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सुसाइड से जुड़े वो छह झूठ जो आत्महत्या जितने जानलेवा हैं

सुशांत सिंह राजपूत. 14 जून, 2020 को मुंबई के अपने फ्लैट में उन्होंने फांसी लगा ली. उसके बाद सोशल मीडिया पर वही हुआ जो होता है. बातें. ख़ूब बातें. कई लोगों ने दुःख जताया. कई ने ज्ञान दिया. कई लोगों ने इस मुद्दे पर अपनी रोटियां सेंक लीं. इन सब के बीच एक सिलसिला और शुरू हुआ. सुसाइड यानी आत्महत्या पर बातचीत का. कई लोगों ने अपनी राय दी. जिन्हें मेंटल हेल्थ का ‘म’ भी नहीं पता, वो भी मनोचिकित्सक बनते नज़र आए. खैर छोड़िए.

ज़रूरी ये है कि लोग सुसाइड के बारे में जो जानें वो सही फैक्ट्स हों. मिथक नहीं. इसलिए एक मनोचिकित्सक ने सुसाइड से जुड़े मिथकों के जवाब दिये हैं. उनका नाम है डॉक्टर सौमित्र पठारे. वो इंडियन लॉ स्कूल के मेंटल हेल्थ लॉ एंड पालिसी सेंटर के डायरेक्टर हैं.

एक ट्विटर थ्रेड में उन्होंने सुसाइड के मिथ बस्टर्स पोस्ट किये हैं. उन्होंने अंग्रेज़ी में ट्वीट किया है, हम उसका हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत कर रहे हैं.

मिथक 1: सुसाइड के बारे में बात करना ख़तरनाक है. ये सुसाइड को बढ़ावा देता है.

सच: ग़लत. सुसाइड के बारे में खुलकर बात करना उसे रोक सकता है. बढ़ावा नहीं देता.

मिथक 2: जो इंसान सुसाइड के ख़्याल पालता है, वो मरना ही चाहता है.

सच: ग़लत. जो इंसान सुसाइड करने की सोच रहा होता है वो परेशान होता है. सही समय पर अगर इमोशनल सपोर्ट मिल जाए तो वो बच सकता है.

मिथक 3: ज़्यादातर सुसाइड बिना किसी वॉर्निंग के होते हैं

सच: हर सुसाइड से पहले कोई न कोई लक्षण दिखते हैं. या तो इंसान की बोलचाल में. या उसके बर्ताव में. कई लोग परिवार, दोस्तों, या डॉक्टर से मरने की बातें करते हैं.

मिथक 4:जो लोग सुसाइड की बातें करते हैं वो सुसाइड नहीं करते

सच: ग़लत. जो लोग सुसाइड की बात कर रहे हैं वो मदद मांग रहे हैं. सपोर्ट मांग रहे हैं. उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं है. आप मदद कर सकते हैं. उनके साथ बैठिए. उन्हें सुनिए. मदद करिए. आप एक ज़िंदगी बचा लेंगे.

मिथक 5: अगर कोई एक बार सुसाइड के बारे में सोच ले तो वो हमेशा ऐसा ही सोचता रहेगा

सच: सुसाइड करने का ख़्याल अस्थाई है. वो कम देर के लिए दिमाग में आता है. ज़्यादा देर नहीं रहता. और किसी-किसी ख़ास सिचुएशन में आता है. अगर सही समय पर मदद मिल जाए तो इंजान जान नहीं देता. लंबा जी जाता है.

मिथक 6: सिर्फ़ दिमागी बीमारी वाले लोग ही सुसाइड करते हैं

सच: झूठ. एकदम झूठ. ख़ासतौर पर हिंदुस्तान में एक रीसर्च है. ये बताती हैं कि सुसाइड करने वाले केवल 50 फ़ीसदी ही लोग दिमागी बीमारी से जूझ रहे होते हैं. ज़रूरी नहीं कि किसी को कोई मेंटल इलनेस है तो ही वो सुसाइड करना चाहता हो.

अब ये तो हुए कुछ आम मिथक. आपने भी कभी न कभी सुने ही होंगे. हमने डॉक्टर सौमित्र पठारे से बात भी की. वो कहते हैं:

‘सबसे बड़ा मिथक. कहा जाता है कि दिमाग से कमज़ोर लोग ही सुसाइड करते हैं. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ये दिमाग से कमज़ोर होना क्या होता है? कोई सुसाइड कर लेता है इसका ये  मतलब नहीं कि वो दिमागी रूप से कमज़ोर था. ये सोच बदलनी चाहिए.’

ज़रूरी है कि लोग मदद के लिए आगे आएं. आपके आसपास अगर कोई ऐसा है तो उसकी मदद करिए. उसकी बात सुनिये.

डॉक्टर सौमित्र पठारे आगे कहते हैं-

‘जो सुसाइड करने के बारे में सोच रहा है. वो अपनी बातों या बर्ताव के ज़रिए ये जाहिर कर देता है. ज़रूरी है कि उसके आसपास के लोग उसपर ध्यान दें.’

कैसे कर सकते हैं मदद

-अगर आपके पास समय है तो किसी सुसाइड हेल्पलाइन में काम करिए

-अगर आप टीचर हैं, नेता हैं, लीडर हैं, पुलिस में हैं, सोशल वर्कर हैं, मेनेजर हैं, या एचआर में हैं-आपको एक ट्रेनिंग कोर्स करना चाहिए. इसे गेटकीपर ट्रेनिंग कोर्स कहते हैं. इससे आप पहचान कर सकते हैं कि कौन सुसाइडल है. कौन ज़्यादा रिस्क में है. कौन कितने रिस्क में है, ये जानकर आप उनको इलाज के लिए भेज सकते हैं.

-मीडिया की रिपोर्टिंग सुसाइड कम कर सकती है. तो अगर आप मीडिया में है आप मदद कर सकते हैं. अपनी रिपोर्टिंग से. सुसाइड के बारे में लिखते समय या रिपोर्ट करते समय क्या तरीका अपनाया गया था, ये तफ़सील से न बयां करें. उसमें मिर्च-मसाला न डालें. उल्टा लोगों को इलाज बताएं.

-याद रहे, एक तिहाई केसेस घर पर हो रही हिंसा और एक तिहाई शराब की वजह से होते हैं. घर पर सही माहौल और शराब का कम सेवन इसे रोक सकता है.

-याद रखिए. डिप्रेशन का इलाज है. लोग ठीक हो सकते हैं. लंबा जी सकते हैं. अगर आप किसी ऐसे को जानते हैं तो उनका इलाज करवाइए. पब्लिक अस्पतालों में ये फ्री है.

कुछ सुसाइड हेल्पलाइन नंबर्स:

-रोशनी हेल्पलाइन (+91 4066202000)

-स्नेहा फाउंडेशन इंडिया (+91 4424640050)

-कनेक्टिंग इंडिया (+91 9922001122)

-कूज (8322252525)

-साथ (079-2630-5544, 079-2630-0222)


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