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सुशांत सिंह राजपूत का एक बड़ा सच ये था, जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते

“हम हार-जीत, सक्सेस-फेलियर में इतना उलझ गए हैं, कि ज़िन्दगी जीना भूल गए हैं. जिंदगी में अगर कुछ सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट है, तो वो है खुद जिंदगी.”

ये सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म ‘छिछोरे’ का डायलॉग है, जिसके वीडियो लोग उनके जाने के बाद से बार-बार शेयर कर रहे हैं. और कह रहे हैं कि ऐसे डायलॉग बोलने वाला खुद कैसे जा सकता है?

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जा सकता है. क्योंकि किसी एक्टर की फ़िल्में उसका असल जीवन नहीं होतीं. सुशांत का जाना हम सबके लिए चौंकाने वाला था. उनके जाने ने सोशल मीडिया पर एक चर्चा छेड़ दी. मेंटल हेल्थ की चर्चा. क्योंकि रिपोर्ट्स ने बताया कि सुशांत लगभग 6 महीनों से डिप्रेशन से जूझ रहे थे. अलग-अलग तरह के ओपिनियन आए. जिसमें से कुछ हास्यास्पद थे- ‘खुश रहना चाहिए, योग और ध्यान करो, चॉकलेट खाओ, पार्टी करो, घूमने जाओ.’

हास्यास्पद क्यों? क्योंकि जब हम ये कह रहे होते हैं, तब बहुत देर हो चुकी होती है.

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सुशांत की फिल्म छिछोरे से एक दृश्य.

देर कैसी? समझिए बात अपब्रिंगिंग की.

जब हमारे बच्चे बड़े हो रहे होते हैं. हम लड़कियों को सिखाते हैं, थोड़ा एडजस्ट करो. एडजस्ट करने से ही तो चलेगा. लड़कों को सिखाते हैं स्ट्रॉन्ग बनो. क्योंकि रोती लड़कियां हैं. और मर्द को दर्द नहीं होता.

सुपर स्पेशलिटी सेंटर ‘द रेनोवा केयर’ के डायरेक्टर और साइकेट्रिस्ट डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी बताते हैं कि डिप्रेशन को न पहचान पाने में जेंडर भूमिकाओं का भी हाथ है. एक बुनियादी समस्या तो है ही. कि मानसिक स्वास्थ्य को हम ज़रूरी समझते नहीं. इग्नोर करते हैं.

दूसरा ये कि उनकी भूमिकाओं को लेकर उन्हें अपराधबोध महसूस करवाते हैं. जैसे मानसिक परेशानियों से जूझ रही महिला से ये कहना कि तुम कैसी मां हो. वो सुसाइड जैसा कदम उठा ले तो ये कहना कि अपने बच्चों के बारे में क्यों नहीं सोचा. वहीं लड़कों को ये लगता है कि डिप्रेशन का मतलब कमजोरी है. जो उनकी मर्दानगी पर धब्बे की तरह आएगी. इसलिए वे डॉक्टर के पास जाने के बारे में सोचते ही नहीं.

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डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी. (तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेंट)

सुसाइड

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो की पिछली, यानी साल 2018 के आंकड़े दिखाती रिपोर्ट बताती है कि केवल साल 2018 में 1,34,000 लोगों की मौत सुसाइड से हुई. सरकार के मुताबिक़ सुसाइड की कई वजहें हो सकती हैं. जैसे क़र्ज़, शादी में तनाव, पारिवारिक समस्याएं, पढ़ाई के जुड़ी समस्याएं, बेरोज़गारी, प्रेम संबंध या बीमारियां. मगर ध्यान से देखेंगे, तो ये सभी कारण एक बड़ी सी छतरी के नीचे दिखेंगे. वो छतरी जिसका नाम है मानसिक परेशानी.

डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी बताते हैं:

“सुसाइड करने वालों में 90 फीसद लोग मानसिक तनाव से घिरे होते हैं. ये सच है कि जीवन में तकलीफें होती हैं. मगर ये तकलीफें सीधी वजह नहीं हैं.”

स्टडीज बताती हैं कि सुसाइड की ओर लोग इसलिए जाते हैं क्योंकि वो उन्हें एक बेहतर विकल्प के रूप में दिखता है. दिमाग भविष्य देखने की कोशिश करता है. डिप्रेशन के कारण भविष्य इतना बुरा दिखता है कि सुसाइड पॉजिटिव कदम लगने लगता है. मगर मूल वजह एक ही है. कि व्यक्ति डिप्रेस्ड है.

स्टडीज बताती हैं कि सुसाइड की राह पर जाने वाला व्यक्ति कुछ संकेत ज़रूर देता है. पिछले एक महीने में उसकी किसी करीबी से कुछ ऐसा कहा होता है. कि जीवन व्यर्थ है. या मौत बेहतर. जो साइकेट्रिस्ट से कंसल्ट कर रहे होते हैं, उन्होंने ऐसे सिग्नल बीते एक महीने में डॉक्टर को दिए होते हैं.

मगर एक समाज के तौर पर हम ऐसे सिग्नल डिनाय करते हैं. ‘ऐसे मत सोचो’, ‘सब ठीक तो है’, ‘पॉजिटिव रहो’. इस तरह की नसीहतें देकर सोचते हैं हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया. उसके आगे कोई कदम नहीं उठाते. और सबसे गलत तो ये मानना है कि जो इस बारे में बोलता है वो ऐसा कर नहीं सकता. लक्षण आपके सामने हैं. आप पहचानने से इनकार करते हैं.”

असंवेदनशील हम

क्यों न इस बात का भी ज़िक्र हो जाए. कि जो लोग सुशांत के जाने पर खेद जाते रहे हैं. वो खुद, किसी और व्यक्ति को मानसिक प्रताड़ना का शिकार बना रहे हैं.

अपने टीवी सोप ‘पवित्र रिश्ता’ की को-एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे के साथ सुशांत 6 साल रिलेशनशिप में थे. जैसे ही सुशांत की मौत की खबर आई, लोग अंकिता के इन्स्टाग्राम अकाउंट पर पहुंच गए. और कहने लगे, ‘कितनी बेशर्म हो तुम. वो तुम्हारी वजह से गया. और तुम एक वाक्य तक नहीं लिख रहीं.’

ट्रोलिंग के कुछ नमूने यहां देख लीजिए:

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(तस्वीर: इंस्टाग्राम)
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(तस्वीर: ट्विटर)
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(तस्वीर: ट्विटर)
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(तस्वीर: ट्विटर)
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(तस्वीर: ट्विटर)

जहां एक ओर सोशल मीडिया पर मेंटल हेल्थ पर बड़ी-बड़ी बातें छौंकी जा रही थीं. वहीं दूसरी ओर लोग अंकिता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए सोशल मीडिया का जितना इस्तेमाल कर सकते थे, कर रहे थे.

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सुशांत और अंकिता कई सालों तक रिलेशनशिप में थे.

फिर लोग रिया चक्रवर्ती और कृति सैनन के पास पहुंचे. दोनों ही सुशांत की करीबी दोस्त रही हैं. ख़बरें ये थीं कि कुछ दिनों पहले तक रिया लॉकडाउन में सुशांत के ही साथ रह रही थीं. इन दोनों एक्ट्रेसेज से भी इसी तरह के सवाल पूछे गए. कृति कि बहन नूपुर ने सोशल मीडिया पर लिखा- ‘तुम कितनी पत्थरदिल हो, तुमने एक पोस्ट नहीं डाला, एक भी रिएक्शन नहीं आया तुम्हारी तरफ से’, हमें इस तरह के मैसेज आ रहे हैं.

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हाल में ही कृति ने सुशांत के लिए अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट भी डाला.

आप खुद सोचें. क्या आपके जीवन में ऐसे लोग नहीं हैं, जिनसे आपकी अब बात नहीं होती. जो किसी न किसी वजह से पीछे छूट गए. क्या आप मनाते हैं कि वे चले जाएं. क्या आप खुश होंगे अगर उनके बारे में कोई बुरी खबर आए?

डॉक्टर त्रिपाठी बताते हैं:

“लोगों का इस तरह का रिएक्शन एक क्लासिक ग्रीफ रिएक्शन है. जब हमें ऐसी खबर मिलती है, पहले हम उसका डिनायल करते हैं. कि ये तो हुआ नहीं है. या ये सच नहीं है. फिर हम क्रोधित होते हैं. गुस्सा होकर हम किसी को ब्लेम करना चाहते. सिर्फ एक्स गर्लफ्रेंड नहीं. फिल्म इंडस्ट्री में भी तमाम और नाम लेते हैं. इस तरह हम मूल बात को भुला देते हैं. बात व्यक्ति के डिप्रेशन में होने की. मानसिक रूप से परेशान होने की. ये एक रिडक्शनिस्ट अप्रोच है. एक सिंपल तरीका है ऐसी ख़बरों से डील करने का. जबकि होना तो ये चाहिए कि मानसिक स्वास्थ्य पर बात की जाए और वहां जड़ें खोजी जाएं.”

अगर सुशांत के जाने का दुख हमें असल में है. तो सिर्फ एक ही तरीका है उस दुख के साथ न्याय करने का. कि हम मेंटल हेल्थ के बारे में पढ़ें, जानें और संवेदनशील बने. किसी का अपमान करने के पहले सौ बार सोचें. सत्ता के किसी पद पर हैं तो बार बार खुद से पूछें कि क्या हम फेयर हैं. न्यायपूर्ण हैं. किसी को बुली करने, उसपर सोशल मीडिया पर भद्दे कमेंट करने के पहले सौ बार सोचें. आपकी एक घटिया बात किसी को कितनी रातें जगाकर रख सकती है, आप नहीं जानते. इसलिए सोचें. क्योंकि अटकलें लगाना, किसी की मौत के बाद उसके रिश्ते उधेड़ना, उसकी पर्सनल लाइफ में घुस जाना. और हैशटैग में बने रहना आसान है.


वीडियो:सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड के उमड़े ‘प्यार’ को सैफ अली खान ने ‘पाखंड’ कह दिया

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