नहीं?


वीडियो: पुष्पम प्रिया ने बताया बिहार चुनाव में हर जनता तक उनकी बात पहुंचे, इसके लिए क्या कर रही हैं?

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