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डियर तीरथ रावत जी, औरतें बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हैं

तीरथ सिंह रावत. हमें यकीन है कि ये नाम आपने कई बार सुन लिया होगा. उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री हैं. बोलते हुए ज्यादा ही इधर-उधर निकल जाते हैं. मतलब बेतुकी और महिला विरोधी बातें करने लगते हैं. रिप्ड जींस का बवाल तो आपको पता ही होगा. उसके बाद उन्होंने लड़कियों के कपड़ों पर कमेंट करते हुए कहा कि वो यूनिवर्सिटी अपना बदन दिखाने जाती हैं. अब एक बार फिर से उन्होंने अपमानजनक बात की है.

अब क्या बवाल कर दिया रावत ने?

अब तीरथ सिंह रावत ने जो कहा है वो अपमानजनक से ज्यादा महज़ मूर्खतापूर्ण लगता है. लेकिन गंभीरता से सोचने पर ये एक अकेला वाक्य किसी भी औरत को डर से भर सकता है. दरअसल, तीरथ सिंह रावत 21 मार्च को रामनगर में एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. बातें चल रही थीं कि कोविड-19 महामारी के दौरान कम बच्चों वाले गरीब परिवारों को कम सरकारी राशन मिला. इसके जवाब में रावत ने कहा कि अगर गरीब परिवारों को ज्यादा राशन चाहिए, तो उन्हें ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहिए थे. रावत ने गरीब परिवारों को 20-20 बच्चे पैदा करने की नसीहत तक दे डाली. उन्होंने क्या कहा, पढ़िए,

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबका ख्याल रखा. गरीबों को राशन दिया. जिसके दो बच्चे थे, उसको 10 किलो मिला. जिसके 20 बच्चे थे, उसको एक क्विंटल मिला. लोगों ने गोदाम खोल लिए. खरीददार तय कर लिए. 2 बच्चों वाला 20 बच्चों वाले से जलने लगा कि उसे तो 100 किलो अनाज मिल गया. लेकिन उसे जलना नहीं चाहिए था. अगर इतना अनाज चाहिए थे पहले 20 बच्चे पैदा करने थे.”

हर बार की तरह रावत ने समस्या का बहुत ही ‘साधारण’ सा समाधान खोजा है. जैसे महिलाओं को अपने खिलाफ होने वाली यौन हिंसा से छुटकारा कथित संस्कारी कपड़े पहनकर मिल सकता है… ठीक उसी तरह गरीबों को कम राशन मिलने की समस्या का समाधान ज्यादा बच्चे पैदा करने से हो जाएगा. तीरथ सिंह रावत का यह बयान कई स्तरों पर कुतर्क से भरा हुआ है. आप खुद सोचें. महिलाओं की शादी करने की लीगल उम्र 18 साल है. अगर वो 19 की उम्र में भी बच्चा करती है. और हर बच्चे के बाद गैप रखती है. तो क्या वो 60 साल की उम्र तक बच्चा ही पैदा करती रहेगी?

उत्तराखंड के रामनगर में सभा को संबोधित करते Tirath Singh Rawat
उत्तराखंड के रामनगर में सभा को संबोधित करते Tirath Singh Rawat

ऐसा ही हमने भी सोचा और पाया कि कहां हम लॉजिक के चक्कर में पड़ रहे. 20 तो बस एक संख्या है. मुख्यमंत्री जी के कहने का अर्थ तो बस इतना रहा होगा कि ज्यादा बच्चे करो. तो ज्यादा बेनिफिट मिलेगा. मगर क्या सचमुच ज्यादा बच्चे पैदा करने से ज्यादा बेनिफिट मिलेगा? खासकर तब, जब पहले ही भारी जनसंख्या के बोझ से देश का एक बड़ा तबका दबा हुआ है.

गरीबों का मजाक उड़ाता बयान!

यह बयान उन गरीबों का भी मजाक उड़ा रहा है, जिनका गुनाह बस इतना है कि वे जब पैदा हुए तो सीधे गरीबी के दलदल में फंस गए. अपना गांव-कस्बा छोड़कर किसी बड़े शहर में वो नौकरी करने आए, जो रोज उनके इंसान होने का ही मजाक उड़ाती है. जहां रोज उन्हें 14-14 घंटे खटना पड़ता है. और फिर भी मेहनताना इतना कम मिलता है कि तरह-तरह की बीमारियों से जूझते अपने शरीर का वे इलाज भी नहीं करा पाते.

अगर सरकार ने पिछले साल बिना किसी योजना के अचानक से लॉकडाउन लगा दिया, जिससे करोड़ों गरीबों की नौकरी चली गई. वे हजारों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर हो गए, तो क्या सरकार ने प्रति व्यक्ति पांच किलो राशन देकर उनके ऊपर कोई एहसान कर दिया? भूख से जूझ रहे गरीब परिवारों को जलन होने लगी कि दूसरे परिवार को ज्यादा राशन मिल रहा है, क्योंकि वहां बच्चे ज्यादा हैं? या फिर उन्होंने राशन इकट्ठा करके दुकानदारों को बेच दिया? एक संवेदनशील इंसान इस सवालों के जवाब न में पाएगा. लेकिन उत्तराखंड के नए नवेले मुख्यमंत्री इससे बिल्कुल उल्टा सोचते हैं.

इस पूरे मुद्दे को लेकर हमारे सामने कुछ और सवाल भी खड़े हुए. जिनके बारे में अपनी बात कहने के पहले CM साहब ने जरा भी नहीं सोचा था. मसलन, अगर पॉपुलेशन बहुत तेजी से बढ़ जाए तो बच्चों के आहार पर क्या असर पड़ेगा? देश में फिलहाल बच्चों को किस तरह का पोषण मिल रहा है? सरकारी राशन बांटने वाला सिस्टम मतलब PDS कितना एफ़ीशिएंट है?

आंकड़ों की अगर बात करें तो देश में बच्चों के बीच कुपोषण बढ़ रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में देश में पांच साल से कम उम्र के 8 लाख बच्चे मर गए. रिपोर्ट में कहा गया कि आने वाले सालों में यह आंकड़ा और भी खराब हो सकता है. रिपोर्ट में बताया गया कि इस मामले में पाकिस्तान, कॉन्गो और इथियोपिया जैसे देशों ने भी भारत से बेहतर प्रदर्शन किया. ग्लोबल हंगर इंडेक्स की साल 2020 की रिपोर्ट में भूखमरी के मामले में भारत को 107 देशों में 94वें नंबर पर रखा गया है. इस लिस्ट के मुताबिक भूखमरी के मामले में दक्षिण एशियाई देशों में भारत केवल अफगानिस्तान से ही आगे है.

वहीं भारत सरकार द्वारा किए गए पांचवे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में पता चला कि पिछले पांच सालों में देश के कई हिस्सों में पिछली पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा कुपोषित बच्चे पैदा हुए हैं. सर्वे में पाया गया कि देशभर बच्चों की स्टंटिंग में पिछले पांच साल में कोई सुधार नहीं हुआ. स्टंटिंग का मतलब उम्र के अनुपात में कम लंबाई का होना है. इसी तरह सर्वे में यह भी पाया गया कि भारत के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बच्चों में पेट का मोटापा बढ़ा है.

पिछले साल अचानक से लगे लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाने को मजबूर हो गए थे.
पिछले साल अचानक से लगे लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाने को मजबूर हो गए थे.

आमतौर पर माना जाता है कि मोटा होना खाते-पीते परिवार से होना होता है. लेकिन मेडिकल भाषा में बच्चों के बाहर निकले पेट को कुपोषण का परिणाम कहा जाता है. इसी तरह कम वजन वाले बच्चों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. इस सर्वे में 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया गया. एक- दो राज्यों को छोड़कर लगभग हर जगह कुपोषण की हालत या तो खराब हुई या फिर उसमें कोई सुधार नहीं हुआ.

कितने बच्चे पैदा करना सेफ है?

अब आते हैं महिलाओं के स्वास्थ्य पर. अगर तीरथ सिंह रावत यह सोचते हैं कि 20 बच्चे पैदा किए जा सकते हैं, तो क्या एक महिला के लिए ऐसा करना संभव है? एक महिला के लिए कितने बच्चों को जन्म देना सुरक्षित है? इंडिया जैसे देश में, खून की कमी और कुपोषण से जूझ रहीं महिलाओं के लिए 20 तो छोड़ दीजिए, क्या दो बच्चों को भी जन्म देना सेफ है? इन सवालों के जवाब के लिए हमने डॉक्टर दिव्या माला से बात की. उन्होंने कहा-

“दो बच्चे पैदा करना ज्यादा सेफ है. दो बच्चे मां और बच्चों की सेहत के नजरिए से तो ठीक हैं ही, साथ ही देश के विकास के लिए भी ठीक हैं. गरीब औरतें भी मेरे पास आती हैं. ज्यादातर खून की कमी और कुपोषण से जूझ रही होती हैं. उनके लिए डिलीवरी करना इतना आसान नहीं होता. क्योंकि डिलीवरी में बच्चे को खून चाहिए होता है. इससे उन औरतों में खून की और कमी हो जाती है. दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर पोस्टपार्टम हैमरेज का खतरा भी बढ़ता जाता है. पोस्टपार्टम हैमरेज का मतलब डिलीवरी के दौरान अत्यधिक खून बहना है. ऐसे में दो ही बच्चे ठीक हैं.”

ऊपर जैसे हमने आपको बच्चों से जुड़े कुपोषण के कुछ आंकड़े बताए. वैसे ही आपको खून की कमी और कुपोषण से जूझ रही महिलाओं के बारे में भी बता देते हैं. इसके लिए भी हमने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पांचवे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे का रुख किया. सर्वे में पता चला कि भारत के आधे से ज्यादा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में आधे से अधिक महिलाएं खून की कमी यानी एनीमिया से पीड़ित हैं. पूरे देश की अगर बात करें तो लगभग 40 फीसदी महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं. खून की कमी से जूझ रहे पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अनुपात 30 फीसदी अधिक है. लगभग ऐसे ही आंकड़े भारतीय महिलाओं के कुपोषण को लेकर भी है.

लब्बोलुआब यही है कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे होने के नाते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को थोड़ा सोच विचारकर बोलना चाहिए. माना कि पिछले कुछ समय से यह प्रैक्टिस गायब होती जा रही है. खासकर, ऊंचे पदों पर बैठे लोग बेतुके बयान दे रहे हैं. कभी हमारी वित्त मंत्री कहती हैं कि प्याज महंगा होने पर उन्हें इसलिए असर नहीं पड़ता क्योंकि वे प्याज खाती ही नहीं. कभी हमारे पेट्रोलियम मंत्री कहते हैं कि सर्दी की वजह से पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं. लेकिन तीरथ सिंह रावत को कोशिश करनी चाहिए कि वे ऐसे बयान ना दें. इतिहास उन्हें याद रखता है जो लीक से हटकर चलते हैं. क्या हो कि एक दिन हम जागें और तीरथ सिंह रावत का कोई तर्कसंगत बयान सुनने को मिल जाए. सोचिए, हमें कितना अच्छा लगेगा. उस दिन कुछ मुहावरे बदल देने का ख्याल मन में आएगा. जैसे सूरज पश्चिम से उग आया या गंगा उल्टा बहने लगी जैसे मुहावरों को बदलकर हम यह कह सकते हैं कि आज तीरथ सिंह रावत ने ढंग का बयान दिया.

खैर, ये तो हो गई मजाक की बात. लेकिन ऊपर जिन एक्सपर्ट्स को आपने सुना और जो आंकड़े आपके सामने पेश किए गए, वो ये तो जरूर बताते हैं कि 20 बच्चे पैदा करना कोई खेल नहीं है. ना तो बच्चों और मां के पोषण और स्वास्थ्य की दृष्टि से और ना ही राशन वितरण प्रणाली के ढंग से काम करने के नजरिए से. अगर गरीब परिवारों को को ठीक-ठाक राशन नहीं मिल पा रहा है, तो सरकारों को इसका बेहतर हल निकालना होगा. हमने उन्हें इसी काम के लिए सत्ता में बिठाया है. वे मानवीय और संवेदनशील तरीके से काम करें. ना कि मुख्यमंत्री लोग उल्टे सीधे बयान देते फिरें और देश-दुनिया में हंसी के पात्र बन जाएं.

और अगर ये स्टोरी उन तक पहुंच रही है, तो ये ज़रूर जान लें कि महिलाएं न ही किसी संस्कृति का लबादा ओढ़े घटिया पुरुषवादी सोच को आगे बढ़ाने का प्रोजेक्ट हैं. न ही बच्चे पैदा करने की कोई मशीन.

वीडियो- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने औरतों के लिए क्या घटिया बात कह दी?

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