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रेप के ऐसे मामले, जिनमें कोर्ट ने पीड़िता के ऊपर ही असंवेदनशील टिप्पणी कर दी!

तहलका पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को बलात्कार और यौन शोषण के मामले में बरी किया जा चुका है. तरुण के खिलाफ उनकी ही जूनियर सहकर्मी ने आरोप लगाए थे. गोवा की एक अदालत में इस मामले की काफी लंबे समय से सुनवाई चल रही थी. 21 मई को इस मामले में अदालत की तरफ से 527 पन्नों का जजमेंट जारी किया गया. जजमेंट में पीड़िता के सच्चे होने पर सवाल उठाए गए और संदेह के आधार पर आरोपी को बरी करने की बात कही गई.

जज क्षमा जोशी ने लिखा-

“यह ध्यान देने वाली बात है पीड़िता के बर्ताव में ऐसा कुछ नहीं दिखा कि जिससे लगे कि वो यौन शोषण की पीड़िता है.”

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में अदालत ने यह भी खारिज कर दिया कि पीड़िता सदमे में थी. सीसीटीवी फुटेज से मिली तस्वीरों को आधार बनाकर अदालत ने कहा कि कथित यौन शोषण के बाद की इन तस्वीरों में पीड़िता पूरी तरह से अच्छे मूड में दिख रही है. वो मुस्कुरा रही है और एकदम सामान्य है.

यह पहली बार नहीं है कि बलात्कार (Rape) और यौन शोषण से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए या फैसला सुनाते हुए भारतीय अदालतों ने पीड़िता को लेकर इस तरह की टिप्पणी की हो. भारतीय अदालतें ऐसा बहुत बार कर चुकी हैं. कभी पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाया तो कभी उसके व्यवहार पर.

फैसले सुनाते हुए एक से एक ऐसी टिप्पणियां कीं, जो पितृसत्तातत्म सोच से ग्रसित रहीं. बलात्कार पीड़िताओं को ऐसे पेश किया, जैसे वे कोई लाचार और हीन इंसान हों और उनकी सारी इज्जत उनके शरीर में निहित हो. गोया बलात्कार, पीड़िताओं से उनके शरीर पर उनके अपने नियंत्रण के अधिकार का उल्लंघन करने का नहीं, बल्कि उनकी ‘इज्जत’ और ‘पवित्रता’ को रौंदने वाला जघन्य अपराध है. इस आलेख में कुछ ऐसे ही फैसलों और टिप्पणियों के बारे में बात करेंगे.

अगड़ी जाति वाले पिछड़ी जाति की औरत का रेप कैसे कर सकते हैं!

इस तरह का सबसे पहला जो मामला जहन में आता है, वो है भंवरी देवी का. साल 1992 में सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी ने राजस्थान के एक गांव के प्रधान और अगड़ी जाति से आने वाले कुछ लोगों के खिलाफ बलात्कार के आरोप लगाए थे. भंवरी देवी पिछड़ी जाति से वास्ता रखती थीं और समाज में अलग-अलग मुद्दों पर जागरुकता फैला रही थीं.

इस मामले में पहले पहल राजस्थान हाई कोर्ट ने 1993 में आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया. लेकिन इसके बाद यह आदेश देने वाले जस्टिस एनएम तिबरेवाल को सुनवाई से हटा दिया गया. एक के बाद एक कुल पांच जज बदले गए. फिर 1995 में आरोपियों की बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया गया. बरी करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की-

-गांव का प्रधान बलात्कार नहीं कर सकता.

– 60 से 70 साल के बुजुर्ग बलात्कार नहीं कर सकते.

– अगड़ी जाति का कोई पुरुष पिछड़ी जाति की किसी महिला का बलात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वह ‘अशुद्ध’ होती है.

– अलग-अलग जाति के पुरुष गैंर रेप में शामिल नहीं हो सकते.

– एक पुरुष अपने किसी रिश्तेदार के सामने रेप नहीं कर सकता.

– भंवरी देवी के पति चुपचाप खामोशी से अपनी पत्नी का बलात्कार होते हुए नहीं देख सकते.

पीड़िता परेशान नहीं, तो रेप नहीं हुआ?

बार एंड बेंच के मुताबिक साल 1977 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने एक फैसला दिया था. इस फैसले में पांच महीने की गर्भवती महिला के गैंगरेप के तीन आरोपियों को बरी कर दिया गया. कोर्ट ने कहा कि 23 साल की पीड़िता अपने पति की ‘परस्त्री’ है. उसने ‘सेक्स’ के लिए सहमति दी होगी. उसके शरीर पर एक भी चोट नहीं आई है. वो सिर्फ रोई, चिल्लाई नहीं. इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला का गर्भपात तुरंत नहीं हुआ.

बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के खिलाफ प्रोटेस्ट (प्रतीकात्मक फोटो: PTI)
बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के खिलाफ प्रोटेस्ट (प्रतीकात्मक फोटो: PTI)

क्या किसी मर्डर विक्टिम को इस बात का दोष दिया जा सकता है कि उसने अपराधी को मर्डर करने के लिए उकसाया? अगर नहीं, तो क्या किसी रेप विक्टिम को अपराधी को रेप के लिए उकसाने का दोषी घोषित किया जा सकता है?

2019 के स्वामी चिन्मयानंद मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस राहुल चतुर्वेदी ने लिखा-

“यह तथ्य दिमाग चकरा देने वाला और चिंता का विषय है कि जिस पीड़िता स्टूडेंट ने चिन्मयानंद पर बलात्कार का आरोप लगाया है, वो 10 महीने तक चिन्मयानंद के साथ हंसती-खेलती रही. इस दौरान दोनों एक दूसरे के साथ निजी लम्हें भी साझा करते रहे. हालांकि, इसी दौरान पीड़िता ने एक जासूसी कैमरा खरीदा और इन निजी लम्हों को कैद कर लिया. बाद में इसका इस्तेमाल चिन्मयानंद को ब्लैकमेल करने के लिए किया गया.”

साल 2016 से राजा बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर नजर डालिए. कोर्ट ने इस मामले में कहा कि पीड़िता का व्यवहार, उस तरह का नहीं था जैसा किसी बलात्कार पीड़िता का होता है. वो घबराई हुई और गुस्से में नहीं थी. हाई कोर्ट ने आगे कहा-

“पीड़िता एक ऐसी महिला है, जिसे यौन संबंधों की आदत है. साथ ही साथ उसने यह भी माना है कि घटना के एक से डेढ़ साल पहले से वो अपने पति से अलग रह रही है. घटना के बाद तुरंत घर जाने की जगह पीड़िता वहीं बनी रही. उसके व्यवहार से ऐसा लगा ही नहीं कि उसके साथ रेप हुआ है. यही नहीं एक आरोपी बाद में पीड़िता के लिए डोसा और इडली भी लाया.”

इस टिप्पणी के बाद कोर्ट ने आरोपियों को बलात्कार के आरोपों से बरी कर दिया.

इसी तरह साल 2017 के राजेश बनाम राजस्थान स्टेट के मामले में राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि पीड़िता के शरीर पर कोई भी चोट नहीं पाई गई है. यह बताता है कि उसने यौन संबंधों के लिए सहमति दी होगी. उसके साथ रेप नहीं हुआ. साल 2020 के राकेश बी बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने सुनवाई की. कोर्ट ने रेप पीड़िता से कहा कि बलात्कार के बाद पीड़िताएं सो नहीं जाती हैं. चाहें भले की थक गई हों. रेप के बाद पीड़िताएं इस तरह से व्यवहार नहीं करतीं. बाद में कोर्ट ने यह टिप्पणी वापस ले ली.

साल 2017 में ही लॉ के तीन स्टूडेंट्स पर अपनी ही साथी स्टूडेंट को ब्लैकमेल करने और फिर लगातार उसका रेप करने के आरोप लगे थे. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि यह ‘दुर्घटना’ पीड़िता के उस व्यवहार के कारण हुई, जिससे यह तस्वीर बनी कि पीड़िता के अनेक लड़कों के साथ संबंध हैं. दरअसल, पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा था कि एक आरोपी ने पहले उसे अपनी नग्न तस्वीरें भेजी थीं और फिर उसे अपनी भी वैसी ही तस्वीरें भेजने के लिए राजी कर लिया था.

पीड़िताएं सेक्स के लिए उकसाती हैं!

साल 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फैसला सुनाया था. यह लेखक और दास्तानगोई करने वाले कलाकार महमूद फारूकी से जुड़ा था. फारूकी को साल 2015 में एक ट्रायल कोर्ट ने बलात्कार का दोषी पाया था. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने फारूकी को बरी कर दिया. यह कहते हुए कि इस बात में पर्याप्त संदेह है कि कोई रेप हुआ. कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने पर्याप्त तरीके से विरोध नहीं किया. कोर्ट ने यह भी कहा कि  फारूकी और पीड़िता बुद्धिजीवी हैं और बहुत पहले से दोनों के बीच यौन संबंध रह चुके हैं. ऐसे में पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि फारुकी ने रेप किया. कोर्ट ने पीड़िता से यह भी कहा कि अगर उसने कथित घटना के अगले ही दिन शिकायत नहीं की, तो यह काफी ‘आश्चर्यजनक’ है.

महमूद फारूकी को एक ट्रायल कोर्ट ने रेप का दोषी पाया था. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए बरी कर दिया कि पीड़िता ने ढंग से विरोध नहीं किया. (फोटो: इंडिया टुडे)
महमूद फारूकी को एक ट्रायल कोर्ट ने रेप का दोषी पाया था. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए बरी कर दिया कि पीड़िता ने ढंग से विरोध नहीं किया. (फोटो: इंडिया टुडे)

आर्टिकल 14 नाम की बेवसाइट के मुताबिक साल 1971 में एक 16 साल की आदिवासी लड़की का रेप हुआ. आरोप लगा कि दो पुलिसवालों ने महराष्ट्र के गढ़चिरौली पुलिस कंपाउंड में रेप किया. तीन साल बाद एक ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि पीड़िता झूठी है और उसे यौन संबंधों की आदत है. यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. जहां हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का व्यवहार बहुत सामान्य रहा और उसे सेक्स की आदत थी. साथ ही यह भी हो सकता है कि उसने ही पुलिसवालों को सेक्स करने के लिए उकसाया हो.

बाद में इस फैसले को लेकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए. जिसके चलते सरकार को हिरासत में होने वाले रेप और एविडेंस एक्ट में बदलाव कर इन्हें और कड़ा बनाना पड़ा.

रेप बस ‘इज्जत’ से जुड़ा है!

अब रेप के मामलों की सुनवाई के दौरान कोर्ट की कुछ ऐसी टिप्पणियों पर नजर डाल लेते हैं, जिनमें पीड़िता के बलात्कार से ज्यादा उसकी वर्जिनिटी, पवित्रता और इज्जत पर जोर दिया गया. इन टिप्पणियों को पुरुष प्रधान समाज और व्यवस्था की सोच के प्रोडक्ट के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

लाइव लॉ के मुताबिक साल 2013 के दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की-

“एक बलात्कारी किसी लाचार महिला की आत्मा को मैला कर देता है. वह महिला के लिए सबसे कीमती, उसकी इज्जत को चोट पहुंचाता है और ऐसा करते हुए पीड़िता के आत्मसम्मान को नेस्तनाबूद कर देता है.”

इसी तरह 2014 के लीलू राजेश एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बलात्कारी महिला की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक स्थितियों को चोट पहुंचाता है. जो आत्मसम्मान, इज्जत, पवित्रता और सम्मान हैं.

साल 2103 में रेप के एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बलात्कारी पीड़िता की आत्मा को मैला कर देता है. (फोटो इंडिया टुडे)
साल 2103 में रेप के एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बलात्कारी पीड़िता की आत्मा को मैला कर देता है. (फोटो इंडिया टुडे)

अलग-अलग हाई कोर्ट की तरफ से भी इस तरह की टिप्पणियां आई हैं. साल 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक टिप्पणी की थी. रोहति बंसल बनाम राज्य के मामले में. बार एंड बेंच के मुताबिक कोर्ट ने कहा-

“बलात्कार पीड़िता प्रताड़ना से भरे अनुभवों के साथ जीती है. शर्म से भरीं यादें उसका पीछा नहीं छोड़तीं. इनकी वजह से वो हर समय एक उदासी में रहती है.”

बार एंड बेंच के मुताबिक ही साल 2015 में मद्रास हाई कोर्ट ने रेप के एक दोषी को जमानत दे दी. साथ ही पीड़िता और आरोपी को समझौता करने के लिए कहा था. इस मामले में आरोप था कि आरोपी ने शादी के बहाने पीड़िता का रेप किया. बाद में पीड़िता प्रेगनेंट भी हो गई थी. इस फैसले की खासी आलोचना भी हुई. जिसकी वजह से मद्रास हाई कोर्ट को इसे वापस लेना पड़ा.

इसी फैसले के कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में सुनवाई की थी. रेप पीड़िता और आरोपी के बीच समझौते के सवाल पर कोर्ट ने कहा था-

“महिला की इज्जत उसकी कभी ना खत्म होने वाली और अमर अस्मिता का हिस्सा है. और किसी को भी इसपर लांछने लगाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.”

चलते-चलते आपको देश के पूर्व चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की तरफ से रेप के मामले में सुनवाई के दौरान की गई विवादित टिप्पणी के बारे में भी बता देते हैं. हाल ही में उन्होंने एक मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी से पूछा था कि क्या वह पीड़िता से शादी करेगा? उनकी इस टिप्पणी की खासी आलोचना हुई थी. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सफाई भी आई थी. जिसमें कहा गया था कि पूर्व चीफ जस्टिस की टिप्पणी को गलत संदर्भ में पेश किया गया.

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