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क्या पुलिस FIR लिखने से मना कर सकती है?

‘सिम्बा’, ‘सिंघम’, ‘दबंग’ जैसी फ़िल्में तो आपने देखी ही हैं? कितने हिरोइक लगते हैं न इन पिक्चरों के पुलिसवाले? सड़क पर जैसे ही किसी लड़की के साथ अपराध होता दिखता है, रॉकेट की स्पीड से पुलिस उस जगह पहुंच जाती है. इससे आपको पुलिस की छवि क्या नज़र आती है? आंधी आये या तूफ़ान पुलिस सदैव ही अपने कर्तव्यों पर खरी उतरती है. फिर ऐसा क्यों हो जाता है कि जैसे ही FIR लिखवाने की बारी आती है, आम पब्लिक के चेहरे से हवाइयां उड़ जाती हैं? अगर भारत मे पुलिस इतनी ही गम्भीरता से काम करती है, तो लोग पुलिस की वाज़िब जगहो पर भी मदद लेने से क्यों बचते हैं?

आज हम आपसे क्यूरियस केस ऑफ़ FIR पर बात करने वाले हैं. सोशल मीडिया से लेकर पड़ोसी के घर तक, बातें तो बहुत होती है. मसले भी बहुत होते हैं. लेकिन वो अक्सर पुलिस के कागजों तक नहीं पहुंचते.

बेसिक से शुरू करते हैं

एक बहुत ही बेसिक चीज़ होती है FIR नाम की. फुल फ़ॉर्म- first information report. FIR को कम्प्लेंट भी कहते हैं. जैसे हम स्कूल में टीचर के पास जाकर किसी दूसरे बच्चे का कम्प्लेन कर सकते थे, स्कूल से बाहर भी ऐसा ही चलता है. किसी भी इंसान के आपके ख़िलाफ़ असॉल्ट, ऑफेंस, हरैसमेंट, चोरी, डक़ैती या किसी भी तरह का क्राइम किये जाने पर, आपको सबसे पहले नज़दीकी थाने में जा कर एक कम्पलेंट दर्ज करानी होगी. यह ज़रूरी नहीं कि FIR करवाने केवल आप जाएं. जिसे भी उस घटना की पूरी जानकारी हो वो जा कर FIR रजिस्टर करवा सकता है. FIR उस पूरी घटना की एक डिटेल्ड जानकारी होती है. जिसके बाद पुलिस कथित दोषी को पकड़ने का प्रोसेस शुरू करती है.

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

अक्टूबर, 2020 में कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव और एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स (AALI) ने उत्तर प्रदेश में 14 रेप और गैंगरेप विक्टिम्स के अनुभवों पर ‘Barriers in accessing justice’ नाम से एक रिपोर्ट निकाली. रिपोर्ट को अंत तक पढ़ने के बाद ये पता चलता है कि आज भी यूपी में ऐसे मामलों पर FIR दर्ज़ करवा पाना कितना मुश्किल है. UP महज़ एक उदाहरण है. पूरे देश में हालात इससे अलग नहीं हैं.

रिपोर्ट में और क्या है?

इस रिपोर्ट से यह भी पता चला कि पहली शिकायत के बाद किसी भी मामले में FIR दर्ज नहीं की गई थी. 11 मामलों में FIR दर्ज हुई, लेकिन काफी मशक्कत के बाद. इन मामलों में पुलिस को FIR दर्ज करने में दो से 228 दिन का समय लग गया. जबकि कानून के हिसाब से FIR को शिकायत के 24 घंटों के भीतर दर्ज कर देना चाहिए. और इनमें से भी छह मामलों में पीड़िता के वकीलों को सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मदद लेनी पड़ी. ये तो उन केसेज़ की कहानी है जिन्हें वक़ील मिल पाए.

आप ख़ुद अंदाज़ा लगाएं, गांव में, जहां कानून की पहुंच है ही नहीं, वहां बलात्कार, सेक्शुअल हरैसमेंट के केसज़ कैसे रिपोर्ट होते होंगे? कौन करता होगा रिपोर्ट? FIR न लिखना, टालने की कोशिश करना या पीड़िता से कहना कि अपने ही अपराधी के साथ सेटलमेंट कर लो- यह सब कुछ कानूनन अपराध है, लेकिन यह हो रहा है.

कुछ सच्ची कहानियों की ओर ले चलती हूं. मार्च 2021 का एक केस है Tilakdhari vs State of UP and others का. इस केस के जजमेंट में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने तीन मुख्य बातें याद दिलाई:

  • पहला, किसी भी थाने का इंचार्ज कभी भी कोई मामला दर्ज करने से मना नहीं कर सकते हैं. उन्हें लिखित FIR हर हाल में करनी ही होगी.
  • अगर थाना प्रभारी FIR लिखने से मना कर दे, तो उस एरिया के SP यह सुनिश्चित करवाएंगे कि FIR लिखी जाए. साथ ही FIR लिखने से मना कर रहे पुलिसकर्मी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाए.
  • आख़िरी, अगर SP भी आपकी मदद नहीं कर रहे, तब आप उस जगह के मजिस्ट्रेट ऑफ़िस जा कर सीधे ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकते हैं. मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करवाएंगे कि केस फ़ाइल जल्द से जल्द हो.

एक पत्रकार हैं, प्रियंका दुबे. उन्होंने हाल ही में एक किताब लिखी है-“नो नेशन फॉर विमेन – रिपोर्टिंग ऑन रेप फ्रॉम इंडिया, द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी”. यह किताब भारत के unreported rape cases के बारे में हैं. प्रियंका छह साल तक इंडिया के गांव-गांव घूमती रहीं और अनरिपोर्टेड रेप केसेज़ को डॉक्यूमेंट किया. ओपन डिमॉक्रेसी को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में वे कहती हैं,

“रिपोर्टिंग के मेरे अनुभव में, यदि आप ग्रामीण भारत में निचली जाति की महिला हैं, तो आपके साथ बलात्कार होने की अधिक आशंका है. जाति की धौंस जमाने के लिए महिलाओं के शरीर को युद्ध के मैदान की तरह इस्तेमाल किया जाता है.”

तस्वीर में प्रियंका दुबे
तस्वीर में प्रियंका दुबे

प्रियंका यह बताती हैं कि कैसे पुलिस जांच को कई दफ़े पटरी से उतारने की कोशिश करती है- FIR न लिख कर, डरा धमकाकर या तो पीड़िता का हौसला तोड़ देती है. या फिर केस लंबा खींचने की कोशिश करती है. उन्होंने कई केसेस का हवाला दे कर यह बताया है कि किस तरह पुलिस, डॉक्टर और यहां तक मजिस्ट्रेट ने बलात्कार के मामले दर्ज करने से इनकार कर दिए हैं. गवाहों, सबूतों से छेड़छाड़ हुई है और महिलाओं को केस वापस लेने की धमकियां मिलती हैं.

इन सब का परिणाम यह है कि कानून होते हुए भी महिलाओं की लाशें आपको कभी गटर में, कभी खेतों में, कभी नदियों में बहती दिख जाएंगी. ज्यादा से ज्यादा किसी अखबार के लोकल पन्ने में एक कॉलम में खबर बनकर छपी होगी.

ज़रूरी ये है कि काम के प्रति ईमानदारी का दावा सिर्फ़ कहनी तक सीमित न हो, उस पर काम भी हो. ये जरूरी है कि नियम के मुताबिक़, केस रजिस्टर किये जायें और जांच की सही प्रक्रिया का पालन किया जाए.


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