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लालू-राबड़ी का विरोध करने के चक्कर में सुशील मोदी ने अपना ही मज़ाक बनवा लिया

सोशल मीडिया पर आए दिन किसी न किसी की क्लास लगती ही है. अक्सर इस क्लास का शिकार नामी लोग होते हैं. अभी इस वक्त जिन सज्जन को ज्ञान दिया जा रहा है, वो हैं सुशील मोदी. ये बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री हैं और अभी राज्य सभा सांसद हैं. BJP के बड़े नेता हैं. इन्होंने एक ट्वीट किया. 5 जून को, और उसी ट्वीट को लेकर अभी मचा हुआ है बवाल. जनता के निशाने पर तो हैं ही. साथ ही साथ लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी भी काफी खरी-खोटी सुना रही हैं. दरअसल, सुशील मोदी ने राबड़ी देवी के लिए कहा कि एक घरेलू महिला को सीधे राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया गया था. और लालू प्रसाद यादव के इसी फैसले पर उन्होंने सवाल उठाए थे. उसके बाद ‘घरेलू महिला’ शब्द पर लोगों ने सुशील मोदी को घेरना शुरू कर दिया. ये पूरा मामला आपको डिटेल में बताएंगे. साथ ही बताएंगे कि घरेलू महिला का हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर किस तरह का योगदान है.

साल था 1974. दिन था 5 जून. ‘लोकनायक’ जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान में संपूर्ण क्रांति की घोषणा की थी. कहा था कि इस क्रांति का मकसद समाज के सबसे ज्यादा दबे-कुचले लोगों को सत्ता के शिखर पर देखना. इस दिन गांधी मैदान में एक नारा गूंजा था- ‘जात-पात तोड़ दो, तिलक-दहेज छोड़ दो. समाज के प्रवाह को नयी दिशा में मोड़ दो’. इसके बाद जो क्रांति हुई उसे हम और आप जेपी मूवमेंट के नाम से भी जानते हैं. इस क्रांति ने आज के कई नामी नेताओं को जन्म दिया. दो दिन पहले, 5 जून के दिन, यानी संपूर्ण क्रांति कि वर्षगांठ के दिन लालू प्रसाद यादव ने एक ट्वीट किया. कहा-

“जब तंत्र जन पर हावी हो जाए, तंत्र को विकृत बनाकर जन को ही गौण किया जाने लगे, तब व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए “सम्पूर्ण क्रांति” अपरिहार्य हो जाता है. सम्पूर्ण क्रांति दिवस की सभी नागरिकों को शुभकामनाएं. यह सच्चे लोकतंत्र का पर्व है. जन जागरण दिवस है. सजग नागरिकों का दिवस है.”

यूं तो सुशील मोदी ने भी इस दिन की बधाई ट्विटर पर दी. लेकिन इसके बाद उनकी नज़र पड़ गई लालू प्रसाद यादव के ट्वीट पर. और उन्होंने कटाक्ष करते हुए लालू की पत्नी राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने पर सवाल उठा दिए. उन्होंने लिखा-

“घरेलू महिला राबड़ी देवी को सीधे मुख्यमंत्री बनवा कर क्या लालू प्रसाद संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था को दुरुस्त करने की “क्रांति” कर रहे थे?”

इसके अलावा भी घोटाले का मुद्दा उठाते हुए सुशील मोदी ने कई सारे ट्वीट लालू के खिलाफ किए. उन सभी ट्वीट्स का यहां ज़िक्र करने का कोई मतलब नहीं है. हमें जिस पर बात करनी है, वो ट्वीट राबड़ी देवी से ही जुड़ा है, जो अभी-अभी हमने आपको बताया. लोग क्या विरोध कर रहे हैं, वो जानने से पहले थोड़ा राबड़ी देवी के बारे में भी जान लीजिए.

वो बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री हैं और लालू प्रसाद यादव की पत्नी हैं. राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री का तमगा भी राबड़ी देवी के ही पास है. 1997 में जब चारा घोटाले का आरोप लालू पर लगा था, तब उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था, और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया था. राबड़ी को इसके पहले तक राजनीति का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था. वो पूरी तरह से एक हाउस वाइफ ही थीं. घरेलू काम ही करती थीं. अब इसी घरेलू काम और हाउस वाइफ होने का ज़िक्र सुशील मोदी ने अपने ट्वीट में राबड़ी के लिए किया. उन्होंने घरेलू महिला के सीधे मुख्यमंत्री बनने पर ही सवाल उठा दिया? मानो जैसे घरेलू महिला के अंदर किसी तरह की कोई क्षमता न होती हो, फैसले लेने की.

सुशील के ट्वीट का जमकर विरोध भी हुआ. लालू की बेटी रोहिणी आचार्या ने कहा-

“आपकी मानसिकता बता रही है घरेलू महिला या महिलाओं के प्रति कैसी आपकी ओछी सोच है? जिसको मां-बहनों का भी सम्मान करने का संस्कार नहीं, वो नेता क्या इंसान कहलाने के लायक नहीं. नोट कीजिए- महिलाओं के प्रति इसी घिनौनी सोच के कारण डबल इंजन की सरकार ने बालिका गृह कांड का अंजाम दिया!!”

केवल रोहिणी ही नहीं, आम ट्विटर यूज़र्स ने भी ‘घरेलू महिला’ शब्द के गलत संदर्भ में इस्तेमाल किए जाने पर विरोध जताया. लोगों ने कहा कि इस शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए था, क्यों क्या कोई घरेलू महिला मुख्यमंत्री नहीं बन सकती? एक अन्य यूज़र ने कहा-

“जब एक अपराधी सांसद और विधायक बन सकता है तो घरेलू महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकती? आप घरेलू महिलाओं के बारे में ऐसा बोलकर उनके महत्व को छोटा साबित कर रहे हैं.”

Sushil Modi Tweet

हम इस फैक्ट को नहीं नकार रहे कि राजनीति में परिवारवाद नहीं है. है, बिल्कुल है. आए दिन इसके उदाहरण भी हमें देखने को मिलते हैं. लालू का राबड़ी को सीएम बनाना भी इसी का जीता-जागता उदाहरण है. आपको अगर विरोध करना है तो इस परिवारवाद का करिए. मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए राबड़ी ने जो काम किए, उनका विश्लेषण करके, उसके आधार पर विरोध करिए, न कि उनके घरेलू महिला होने को लेकर सवाल उठाइए. जनता खुद ये कह रही है कि सुशील मोदी ने ऐसा ट्वीट करके घरेलू महिलाओं के महत्व को छोटा साबित करने की कोशिश की है. हम इस पर ज्यादा ज्ञान नहीं देंगे. सीधे फैक्ट्स पर बात करेंगे. बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो आज भी घरेलू औरतों और हाउस वाइव्स के कामों को कमतर ही आंकते हैं. उन्हें ही हम सच्चाई से रूबरू करवाने वाले हैं.

देश की हाउस वाइव्स कितना काम करती हैं?

सबसे पहले बात करते हैं हाउस वाइव्स की संख्या और उनके कामों की. हममें से बहुत से लोगों की मम्मियां हाउस वाइव्स हैं. सुबह उठने के बाद पानी भरने, घर की साफ-सफाई, खाना, कपड़े बर्तन से लेकर हर एक छोटा-छोटा काम वही करती हैं. बच्चों और बूढ़ों का ध्यान भी रखती हैं. अगर एक दिन भी वो बीमार पड़ जाएं, तो घर में खाने के लाले पड़ जाते हैं. जनवरी 2021 में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने बताया था कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, हमारे देश की 159.85 मिलियन यानी करीब 16 करोड़ महिलाएं ‘घरेलू काम’ करती हैं. वहीं केवल साढ़े पांच करोड़ पुरुष ये काम करते हैं.

भारत सरकार का सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय. ये आंकड़ों को लेकर काम करता है. सर्वे वगैरह करवाता है. इसके नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस यानी NSO ने 29 सितंबर 2020 को एक रिपोर्ट जारी की थी. ‘भारत में समय का उपयोग-2019′ के नाम से. NSO का ये सर्वे जनवरी 2019 से दिसंबर 2019 के बीच किया गया था. देश के करीब एक लाख 38 हज़ार परिवारों को इसमें शामिल किया गया था. सर्वे में ये पता चला कि आज भी हमारे देश में घर के काम का ज्यादा भार औरतों के कंधों पर ही है. खाना बनाना, साफ-सफाई जैसे घरेलू कामों में करीब 81.2 फीसद औरतें हिस्सा लेती हैं. वहीं केवल 26.1 फीसद आदमी ही ये काम करते हैं. यानी औरतों की संख्या आदमियों के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा है. जहां औरतें दिन के 299 मिनट यानी करीब 5 घंटे औसतन ये काम करती हैं. तो आदमी केवल 97 मिनट, यानी करीब डेढ़ घंटे में ही टाटा-बाय बाय कह देते हैं.

अब घर के बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख की बात करते हैं. इस काम के पैसे नहीं मिलते. इसमें भी औरतें औसतन दिन के 2 घंटे 14 मिनट का समय देती हैं. आदमी केवल 1 घंटे 16 मिनट ही ये काम करते हैं. इस अनपेड काम में भी औरतें आदमियों की तुलना में दोगुना समय दे रही हैं. अगर पेड कामकाज की बात करें, यानी ऐसे काम जिन्हें करने पर पैसे मिलते हैं, तो 57.3 फीसद आदमी ऐसे कामों का हिस्सा हैं. वहीं औरतों की संख्या केवल 18.4 फीसद है.

हाउस वाइव्स के काम पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

इतना सब करने के बाद भी औरतों से सवाल किया जाता है कि वो आखिर वो करती ही क्या हैं? तो जनाब जान लीजिए कि वो पूरे घर की रीढ़ हैं. सुप्रीम कोर्ट भी ये बात कह चुका है कि ये धारणा गलत और दिक्कत वाली है कि हाउस वाइव्स काम नहीं करतीं या फिर घर की इकॉनमी में कोई योगदान नहीं देतीं, इस धारणा को बदलने की ज़रूरत है. जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कहा, वो साल 2014 का है. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2014 में एक शादीशुदा कपल की मोटर वेहिकल एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. इसके बाद मोटर एक्सीडेंट क्लैम ट्रिब्यूनल ने कपल की दो बेटियों को 40 लाख रुपए मुआवज़ा देने की घोषणा की थी. लेकिन इस पर इन्श्योरेंस कंपनी ने हाई कोर्ट में याचिका डाली और कोर्ट ने इस अमाउंट को घटाकर 22 लाख कर दिया, क्योंकि मृतक महिला एक हाउस वाइफ थी. मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस सुर्य कांत की बेंच ने मामले की सुनवाई की और मुआवज़े की रकम को 22 लाख से बढ़ाकर 33 लाख कर दिया. NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI रमन्ना ने इस सुनवाई के दौरान कहा था-

“घर के काम ज्यादातर औरतें करती हैं, वो अफना वक्त और कोशिश सब देती हैं. वो पूरे परिवार के लिए खाना बनाती हैं, राशन को मैनेज करती हैं, शॉपिंग से लेकर सफाई, डेकोरेशन जैसे सारे काम वो करती हैं. घर का बजट भी मैनेज करती हैं. इसलिए, एक होम मेकर के लिए नेशनल इनकम तय करने का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है. इससे उन महिलाओं को पहचान मिलेगी जो ये काम करती हैं, फिर चाहे अपनी मर्ज़ी से या फिर सोशल/कल्चर नॉर्म्स की वजह से. ये बड़े पैमाने पर सोसायटी को ये संकेत देता है कि देश के कानून और कोर्ट होम मेकर्स के श्रम, सेवा और बलिदान को वैल्यू देते हैं.”

अब सवाल उठता है कि हाउस वाइव्स के कामों का पैसों में क्या मूल्य होगा और दूसरा वो किस तरह से देश की इकॉनमी में योगदान देती हैं. घर के बच्चों को पढ़ाकर पालपोसकर बड़ा करती हैं, ये बच्चे बड़े होकर काम करते हैं, यानी देश की अर्थव्यवस्था में ये भी योगदान देते हैं. यहां पर भी इनडायरेक्टली हाउस वाइव्स इकॉनमी में अपना योगदान दे रही हैं. इकॉनमी से जुड़े इन सवालों के और भी अच्छे से जवाब जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर अनूप कुमार सिंह से. ये LU में इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट में असोसिएट प्रोफेसर हैं. वो कहते हैं

“कहीं भी महिलाओं की भूमिका किसी भी प्रकार से चाहे वो घरेलू हों या कामकाजी हो, उनकी भूमिका कम नहीं है. जो घरेलू महिलाएं घर में रहकर काम करती हैं, हम उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते. हमारा ये मानना है कि घर एक फैक्ट्री है, जिसमें बहुत तरीके के प्रोडक्शन होते हैं. वहां पर कुकिंग, क्लीनिंग होती है. बच्चों को एजुकेट किया जाता है, तो जो घर में रहकर महिलाएं ये सब काम कर रही हैं, बच्चों को पालकर अच्छे संस्कार दे रही हैं, ये बड़ी चीज़ है. जो शिक्षा मां अपने बच्चे को देती है, वो जीवन भर उसके काम आती है. न सिर्फ अच्छे संस्कार सीखने में, बल्कि कहीं न कहीं करियर प्लानिंग में भी काम आता है. अगर एक महिला अपने घर का सारा काम करती है, तो समझ लीजिए कि वो कितनी सारी डोमेस्टिक हेल्प, जिन्हें हम घर के काम के लिए लगाते हैं, उन्हें देने वाले पैसे बचाती है. वो सारा काम खुद करती है. तो क्या उसके काम की वैल्यू नहीं है. इसलिए नहीं करते क्योंकि ये अनपेड काम है, कोई पैसा नहीं दे रहे हैं. उसी काम के लिए दूसरी महिला को रखेंगे तो पेमेंट देंगे. या हमारे घर की महिला कहीं और जाकर काम करेगी, तो उसे पैसा मिलेगा. यानी उसकी अपॉर्चुनिटी कॉस्ट है. अगर एक महिला खेत में भी अपने पति का हाथ बंटा रही है, तो वहां भी पैसे बचा रही है, क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसे लेबर रखना पड़ता. तो उस लेबर की जो पेमेंट देनी है, वो बच गई. यही वैल्यू है घर की महिला के काम की.”

दूसरा घर पर क्या सामान खरीदा जाना है, किस ब्रांड का हो, किस सामान पर कितना पैसा खर्च करना है, ये सारे फैसले अधिकतर हाउस वाइव्स ही करती हैं, डायरेक्टली या इनडायरेक्टली ये सारी खरीदारी देश की इकॉनमी पर असर डालती है.


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