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ज़रूरत से ज्यादा सोचना क्या कोई मानसिक बीमारी है?

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

वरुण 32 साल के हैं. दिल्ली के रहने वाले हैं. उन्होंने हमें मेल किया. उन्होंने जो अपनी दिक्कत बताई हैं, ये अकेले उनकी नहीं है. मेरी भी है, मेरे सारे दोस्तों की भी है और लाखों, करोड़ों लोगों की है. क्या? ओवरथिंकिंग यानी ज़रूरत से ज़्यादा सोचना. वरुण बताते हैं कि वो अपनी इस आदत से परेशान हो चुके हैं. कई सालों से वो ऐसे ही हैं. बहुत सोचते हैं. इतना ज़्यादा कि उनकी निजी ज़िंदगी पर असर पड़ने लगा है. उनके दिमाग में कोई ख़याल आता है तो उसे लेकर वो बहुत स्ट्रेस लेते हैं, घंटों और दिनों तक उसके बारे में सोचते रहते हैं. इस वजह से उनकी मेंटल हेल्थ पर असर पड़ने लगा है. कई बार तो प्रॉब्लम इतनी बड़ी होती भी नहीं है, जितना वो सोचते हैं. कुलमिलाकर इतना स्ट्रेस लेने से उनका बीपी ज़रूर हाई रहने लगा है.

वरुण का पहला सवाल है कि ओवरथिंकिंग कहीं कोई मानसिक डिसऑर्डर तो नहीं? ये सवाल हमने पूछा एक्सपर्ट्स से. सुनिए उन्होंने क्या बताया. साथ ही ये भी जानते हैं कि ज़रुरत से ज़्यादा सोचने की इस दिक्कत से कैसे निपटा जाए.

क्या ज़रूरत से ज़्यादा सोचना कोई मानसिक डिसऑर्डर है?

इसके बारे में हमें बताया कंसलटेंट क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट राकिब अली ने.

रकिब अली, कंसलटेंट क्लिनिकल साइकॉलजस्ट, बीएलके हॉस्पिटल, नई दिल्ली
राकिब अली, कंसलटेंट क्लिनिकल साइकॉलजस्ट, बीएलके हॉस्पिटल, नई दिल्ली

अमूमन लोग यह शिकायत करते हैं कि वह बहुत ज्यादा सोचते हैं या उनका दिमाग लगातार चलता रहता है. सबसे पहले तो यह जान लेते हैं कि हमारा मस्तिष्क एक थिंकिंग मशीन होता है जिसका काम ही है सोचना और सोच को प्रोड्यूस करना. ज्यादा बड़ी प्रॉब्लम तब है जब यह काम बंद हो जाए. कोई भी नहीं चाहेगा कि उसके दिमाग में कोई ऐसा नुकसान पहुंचे कि वह काम करना बंद कर दें. साइकोलॉजी में एक कहावत है कि ब्रेन हैज इट्स माइंड ऑफ इट्स ओन ( मस्तिष्क का अपना खुद का दिमाग होता है ) या थॉट थिंक दमसेल्व्स यानी विचार अपने आपको खुद विचारते हैं. जनरली विचार आने में कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन जब हम यह देखते हैं कि हम बहुत ज्यादा सोच रहे हैं या विचार कर रहे हैं और इसकी वजह से हमें स्ट्रेस हो रहा है, हमें चिड़चिड़ापन हो रहा है, उदासीनता हो रही है तो इसका मतलब है कि यह ज्यादा हो रहा है.

यह तो नहीं कह सकते यह कोई मानसिक समस्या है लेकिन इतना जरूर है कि ये कई अन्य शारीरिक और मानसिक समस्याओं के लिए रिस्क फैक्टर है, इसे क्लीनिकली चिंता भी कहते हैं. चिंता में भी ओवर थिंकिंग होती है तो यह आपस में एक्सचेंजेबल है लेकिन यह नहीं कह सकते कि यह अपने आप में कोई मेडिकल डिसऑर्डर है.

कुछ लोग क्यों करते हैं ओवरथिंक?

अब सवाल उठता है कि क्या कुछ लोगों को ओवरथिंकिंग करने की समस्या ज्यादा होती है. तो इसका जवाब है कि कई लोगों को जेनेटिक रीजन से तो, कुछ को प्री साइकोलॉजिकल कंडीशन की वजह से ओवरथिंक करने की आदत या टेंडेंसी होती है. वहीं कई बार लाइफ में ऐसी सिचुएशन भी आ सकती है कि आपका सोचने का प्रोसीजर बाकी लोगों से ज्यादा हो जाता है. जैसे फाइनेंनशियल सिचुएशन आ जाना या फिर घर में कोई प्रॉब्लम आ जाना , कोई आपदा से घिर जाना या ऑफिस में कोई दिक्कत होना. इन सब बातों की वजह से कई बार ओवरथिंकिंग होने लग जाती है.

Seven Strategies To Stop Overthinking - Talking Therapy
यह आपकी मानसिक समस्याओं को भी बढ़ा सकता है जैसे एंजायटी डिसऑर्डर

ओवरथिंकिंग से किस तरह का मानसिक और शरिरिक असर पड़ता है?

इसकी वजह से शारीरिक समस्याएं जैसे कि हाइपरटेंशन, डाइजेस्टिव प्रॉब्लम या फिर आपके रीप्रोडक्टिव सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है. अगर ओवरथिंकिंग ज्यादा लंबे समय तक हो जाती है क्योंकि हमारा मस्तिष्क रियलिटी और इमेजिनेशन में डिफरेंस नहीं करता है. जैसे मान लीजिए अगर आप सोचने लग जाते हैं कि बॉस ने आपको सबके सामने क्यों डांट दिया और हो सकता है आप इस पर ज्यादा सोचें कि बॉस ने मुझे ही क्यों डाटा सबके सामने ? ऐसा मैंने क्या कर दिया था या फिर अगली बार अगर करेंगे तो मैं ऐसा कर दूंगा.

ओवरथिंकिंग या इमैजिनेशन जो होती है वह कई बार बॉडी में अलार्म रिएक्शन को जन्म दे सकती है. अलार्म रिएक्शन जब होता है तब आपका हार्ट रेट, आपकी ब्रीदिंग सब तेज हो जाती है और आप फाइट या फ्लाइट अप्लाई करने की सिचुएशन में आ जाते हैं. अगर यह लंबे समय तक होता है तो आपको कोई भी शारीरिक समस्या आ सकती है. इसके अलावा यह आपकी मानसिक समस्याओं को भी बढ़ा सकता है जैसे एंजायटी डिसऑर्डर. किसी भी बात पर चिंता करने की जो आदत होती है वह बढ़ सकती है, या फिर आपको डिप्रेसिव सिंड्रोम बन सकता है और इसकी वजह से ज्यादा गंभीर मानसिक समस्याएं बन सकती हैं.

DOES OVERTHINKING INTERFERES WITH YOUR SLEEP? - NiTe 1G
शारीरिक समस्याएं जैसे कि हाइपरटेंशन, डाइजेस्टिव प्रॉब्लम या फिर आपके रीप्रोडक्टिव सिस्टम पर भी असर पड़ सकता है

ये सेकेंडरी लेवल पर आपकी सोशल समस्याओं को भी बढ़ा सकता है जैसे अगर आप बहुत ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं तो बाकी लोग ऐसा भी सोच सकते हैं कि अगर आप से ना ही बात करें तभी बेहतर है. मान लीजिए आपके बॉस ने आपको डांट दिया और आप उस पर ओवरथिंक करते रहे और इसके बाद में ओवरथिंकिंग की वजह से आपकी परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है तो आपके नेगेटिव थॉट्स और ज्यादा बढ़ जाएंगे यानि यह शारीरिक मानसिक और सोशल समस्याएं बढ़ा सकता है.

ज़्यादा सोचने की दिक्कत से कैसे निपटें?

जब आपको पता चल जाता है कि आप ओवरथिंकिंग करते हैं तो आप धीरे-धीरे से ऑब्जर्व करने लग जाते हैं कि अब आपकी सोच बहुत लंबी जा रही है ऐसे में आप अपनी सोच को रोक सकते हैं कि हमें इतना नहीं सोचना है. इसके लिए सबसे पहला काम हम करेंगे कि आप अपने सेंसस को डेवेलप कर खुद को ऑब्जर्व करें कि आप कब-कब कैसे-कैसे ओवरथिंक करने लग जाते हैं.

जब आप इस बात को ऑब्जर्व करते हैं तो माइंडफुल थिंकिंग के द्वारा ओवरथिंकिंग को रोक सकते हैं.  जैसे कि आप यह ऑब्जर्व करें कि अब आपके सामने क्या बन रहा है. जैसे मान लीजिए कि मैं इस वक्त कहां पर बैठी हूं, मुझे ओवरथिंकिंग होती है तो फिर मैं अपने आपको डायवर्ट करने की कोशिश करूंगी, मैं देखूंगी कोई पेंटिंग है, कोई पंखा है या कोई डिजाइन बन रहा है तो मैं उसके बारे में सोच लूंगी कि क्या बन रहा है, कैसे बनाएं अपने आपको जानबूझकर डाइवर्ट करूंगी.

Toxic Habits: Overthinking - Scientific American
ओवरथिंकिंग या इमैजिनेशन जो होती है वह कई बार बॉडी में अलार्म रिएक्शन को जन्म दे सकती है

इसमें हम अपने आप को ना फ्यूचर में जाने देते हैं ना पास्ट में जाने देते हैं बल्कि अपने आप को प्रेजेंट में रखने की कोशिश करते हैं. इससे बचने के लिए मतलब इस तरह के एक्सरसाइज में आपको पेशेंस और प्रैक्टिस बहुत ज्यादा जरूरी होता है और ऐसा करने से हम इसको बहुत हद तक कम कर सकते हैं हमको रेगुलर बेसिस पर एक्सरसाइज करनी होगी.

इसके अलावा हम पूरे दिन में तीन से चार बार ब्रीथिंग एक्सरसाइज करके भी अपने थॉट को और थिंकिंग को रोक सकते हैं, ब्रीदिंग एक्सरसाइज करते वक्त जिस प्रकार के थॉट आते हैं तो उन्हें रोके नहीं बल्कि उनको उनको आने दे और जाने दे. अगर आप रोकने की दबाने की कोशिश करते हैं तो फिर वह आपको और ज्यादा परेशान करते हैं, जबकि आप रीडिंग एक्सरसाइज कर रहे हो तब इस तरह से आप अपने थॉट से डील करने की कोशिश करेंगे.

भई मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स ने जो टिप्स बताई हैं, वो मैनें तो नोट डाउन कर ली हैं. आप भी कर लीजिए और उनके आजमाइए. बहुत मदद मिलेगी. अगर आपको लगता है आपको मेंटल हेल्प की ज़रुरत है तो चुप मत रहिए. इसके बारे में बात करिए. डॉक्टर से ज़रूर मिलिए. मदद लीजिए. अपनी मेंटल हेल्थ को इग्नोर मत करिए.


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