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पसंद की तारीख और समय पर बच्चा पैदा करवाने के लिए क्या करना पड़ता है?

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27 दिसंबर, 2019. सलमान खान का बर्थडे. इसी दिन वो फिर से मामा बने. उनकी बहन अर्पिता खान और आयुष शर्मा के घर पैदा हुई एक बेटी. ख़बरों की मानें तो सलमान ने अपनी बहन से एक ख़ास तोहफ़ा मांगा था. तो तोहफ़े के रूप में उन्हें मिली आयत. यही नाम है अर्पिता की बेटी का.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी ख़बर के मुताबिक, अर्पिता और आयुष चाहते थे कि उनकी बेटी 27 दिसंबर को ही पैदा हो. हालांकि, उनकी ड्यू डेट दिसंबर के आख़री हफ़्ते या जनवरी के पहले हफ़्ते के बीच पड़ रही थी. इसलिए दोनों पति-पत्नी ने मिलकर तय किया कि बच्चा 27 को पैदा करेंगे.

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                                      अर्पिता खान, आयुष शर्मा, उनका बेटा अहिल और बेटी आयत.

एक ख़ास दिन पर बच्चा पैदा करने की चाह बड़ी आम है. कई लोग ऐसा करना चाहते हैं. किसी शुभ मुहूर्त के चलते. या किसी दिन की ख़ास अहमियत के कारण. पर क्या आप बच्चे की डिलीवरी कंट्रोल कर सकते हैं? और कैसे? ये जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर आशा शर्मा और डॉक्टर मीनाक्षी अहुजा से. डॉक्टर आशा शर्मा रॉकलैंड हॉस्पिटल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं. डॉक्टर मीनाक्षी अहुजा भी स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं और दिल्ली में अपनी क्लिनिक चलाती हैं.

किसी ख़ास दिन कैसे हो सकती है बच्चे की डिलीवरी

सबसे पहले कुछ ज़रूरी चीज़ें जान लेते हैं.

1. एक फुल-टर्म प्रेग्नेंसी यानी पूरी प्रेग्नेंसी 37 हफ़्ते से लेकर 42 हफ़्तों तक की होती है.

2. अगर बच्चा 37 हफ़्तों से पहले पैदा होता है तो इसका मतलब है बच्चा प्रीमच्यौर पैदा हुआ है. यानी सही समय से पहले.

3. अगर बच्चा 42 हफ़्तों बाद पैदा हुआ है तो इसका मतलब है बच्चा ओवरड्यू है. यानी समय से लेट पैदा हो रहा है.

अब आगे बढ़ते हैं.

डॉक्टर आशा शर्मा ने बताया-

‘ये आजकल बहुत आम बात है. हमारे पास कई ऐसे कपल आते हैं जो चाहते हैं उनका बच्चा किसी ख़ास दिन या ख़ास समय पर पैदा हो. इसकी पीछे वजह ज़्यादातर शुभ मुहूर्त होती है. कभी-कभी किसी दिन की उनकी ज़िंदगी में ख़ास अहमियत होती है. इसलिए वो चाहते हैं उनका बच्चा तब पैदा हो.’

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  एक ख़ास दिन पर बच्चा पैदा करने की चाह बड़ी आम है.

क्या करना पड़ता है ऐसी डिलीवरी के लिए

इस पूरे प्रोसेस की शुरआत काफ़ी समय पहले हो जाती है. यानी तब, जब गर्भधारण करना होता है.

डॉक्टर आशा शर्मा आगे बताती हैं-

‘जब महिलाएं हमसे ऐसा करने को कहती हैं तो हम उन्हें अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाते हैं. साथ ही उन्हें stimulation टैबलेट देते हैं. अब ये stimulation टैबलेट क्या होती है? इन दवाओं में वो हॉर्मोन होते हैं जो ओवुलेशन में मदद करते हैं. ओवुलेशन मतलब अंडे का ओवरी यानी अंडाशय से बाहर निकलने की प्रोसेस. फलोपियन ट्यूब के ज़रिए होते हुए ये गर्भाशय तक पहुंचता है. जब ये अंडे फलोपियन ट्यूब से गुज़र रहे होते तो इसमें 12 से 24 घंटे लगते हैं. यहां अब अगर कोई स्पर्म होता है तो वो अंडे से आकर मिल जाता है. इसका नतीजा होती है प्रेग्नेंसी. अब ये सब कुछ आप कैलकुलेट कर सकते हैं. हम जो दवा देते हैं, वो इस पूरे प्रोसेस को सही समय पर होने में मदद करता है. ज़्यादातर केसेस में ये सफ़ल होता है. इसके हिसाब से डिलीवरी कब होगी, किस हफ़्ते में, किस दिन- ये अंदाज़न तय कर सकते हैं’.

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इस तस्वीर में अंडा ओवरी यानी अंडाशय से बाहर निकल रहा है. फलोपियन ट्यूब के ज़रिए होते हुए ये गर्भाशय तक पहुंचेगा.

अब अगर इतनी प्लानिंग नहीं की जाए, तब क्या होता है

इस पर डॉक्टर आशा शर्मा कहती हैं-

‘देखिए, 37 से लेकर 40 हफ़्ते तक हम कभी भी डिलीवरी कर सकते है. सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन की मदद से. हमारे पास तीन हफ़्तों का समय होता है. अब अगर कोई महिला बोले कि उसे अपना बच्चा एक ख़ास दिन पैदा करना है तो हम ऐसा कर सकते हैं. बशर्ते उसकी प्रेग्नेंसी 37 हफ़्ते से 40 हफ़्ते के बीच हो. न उस से पहले. न उसके बाद. एक ज़रूरी बात. ऐसा सिर्फ़ सी-सेक्शन से ही हो सकता है. नार्मल डिलीवरी के केस में हरगिज़ नहीं. आप लेबर पैन पहले तो ला सकते हैं पर उसे पोस्टपोन नहीं कर सकते.’

डिलीवरी वाले दिन क्या होता है

अब एक ख़ास दिन और समय तय हो गया. फिर? इसपर डॉक्टर आशा शर्मा कहती हैं-

‘उस दिन हम महिला को अल्ट्रासाउंड के लिए बुलाते हैं. खाली पेट. ये देखने के लिए कि क्या बच्चा उस दिन पैदा हो सकता है? कोई दिक्कत तो नहीं होगी. अल्ट्रासाउंड अगर ठीक है तो हम ऑपरेशन की मदद से बच्चा डिलीवर कर देते हैं. किसी दवा या इंजेक्शन की ज़रूरत नहीं पड़ती. नॉर्मल डिलीवरी में हम ऐसा नहीं कर सकते.’

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ऐसी डिलीवरी सिर्फ़ सी-सेक्शन की मदद से ही हो सकती है.

अब ये तो हो गया पूरा प्रोसेस. पर ऐसा करना कितना सही है

डॉक्टर मीनाक्षी अहुजा से इस बारे में हमने बात की. उनका कहना है-

‘पहली जनवरी को मैंने सी-सेक्शन से एक महिला की डिलीवरी करवाई. उनकी ड्यू डेट 2 जनवरी थी. पर उन महिला ने बताया कि उनकी सास ने पंडितजी से बात की. पंडितजी ने कहा कि बच्चा पहली जनवरी 10 बजे पैदा होना चाहिए. ये शुभ मुहूर्त है. तो हमने महिला को पहली जनवरी को ही बुलाया. अल्ट्रासाउंड किया. सब नॉर्मल था. फिर सी-सेक्शन की मदद से डिलीवरी की. पर ऐसा नहीं हो सकता कि आपकी डेलिवरी दिसंबर के आख़री हफ़्ते में होनी है और आप कहें कि बच्चा फ़रवरी में डिलीवर करना है. ये मुमकिन नहीं है.’

क्या ये चलन हेल्दी है?

इसपर डॉक्टर मीनाक्षी अहुजा कहती हैं-

‘देखिए, कोई भी शुभ दिन या समय मां और बच्चे की सेहत से बढ़कर नहीं होता. अगर हमें लगता है कि मां डिलीवरी के लिए तैयार नहीं है तो हम साफ़ मना कर देते हैं. कोई भी डॉक्टर मां और बच्चे की सेहत से खिलवाड़ नहीं करेगा. ऐसा सिर्फ़ तभी हो सकता है जब प्रेग्नेंसी नॉर्मल हो. और डिलीवरी सी-सेक्शन से हो रही हो. हम औरतों को भी यही समझाना चाहते हैं. मुहूर्त के चक्कर में अपनी सेहत से खिलवाड़ न करें.’

दुरुस्त बात है!


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