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महिला रोजगार को लेकर आई ये खबर चिंता बढ़ाने वाली है

महिला रोजगार को लेकर एक चिंताजनक खबर आई है. सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) नाम के थिंक टैंक ने बताया है कि भारत में केवल 7 फीसद शहरी महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पास रोजगार है या वे उसकी तलाश कर रही हैं. CMIE के मुताबिक, महिलाओं को रोजगार देने के मामले में हमारा देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब से भी पीछे है. कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और गहरा बनाया है. साथ ही सरकार की नीतियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं.

महिलाओं को रोजगार मिलने से क्या होगा?

दि इकनॉमिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इतनी कम संख्या में शहरी औरतों का रोजगार में होना चिंता का विषय है. मैग्जीन बताती है कि कोविड-19 महामारी के दौरान सबसे पहले महिलाओं के ही रोजगार पर असर पड़ा. इसके अनुसार-

“कोविड-19 महामारी से उन सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिन पर महिलाएं सीधे तौर पर रोजगार के लिए निर्भर हैं. चाहें डोमेस्टिक हेल्प हो, स्कूलिंग सेक्टर हो, टूरिज्म या कैटरिंग से जुड़ा सेक्टर.”

मैग्जीन बताती है कि एक तो कोविड-19 संकट के चलते भारी संख्या में महिलाओं को इन सेक्टर से निकाला गया. वहीं, बच्चों के स्कूल बंद हो जाने से महिलाओं पर उनकी देखरेख का अतिरिक्त बोझ आ गया. इसके चलते भी कइयों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी.

दि इकनॉमिस्ट ये भी बताती है कि ज्यादातर भारतीय महिलाएं फॉर्मल इकॉनमी में काम करना चाहती हैं और अगर ऐसा होता है तो भारत में करीब 10 करोड़ महिलाएं इस सेक्टर में काम कर सकती हैं. ये संख्या फ्रांस, जर्मनी और इटली की कुल वर्कफोर्स से भी ज्यादा होगी. इससे भारत की अर्थव्यवस्था में जो तेजी आएगी, वो अभूतपूर्व होगी.

कोविड 19 ने महिलाओं की Unemployment की समस्या को और भी गहरा कर दिया.
कोविड 19 ने महिलाओं की Unemployment की समस्या को और भी गहरा कर दिया.

CMIE के अलावा इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) के एक सर्वे में भी सामने आया है कि कोविड-19 से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज्यादा बुरा असर पड़ा. संस्था ने मुंबई में एक सर्वे किया और पाया कि जहां तीन-चौथाई पुरुषों के रोजगार पर महामारी ने असर डाला, वहीं महिलाओं का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत रहा. इसी सर्वे में पाया गया कि पुरुषों के लिए नया रोजगार पाना महिलाओं के मुकाबले आठ गुना आसान रहा. उदाहरण के लिए पुरुषों ने चीजों को डिलीवर करने की जॉब कर ली, जो भारत जैसे समाज में महिलाएं आसानी ने नहीं कर सकतीं.

CMIE के अनुसार, साल 2019 में 9.7 फीसदी शहरी महिलाएं लेबर फोर्स का हिस्सा थीं. लेकिन महामारी के दौरान ये हिस्सा घटकर 6.9 फीसदी हो गया. संस्था ने पूरे भारत में एक लाख 70 हजार परिवारों से बात करने के बाद ये तथ्य पेश किए हैं.

महामारी से पहले भी खराब थे हालात

महामारी से पहले भी भारत में महिलाओं का लेबर फोर्स में हिस्सा घट रहा था. ILO के मुताबिक, साल 2010 में भारत की लेबर फोर्स में महिलाओं का हिस्सा 26 प्रतिशत था, जो 2019 में घटकर 21 प्रतिशत हो गया. वहीं, CMIE डेटा देने के लिए दूसरा तरीका इस्तेमाल करता है, उससे पता चलता है कि 2016 में महिलाओं का लेबर पार्टिसिपेशन रेट 16 फीसदी था, जो 2019 के आखिर में 11 परसेंट रह गया.

दोनों संस्थाएं मानती हैं कि महिलाओं के लेबर पार्टिसिपेशन रेट में आई कमी के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं. सरकार की आर्थिक नीतियों ने भी  इस संकट को और गहरा किया है. इनमें 2016 के आखिर में उठाया गया नोटबंदी का कदम प्रमुख रूप से शामिल है. इसने फैसले ने भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ औपचारिक अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों पर भी बहुत बुरा असर डाला है.

कोविड महमारी से पहले भी भारत में महिलाओं का लेबर पार्टिसिपेशन रेट घट रहा था.
कोविड महमारी से पहले भी भारत में महिलाओं का लेबर पार्टिसिपेशन रेट घट रहा था.

दूसरी तरफ कुछ ढांचागत बदलाव भी महिला रोजगार में आई कमी के लिए जिम्मेदार हैं. मसलन, खेती में बहुत तेजी से हुए मेकेनाइजेशन और कुटीर उद्योगों का पतन. इन दोनों जगहों पर महिलाओं की ठीक-ठाक भागीदारी थी.

लेबर फोर्स में महिलाओं का पार्टिसिपेशन घटने से भारत की कुल लेबर फोर्स भी जस की तस बनी हुई है. CMIE के अनुसार, साल 2016 में भारत की कुल वर्क फोर्स 42 करोड़ थी, जो अब 40 करोड़ है. जबकि इसे इस समय 60 करोड़ होना था. संस्था का ये भी मानना है कि ये ट्रेंड फिलहाल बदलने वाला नहीं है. इसके पीछे महामारी के दौरान कॉरपोरेट को टैक्स में छूट देने और लोन पर कम ब्याज लगाने जैसे कदमों बड़ी वजह बताया गया है. जानकारों का कहना है कि इनका उद्देश्य निवेश बढ़ना था, लेकिन कॉरपोरेट ने इन कदमों को प्रयोग अपना प्रॉफिट बढ़ाने के लिए किया. जबकि दूसरी ओर वे अपने कर्मचारियों की सैलरी और दूसरे फायदे कम करते गए. इसका परिणाम ये हुआ कि शेयर मार्केट में तो तेजी आई, लेकिन आम कर्मचारियों को कोई फायदा नहीं हुआ.

क्या किया जा सकता है?

इकॉनमिस्ट मैग्जीन कहती है कि अधिक महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए भारत सरकार को जरूरी कदम उठाने होंगे. जैसे वो फीमेल वर्कर्स की सप्लाई बढ़ा सकती है. इससे लेबर मार्केट में उनकी मांग बढ़ेगी. दूसरा ये कि भारत सरकार को केवल आईटी सेक्टर पर ही फोकस करना बंद होगा. उसे दूसरे सेक्टर में निवेश करने वाली कंपनियों को बुलाना होगा. जैसे टेक्सटाइल इंडस्ट्री, जो अब बांग्लादेश में शिफ्ट हो गई है. इस इंडस्ट्री में महिलाओं को अच्छा रोजगार मिलता है. सरकार इसके ऊपर फोकस कर सकती है.

पत्रिका ये भी कहती है कि ये सब करने के लिए सरकार को अपनी ‘सेक्सिस्ट’ यानी लैंगिकवादी सोच को छोड़ना पड़ेगा. भारत सरकार के खुद के कर्मचारियों में केवल 11 प्रतिशत महिलाएं हैं. इस जानकारी के बाद ड्यूक यूनिवर्सिटी में बीते दिनों हुए एक रिसर्च का जिक्र करना जरूरी है. इसमें पाया गया है कि जिन महिलाओं के पास रोजगार होता है और जिनका अपनी कमाई पर नियंत्रण होता है, वे अपने पति या दूसरे पुरुषों से उतनी ही अधिक बारगेनिंग कर पाती हैं. इससे उनकी व्यक्तिगत और सामाजिक आजादी में इजाफा होता है.

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