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तरुण तेजपाल को रेप के आरोप से बरी करने का कोर्ट का फैसला घेरे में क्यों है?

21 मई 2021. ये दिन बहुत अहम था. क्यों? क्योंकि यौन शोषण और रेप के साढ़े सात साल पुराने एक मामले में फैसला आने वाला था. ये मामला था पत्रकार तरुण तेजपाल पर लगे आरोपों का. 2013 में, जब तरुण तहलका पत्रिका के संपादक थे, उनके ऊपर उनकी एक जूनियर सहकर्मी ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे. केस की जांच और सुनवाई के वक्त कई सारे मोड़ आए, यहां-वहां तेजपाल ने याचिका डाली, लेकिन फाइनली इस मामले में गोवा की ज़िला अदालत ने 21 मई को फैसला सुनाया और तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया. इसके बाद से ही ये मसला खबरों में बना हुआ है, आए दिन नए-नए अपडेट्स सामने आ रहे हैं. सब डिटेल में बताएंगे एक-एक करके.

ज़िला कोर्ट ने क्या कहा था?

तरुण तेजपाल पर नवंबर 2013 में आरोप लगा था कि उन्होंने गोवा के हयात होटल की लिफ्ट में अपनी सहकर्मी का यौन शोषण किया था. उस वक्त जब तहलका पत्रिका का ईवेंट गोवा में चल रहा था. मामला सामने आने के बाद तेजपाल ने मेल पर माफी मांगी और संपादक के पद से इस्तीफा दे दिया, फिर गिरफ्तारी हो गई. हालांकि कुछ महीनों बाद वो ज़मानत पर बाहर भी आ गए. फिर केस की सुनवाई चलती रही और 21 मई को फैसला सुनाया गया. केस में कब-कब क्या हुआ, इस पर हम ऑलरेडी एक शो बना चुके हैं, उसका लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा. वापस मुद्दे पर आते हैं. जज क्षमा जोशी ने तरुण को बरी करने का फैसला सुनाया. 527 पेज का ऑर्डर दिया गया, लेकिन इसकी कॉपी लोगों के सामने आई 25 मई के दिन. ‘इंडिया टुडे’ की नलीनी शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस फैसले में लिखा था-

“इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि रेप की वजह से विक्टिम बड़ा संकट और अपमान का सामना करती है, लेकिन इसी तरह रेप का गलत आरोप आरोपी को भी संकट में डालता है और अपमानित करता है.”

कोर्ट ने विक्टिम के ट्रॉमा में होने के दावों को भी खारिज किया था. कहा था कि विक्टिम महिला के कुछ वॉट्सऐप मैसेज ये बताते हैं कि वो आहत में नहीं थी, जैसा कि दावा किया गया था. और उसका पत्रिका के ऑफिशियल ईवेंट के बाद भी गोवा में रुकने के प्लान्स थे. कोर्ट ने ये भी कहा कि महिला की मां का बयान भी महिला के स्टेटमेंट को सपोर्ट नहीं करते. कहा गया-

“महिला ने दावा किया था कि कथित रेप के बाद वो ट्रॉमा में थी, लेकिन महिला की मां का बयान इस दावे को सपोर्ट नहीं करता. साथ ही न तो महिला का और न उनकी मां ने इस कथित घटना के बाद प्लान्स में बदलाव किए.”

ज़िला अदालत ने ये भी ऑब्ज़र्व किया था कि शिकायतकर्ता ने कई सारे विवादित बयान दिए थे. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने महिला के बर्ताव पर भी टिप्पणी की थी, कहा-

“यह ध्यान देने वाली बात है महिला के बर्ताव में ऐसा कुछ नहीं दिखा कि जिससे लगे कि वो यौन शोषण की पीड़िता है.”

इसके अलावा अदालत ने ये भी कहा था कि महिला ने तेजपाल को मैसेज कर होटल में अपने लोकेशन की जानकारी दी थी, जो कि बहुत अननैचुरल लगता है. कहा गया-

“अगर पीड़िता आरोपी द्वारा यौन शोषण का शिकार हुई थी, उससे डरी हुई थी और सही मानसिक स्थिति में नहीं थी, तो वो खुद आरोपी को रिपोर्ट क्यों करेगी या फिर उसे अपनी लोकेशन के बारे में क्यों बताएगी? महिला ने खुद ये माना है कि उसके फोन से 8 नवंबर 2013 के दिन आरोपी को दो मैसेज भेजे गए थे… और ये मैसेज किसी दूसरे मैसेज के रिस्पॉन्स में नहीं थे. आरोपी द्वारा ये नहीं पूछा गया था कि पीड़िता कहां है, बिना किसी प्रयास के महिला ने वो मैसेज भेजे थे, इससे ये साफ साबित होता है कि पीड़िता को इस बात का डर नहीं था और न ही वो आहत थी कि आरोपी उसे खोज लेगा.”

जांच अधिकारी पर भी सवाल!

इसके अलावा ज़िला अदालत ने इन्वेस्टिगेटिंग अधिकारी (IO) सुनीता सावंत पर भी सवाल उठाए. कोर्ट का कहना है कि सुनीता ने साढ़े सात साल पहले मामले की जांच के दौरान चूक की थी. ये भी कहा कि IO ने होटल के पहले फ्लोर के सीसीटीवी फुटेज को, जो कि एक अहम सबूत था उसे नष्ट कर दिया, जो कि आरोपी को निर्दोष साबित करने के लिए एक स्पष्ट सबूत था. कोर्ट ने कहा-

“IO ने इस बात की जांच नहीं की कि क्या लिफ्ट में बटन का एक सर्किट दबाकर उसके दरवाज़े खुलने से रोके जा सकते थे, जैसा कि शिकायतकर्ता महिला ने दावा किया था.”

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तरुण तेजपाल पर साल 2013 में यौन शोषण के आरोप लगे थे.

गोवा सरकार ने ज़िला अदालत के फैसले को चैलेंज किया!

इस तरह की बातें ज़िला अदालत के जजमेंट में लिखी गई हैं. इसी को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता महिला के आरोपों का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है, इसलिए तरुण तेजपाल को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है. इस फैसले के खिलाफ 25 मई को ही गोवा सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. इस वर्डिक्ट को चुनौती देनी चाही. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा सरकार की तरफ से हाई कोर्ट में कहा गया-

“ट्रायल कोर्ट का 527 पेज का जजमेंट बाहरी अस्वीकार्य सामग्री, गवाही, विक्टिम की पास्ट सेक्शुअल हिस्ट्री के ग्राफिक डिटेल्स से प्रभावित है, जिस पर कानून द्वारा रोक लगाई गई है और इस केस में इसी का इस्तेमाल किया गया है महिला के चरित्र की निंदा करने और उसके सबूतों को डिसक्रेडिट करने के लिए. पूरा जजमेंट शिकायतकर्ता पर अभियोग लगाने पर फोकस करता है, न कि आरोपी की भूमिका का पता लगाने की कोशिश करता है.”

गोवा सरकार की तरफ से ये भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट की जो भी फाइंडिंग्स आई हैं, वो पूर्वाग्रह और पितृसत्ता से रंग से रंगी हुई हैं. ट्रायल कोर्ट ने अपने जजमेंट में ये कहा था कि घटना के बाद वाली तस्वीरों में विक्टिम आहत नहीं दिख रही है. इस पर भी गोवा सरकार ने अपना पक्ष रखा. कहा कि इस तरह की टिप्पणी ये दिखाती है कि विक्टिम्स के पोस्ट-ट्रॉमा बर्ताव को लेकर समझ की बहुत कमी है. ये टिप्पणी ये भी दर्शाती है कि कानून को पूरी तरह से इग्नोर किया गया है, साथ ही साथ ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्देश और गाइडलाइन्स को भी अनदेखा किया गया है.

यहां हम आपको ये भी बता देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि जो लड़की या महिला यौन शोषण या रेप की शिकायत करती है, उसके सबूतों को संदेह की नज़र से क्यों देखा जाए? जबकि मुकदमा आरोपी पर चल रहा है न कि विक्टिम पर.

बॉम्बे हाई कोर्ट क्या कहता है?

अब जब गोवा सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया ही है, तो इस पर कोर्ट की तरफ से भी काम शुरू हुआ. 2 जून को हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने कहा कि प्राइमा फेसी, माने ऊपरी तौर पर देखने से लग रहा है कि केस को आगे सुनवाई के लिए कंसिडर किया जा सकता है. होता ये है कि जब किसी निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने के लिए उच्च अदालतों में अपील डाली जाती है, तो अदालतें पहले ये देखती हैं कि क्या इस फैसले को या मामले को फिर से कंसिडर किया जा सकता है या नहीं? उसके बाद आरोपी को नोटिस भेजा जाता है. तेजपाल वाले मामले में भी यही हुआ. हाई कोर्ट ने तरुण तेजपाल को नोटिस भेज दिया है और 24 जून तक रिटर्न करने को कहा है. साथ ही ट्रायल कोर्ट से इस केस से जुड़े सारे पेपर्स मांगे है. हाई कोर्ट के जस्टिस SC गुप्ते ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर व्यंग्य के लहजे में कहा-

“ये फैसला ऐसा लगता है मानो रेप विक्टिम्स के लिए एक मैनुअल हो कि उन्हें कैसा बर्ताव करना चाहिए”.

संगठन कर रहे हैं विरोध

तरुण तेजपाल मामले में ट्रायल कोर्ट का जजमेंट ऐसा है, जिसका काफी विरोध हो रहा है. ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट की मानें तो महिलाओं, एक्टिविस्ट्स, एकेडमिक्स के करीब 300 ग्रुप्स ने एक जॉइंट स्टेटमेंट निकाला है. कहा है कि इस फैसले ने आरोपी को नहीं, बल्कि विक्टिम को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. ऐसे में ये फैसला रेप का केस लड़ रही सर्वाइवर्स को डिमोटिवेट कर सकता है. जॉइंट स्टेटमेंट में कहा गया-

“ये जजमेंट दिखाता है कि सेक्शुअल असॉल्ट की सर्वाइवर को किस तरह से असंवेदनशील अदालती माहौल में भीषण ट्रायल का सामना करना पड़ता है. ये भी बता रहा है कि कितने क्रूर, अवैध, अप्रासंगिक और स्कैंडलस क्रॉस एग्ज़ामिनेशन से विक्टिम गुजरती है.”

इस बयान पर साइन करने वालों में ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमन्स असोसिएशन, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमन्स असोसिएशन, फोरम अगेन्स्ट ओप्रेशन ऑफ विमन्स शामिल हैं. साथ ही पूर्व सांसद सुभाषिनी अली समेत कई लेफ्ट पार्टियों के नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया है. स्टेटमेंट में ये भी कहा गया है कि सर्वाइवर की प्राइवेट लाइफ के हर पहलू की जांच की गई, लेकिन इस तरह की जांच आरोपी पर नहीं हुई. इस मुद्दे पर इन असोसिएशन्स की राय जानने के लिए हमने बात की मरियम धावले से, ये All India Democratic Women’s Association की जनरल सेक्रेटरी हैं. उन्होंने कहा-

“गोवा कोर्ट का फैसला धक्का देने वाला है, अस्वस्थ करने वाला है. क्योंकि जो भी औरत यौन शोषण का शिकार होती है, उसके मन में इस आदेश से डर पैदा हो सकता है. कोर्ट ने इस केस में कोई भी संवेदनशीलता विक्टिम की तरफ नहीं दिखाई है. जिस तरह से विक्टिम का क्रॉस एग्जामिनेशन किया गया, उसका असर बहुत दूरगामी हो सकता है. औरतें केस करने के लिए आगे डरेंगी. ये कहेंगी कि अगर इस तरह का कोर्ट के अंदर होगा, विक्टिम को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे तो बहुत मुश्किल होगी आगे के दिनों में.”

इसके अलावा हमने सुभाषिनी अली से भी बात की. उन्होंने कहा-

“बहुत सारे जजमेंट हो चुके हैं कि अगर कोई वेश्या है, वेश्यावृत्ति करती है तो उसको भी न कहने का अधिकार है. अगर वो कहती है कि उसने मना किया था, तो उसे भी यौन हिंसा माना जाएगा. इस केस में पीड़ित पक्ष की महिला के बारे में पूरी जानकारी सार्वजनिक करके पता नहीं ये कोर्ट क्या करना चाहता है. अगर ऐसा होगा तो आगे आने वाले दिनों में कौन हिम्मत करेगा रेप के मामले में कोर्ट के पास जाने के लिए या न्याय की मांग करने के लिए.”

तरुण तेजपाल के मामले में अगली जो भी अपडेट होगी, हम आप तक ज़रूर पहुंचाएंगे.


वीडियो देखें: गोवा की कोर्ट ने पत्रकार तरुण तेजपाल को रेप के केस में किया बरी

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