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मेट्रो स्टेशन का नाम बदल रहे थे, ट्रांसजेंडर लोगों ने आईना दिखा दिया

हाल में ही नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने घोषणा की थी कि सेक्टर 50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर्स के लिए डेडीकेट किया जाएगा. इस स्टेशन पर एडमिनिस्ट्रेशन और अन्य कामों के लिए ट्रांसजेंडर लोगों को हायर किया जाएगा. इसका नाम उन्होंने ‘शीमैन’ रखने की बात कही. इस पर काफी बवाल उठा. ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों ने शीमैन नाम का विरोध करते हुए कहा कि ये काफी अपमानजनक है. इसके बाद स्टेशन का नाम बदलकर रेनबो स्टेशन रखने की बात कही गई.

ये सुर्खियां हैं जो आपने शायद अख़बारों में या ऑनलाइन पढ़ी होंगी. नाम रखा गया, बदला गया. एक खबर है. लेकिन इसके बारे में ट्रांसजेंडर लोग क्या सोचते हैं. इससे परे सरकार की नीतियों के बारे में. कानून और रोजगार के बारे में. ये समझने के लिए ऑडनारी ने ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के कुछ लोगों से बात की. उन्होंने बताया कि इस नाम के साथ असल में दिक्कत क्या है. और इसके अलावा उनके बड़े मुद्दे कौन से हैं?

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पुरुष से महिला बने लोग ही ट्रांसजेंडर नहीं होते. महिलाओं से पुरुष भी बनते हैं लोग. इसमें कई लोग हॉर्मोन थेरेपी, या सर्जरी का भी सहारा लेते हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

ऑडनारी की बात हुई सात्विक, श्याम, जमाल, और रित्विक से. ये ट्रांसमेन कलेक्टिव नाम के ग्रुप के सदस्य है. सभी ट्रांसजेंडर पुरुष हैं. यानी जन्म के समय इन्हें फीमेल जेंडर असाइन किया गया था. लेकिन अब ये पुरुष हैं.

श्याम खुद को ट्रांस मैस्कुलिन पर्सन के रूप में आइडेंटिफाई करते हैं. LGBTQIA समुदाय के लिए चलाए जाने वाले प्रोग्राम्स का हिस्सा रह चुके हैं. उन्होंने कहा,

‘इस तरह के काम करके सत्ता में बैठे लोग अपने इरादे खुद ही ज़ाहिर कर देते हैं. वो कहते हैं हम इतना काम कर रहे हैं ट्रांसजेंडर्स के लिए. उनके लिए बिल ला रहे हैं. फिर भी उन्हें इतनी सी बात समझ नहीं आती कि शीमैन कितना अपमानजनक शब्द है? रिप्रेजेंटेशन सही से नहीं कर सकते तो कम से कम मज़ाक तो मत उड़ाइए.’

श्याम ने बताया कि 2014 के बाद फॉर्म्स इत्यादि में मेल-फीमेल के साथ ट्रांसजेंडर कॉलम पॉपुलर तो हुआ, लेकिन उसके साथ थोड़ी भी सेंसिटिविटी नहीं बरती गई. जो ट्रांसजेंडर बिल पास होकर एक्ट बना, उसमें भी संवेदनशीलता की बेहद कमी है. श्याम ने कहा,

‘हम कॉमिक नहीं हैं न. इसी देश के नागरिक हैं.’

सात्विक ट्रांसमेन कलेक्टिव ग्रुप के कोफाउंडर हैं. MBA की पढ़ाई की है और गांधी फेलोशिप में फेलो रह चुके हैं. फिलहाल अपनी सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी के लिए पैसे इकठ्ठा कर रहे हैं. इन्होंने बताया,

‘जो भी कानून या नियम इत्यादि बनाए गए हैं, वो ऐसे हैं मानो ऊपर से फूल ही फूल दिख रहे हों. लेकिन भीतर कितने कांटे हैं ये किसी को पता नहीं चलता.’

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि किसी भी व्यक्ति को अपने जेंडर को लेकर सेल्फ आइडेंटिफिकेशन यानी खुद से अपना जेंडर चुनने की स्वतंत्रता है. लेकिन 2020 में पास हुआ ट्रांसजेंडर बिल इस बात के खिलाफ जाता है. इस कानून के मुताबिक़ किसी भी ट्रांसजेंडर पर्सन को अपनी ट्रांस आइडेंटिटी प्रमाणित करने के लिए अपने डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट से सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य कर दिया गया है.

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कानून में ये तो कहा गया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव करना अपराध की श्रेणी में आएगा. लेकिन ट्रांसजेंडर के रूप में अपने आप को परिभाषित करने का हक़ लोगों से वापस ले लिया गया ऐसा एक्टिविस्ट्स का मानना है. (सांकेतिक तस्वीर)

सात्विक ने कहा कि सरकारी ऑफिसेज में इंसान कैसे डील करेगा? अगर मेरी फीमेल आइडेंटिटी पर मैं कोई जॉब लूं, या फिर कोई फॉर्म भरूं, और बाद में मुझे सर्टिफिकेट लेकर चेंज कराना हो उसे, तो इन सबसे कैसे डील किया जाएगा?

जमाल राइटर हैं. एक्टिविस्ट हैं. इन्होंने बताया कि कुछ समय के लिए उन्होंने दिल्ली के एक NGO में काम किया था. और ये कि रोजगार को लेकर ट्रांसजेंडर लोगों के प्रति आम रवैया बहुत प्रॉब्लम से भरा है. केरल में भी इस तरह की मेट्रो शुरू की गई थी जहां ट्रांस लोगों को काम देने की बात कही गई थी. जमाल ने बताया,

‘जहां मेट्रो शुरू की गई थी, वहां ट्रांस लोगों रहने की जगह तक नहीं मिल रही थी. और भी कई दिक्कतें आ रही थीं. ट्रांस लोगों के नौकरी के मौके वैसे भी कम होते हैं. और जब नौकरियां आती भी हैं, उसमें एक बड़ी दिक्कत है. लोग हायर तो कर लेते हैं, लेकिन उसके बाद उन्हें पता नहीं नहीं होता कि किस तरह की संवेदनशीलता बरतनी है. या किन चीज़ों का ध्यान रखना है. दिल्ली में जहां मैंने जॉब जॉइन की थी वहां उनकी पॉलिसी और माहौल ठीक नहीं था. NGO के CEO  ने मेरी सहमति के बिना मेरी ट्रांस आइडेंटिटी सबको बता दी थी. वो माहौल मेरे लिए बेहद होस्टाइल हो गया था. तो मैंने वो जॉब छोड़ दिया.’

रित्विक इंजीनियर हैं. कविताएं लिखते हैं. एक्टिविस्ट भी हैं. ट्रांसमेन कलेक्टिव का हिस्सा हैं. उन्होंने बताया,

‘ऐसी चीज़ों की वजह से हम और पीछे धकेल दिए जाते हैं. जो असल आइडियाज़ हैं ट्रांस लोगों को एम्पावर करने के, उन्हें ताकत और हौसला देने के, वो छुप जाते हैं. और कई छोटी-छोटी बातें हैं, जो एक साथ रखिए तो बड़ा मुद्दा बन जाती हैं.’

रित्विक ने ये भी कहा कि टोकनिज्म के नाम पर ट्रांस लोगों को एम्पावर करने का आईडिया उन्हें साथ लेकर चलने के असल आइडिया का महत्त्व कम कर देता है. बल्कि ये उनके संघर्षों को चुनौती भी देता है. पूरे ट्रांस समुदाय के लिए ये एक दूसरा ही मतलब प्रेषित करता है.

श्याम और सात्विक ने बताया कि सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी और उसको लेकर दी जाने वाली मदद में काफी दिक्कत है. सर्जरी के अलावा ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लोगों को रेगुलर हेल्थ को लेकर भी काफी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. डॉक्टर्स में भी सेंसिटिविटी बहुत कम देखने को मिलती है. कोरोना महामारी के दौरान भी ट्रांसजेंडर लोगों को डॉक्टर्स को अप्रोच करने में ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ा. उनकी एग्जामिनेशन भी बेहद अपमानजनक तरीके से की जाती है.

श्याम ने ये भी बताया कि एक्ट पास करने की जल्दी में कई चीज़ें निगलेक्ट की गई हैं. कानून में कई जगह ऐसे ढीले-ढाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जिनका आसानी से फायदा उठाया जा सकता है. ट्रांसजेंडर लोगों से जो सजेशन मंगवाए गए थे, उनका कुछ अता-पता नहीं. हर राज्य में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए एक स्टेट बोर्ड बनाने की बात कही गई है. लेकिन उसमें ट्रांसजेंडर लोग कितने होंगे, होंगे भी या नहीं, ये नहीं पता.

हालांकि सब कुछ अंधियारा ही नहीं है. श्याम ने ये भी बताया कि वो कई कंपनियों के साथ कोलैबोरेट कर चुके हैं, HR पॉलिसीज़ पर बात करने के लिए, उनमें बदलाव लाने के लिए. लोगों को साथ इकठ्ठा करने की ज़रूरत है ताकि इस मुद्दे पर बहस चलती रहे. लोग अवेयर होते रहें.


वीडियो: इधर राज्यसभा में ट्रांसजेंडर बिल पास हो रहा था उधर संबित पात्रा ‘हिजड़े’ शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल कर रहे थे

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