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यौन शोषण की शिकायत वापस लेने गई महिला को कोर्ट ने खाली हाथ क्यों लौटा दिया?

महाराष्ट्र का औरंगाबाद. यहां का छावनी पुलिस स्टेशन. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 16 जनवरी, 2019 को  महिला टीचर ने FIR दर्ज कराई. महिला ने अपने साथ काम करने वाले पुरुष टीचर पर यौन शोषण का आरोप लगाया. महिला टीचर ने आरोप लगाया कि एक दिन पुरुष टीचर ने साथ चलकर फिल्म देखने के लिए कहा. पुरुष टीचर ने यह ऑफर दूसरे शिक्षकों के सामने दिया. महिला टीचर ने प्रस्ताव ठुकरा दिया. जिसके बाद आरोपी ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि अगर वो नहीं चली, तो वो उसे जबरदस्ती ले जाएगा. अपनी शिकायत में महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी अक्सर उसका पीछा करता था और आंख भी मारता था.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक,यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगबाद में पहुंचा. जहां महिला ने अपनी FIR वापस लेने के लिए एफिडेविट डाला. लेकिन होई कोर्ट बेंच ने FIR रद्द करने से मना कर दिया. क्यों? क्योंकि बेंच को लगा कि पीड़िता किसी दबाव के कारण FIR वापस लेना चाहती है. साथ ही बेंच ने यह भी कहा कि अगर स्कूल का मैनेजमेंट विशाखा गाइडलाइन्स के तहत मामले में कार्रवाई करता, तो बेहतर होता.

कोर्ट ने क्या कहा?

इस बेंच में जस्टिस रवींद्र घूगे और जस्टिस भालचंद्र देबद्वार शामिल थे. मामले की सुनवाई के दौरान उन्हें पीड़िता के वकील एसपी कोली के चेहरे के हाव-भाव ठीक नहीं लगे. इसके बाद बेंच ने पीड़िता की तरफ से दाखिल एफिडेविट को पढ़ा. जिसकी एक लाइन उन्हें अजीब लगी. इस लाइन में लिखा था- पीड़िता अब कभी भविष्य में आरोपी के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं कराएगी.

इस लाइन को पढ़ने के बाद बेंच ने कहा,

“यह लाइन बताती है कि पीड़िता किस तरह के दबाव से जूझ रही हो सकती है. या तो यह दबाव स्कूल मैनेजमेंट की तरफ से डाला जा रहा है या फिर आरोपी की तरफ से. अच्छा तो यही होता कि स्कूल मैनेजमेंट ने विशाखा गाइडलाइन्स के तहत आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की होती. FIR में आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोपों का जिक्र है. ऐसे में पीड़िता की तरफ से किसी भी तरह का समझौता न्याय व्यवस्था के हित में नहीं होगा. इससे गलत उदाहरण जाएगा. इसलिए हम FIR रद्द नहीं करेंगे.”

Vishakha Guidelines क्या है?

तो बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने विशाखा गाइडलाइन्स का जिक्र किया. अब इसके बारे में भी थोड़ा सा जान लेते हैं. विशाखा गाइडलाइन दफ्तरों में होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकने और पीड़िता को न्याय दिलाने के बारे में है. इन गाइडलाइन्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में दिशा निर्देश दिए थे. ये दिशा निर्देश भंवरी देवी के मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए. दरअसल, भंवरी देवी ने उस दौरान एक बाल विवाह रोकने की कोशिश की थी. जिसके बाद उनका रेप किया गया था. एक ट्रायल कोर्ट ने दोषियों को छोड़ दिया था. लेकिन इसके बाद विशाखा नाम के प्लेटफॉर्म के तहत भंवरी देवी और कुछ महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी. जिसके ऊपर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कुछ दिशा निर्देश जारी किए गए.

– कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है. ये अनुच्छेद नागरिकों को मौलिक अधिकार देते हैं.
– कोर्ट ने यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न के कुछ मामले अनुच्छेद 19 (1) (g) का उल्लंघन करते हैं. जो स्वतंत्रता का अधिकार है.
– कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर किसी भी तरह के गलत इशारे करना यौन उत्पीड़न के तहत आएगा.
– साथ ही गलत व्यवहार या टिप्पणी करना भी यौन उत्पीड़न है.
– शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहना या इस तरह की कोशिश करना भी सेक्सुअल हैरेसमेंट है.

साल 2013 में ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस ऐक्ट’ आया. इस ऐक्ट में विशाखा गाइडलाइन्स के तहत ही वर्कप्लेस पर महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने की बात कही गई. साथ ही साथ इसमें सेक्सुअल हैरेसमेंट से मुक्त वर्कप्लेस बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया. इस ऐक्ट के तहत पीड़िता को यह अधिकार है कि वह आरोपी के खिलाफ सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह की कार्रवाई का सहारा ले सकती है. ये ऐक्ट सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के दफ्तर पर लागू होता है.

औरंगाबाद बेंच ने कहा कि स्कूल के मैनेजमेंट को Vishakha Guidelines के तहत कार्रवाई करनी चाहिए थी.
औरंगाबाद बेंच ने कहा कि स्कूल के मैनेजमेंट को Vishakha Guidelines के तहत कार्रवाई करनी चाहिए थी.

– एक्ट के तहत हर वो दफ्तर जहां दस या उससे अधिक लोग काम करते हैं, वहां एक इंटर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी होती है. जिसे शॉर्ट में ICC कहते हैं. इस कमेटी की अध्यक्ष कोई महिला ही होती है.
– एक्ट के मुताबिक इस कमेटी में कम से कम आधी सदस्य महिलाएं होनी चाहिए. साथ ही साथ एक सदस्य यौन हिंसा के मामलों पर काम करने वाले किसी NGO की सदस्य होनी चाहिए.

पीड़िताओं पर कैसे डाला जाता है दबाव

अब हम कुछ ऐसे मामलों की बात कर लेते हैं, जहां पीड़िता और उसके परिवार पर केस वापस लेने का दबाव डाला गया. उन्हें धमकी दी गई. यहां तक कि जान भी ले ली गई.

ऐसे मामलों में सबसे पहला जो मामला ध्यान आ रहा है, वो उन्नाव के पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से जुड़ा है. सेंगर पर 2017 में एक नाबालिग लड़की का रेप करने का आरोप लगा था. जिसके बाद पीड़िता और उसके घरवालों को धमकियां मिलां. पीड़िता के पिता को तो झूठे मामले में जेल भी भिजवा दिया गया. जहां पुलिस कि पिटाई से उनकी मौत हो गई. इस मामले में एक नया मोड़ तब आया, जब साल 2019 के जुलाई महीने में एक ट्रक ने एक गाड़ी में टक्कर मार दी. इस गाड़ी में पीड़िता अपनी चाचियों का साथ बैठी हुई थी. चाचियों की मौके पर ही मौत हो गई. वहीं पीड़िता को गंभीर हालत में आईसीयू में भर्ती कराया गया. बाद में नाबालिग का रेप करने के दोष में सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. पीड़िता के पिता की गैर-इरादतन हत्या का दोष भी सेंगर और उसके सहयोगियों पर सिद्ध हो गया. इसके लिए अलग से 10 साल की कैद और 10 लाख रुपये जुर्माने की सजा मिली.

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में रेप के एक मामले में पीड़िता और उसके परिवार को धमकाया गया. मामला मध्य प्रदेश के जिले नीमच का था. रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता ने तीन लोगों के ऊपर रेप करने का आरोप लगाया था. मेडिकल रिपोर्ट में उसके साथ रेप की पुष्टि हुई थी. पीड़िता के मुताबिक शिकायत दर्ज कराने के तुरंत बाद ही पुलिस ने उसे और उसके परिवार को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. यहां तक की उसके पिता को हिरासत में ले लिया. यह भी धमकी दी कि अगर केस वापस नहीं लिया तो पिता को झूठे मामले में फंसाकर जेल में बंद कर देंगे.

सितंबर 2018 में एक नाबालिग ने मुजफ्फरनगर के एक थाने में शिकायत दर्ज कराई. उसने बताया कि उसके परिवार को धमकी मिल रही है. यह धमकी जेल जा चुके एक शख्स के सहयोगियों की तरफ से दी जा रही है. शख्स को नाबालिग पीड़िता का बलात्कार करने के प्रयास के आरोप में जेल में भेजा गया था. पीड़िता की शिकायत के बाद जिले के एसपी ने जांच की बात कही थी.

ये तो कुछ मामले हैं बस. ऐसे मामलों में अखबारों के पन्ने रंगे रहते हैं. विक्टिम्स पर किस तरह का दबाव बनाया जाता है इस बारे में जानने के लिए हमारी सहयोगी लालिमा ने बात की सुप्रीम कोर्ट के वकील से. उन्होंने कहा,

“पीड़िता पर दबाव बनाने के लिए सबसे पहले पैसे का लालच दिया जाता है. इससे बात नहीं बनती तो फिर चरित्र हनन किया जाता है. फिर जॉब को लेकर परेशानी खड़ी की जाती है. पुलिस और राजनीतिक रसूख से दबाव बनाने की कोशिश की जाती है. गुंडों से धमकियां दिलवाई जाती है. परिवारवालों को भी. दबाव के बाद अगर लड़की मान जाती है तो फिर सेटलमेंट की नियम और शर्तें तय होती हैं. इसमें जो तय होता है, पीड़िता उससे मुकर नहीं सकती. वहीं केस खत्म करने के दो तरीके हैं. पहला सीधे हाई कोर्ट में एफिडेविट दाखिल करके. दूसरा अगर हाई कोर्ट को लगता है कि पीड़िता ने दबाव में एफिडेविट दाखिल किया है और FIR के आरोप काफी संगीन हैं, तो वो FIR रद्द करने से मना भी कर सकती है और दोनों पक्षों को ट्रायल कोर्ट जाने को कह सकती है. ट्रायल कोर्ट में फिर पीड़िता को अपने आरोपों से पलटना पड़ता है.”

तो सुना आपने कि रेप या यौन शोषण के केस में लड़कियों पर किन-किन तरीकों से दबाव बनाया जाता है? किस तरह सेटलमेंट करने की कोशिश की जाती है? और किस तरह कोर्ट से रेप केस हमेशा के लिए ख़त्म किए जाते हैं?


 

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