Submit your post

Follow Us

महिला अधिकारियों को लेकर आर्मी में इतना बड़ा झोल चल रहा और किसी को खबर नहीं!

25 मार्च की सुबह-सुबह सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया. फैसला भारतीय सेना में महिलाओं के परमानेंट कमीशन से जुड़ा है. कोर्ट ने कहा कि महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने के लिए आर्मी ने मूल्यांकन के जो पैमाने तय किए हैं, वो मनमाने हैं और भेदभाव से भरे हुए हैं. कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा? महिला अधिकारियों से जुड़ा परमानेंट कमीशन का पूरा मामला क्या है? आर्म्ड फोर्सेज में महिलाओं के साथ किस तरह का भेदभाव होता है? सरकारों और आर्मी के बड़े पुरुष अधिकारियों ने महिला ऑफिसर्स को समान अधिकार देने का विरोध क्यों किया? इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं.

क्या है पूरा मामला?

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में कुछ महिला आर्मी ऑफिसर्स ने याचिकाएं डाली थीं. इन याचिकाओं में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऑर्डर के बाद भी, उन्हें आर्मी में परमानेंट कमीशन नहीं मिल रहा है. परमानेंट कमीशन देने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वो मनमानी और पक्षपाती है. इससे पहले हम आगे बढ़ें, आपको परमानेंट कमीशन के बारे में बता देते हैं. खासकर महिला ऑफिसर्स के संबंध में.

दरअसल, सैन्य सेवाओं में महिलाओं की नियुक्ति शॉर्ट सर्विस कमीशन के आधार पर होती है. इसके तहत 14 साल की सर्विस के बाद उन्हें रिटायर होना पड़ता है. यही नहीं शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत नियुक्त हुई फीमेल ऑफिसर्स को जंग के मैदान के अलावा केवल आर्मी की सपोर्टिंग टुकड़ियों में तैनात किया जाता है. शॉर्ट कमीशन में ये महिलाएं ऊंची रैंक पर भी नहीं पहुंच पातीं, जिन्हें कमांड पोस्ट कहा जाता है. वहीं परमानेंट कमीशन में 14 साल की ऐसी कोई लिमिट नहीं होती. महिला ऑफिसर्स रिटायरमेंट की उम्र तक अपनी सेवाएं दे सकती हैं. परमानेंट कमीशन मिल जाने पर ऊंची रैंक के साथ उन्हें दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं. मसलन, रिटायरमेंट के पेंशन.

पिछले साल 17 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि आर्मी की हर स्ट्रीम में तैनात महिलाएं परमानेंट कमीशन के लिए योग्य होंगी. कोर्ट ने इसके लिए आर्मी को एक बोर्ड बनाने का आदेश भी दिया था. इस बोर्ड को परमानेंट कमीशन के लिए महिला ऑफिसर्स का मूल्यांकन करना था.

अब हुआ ये कि कई महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन नहीं मिला. बोर्ड ने उन्हें इस ‘काबिल’ नहीं पाया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी. कहा कि आर्मी बोर्ड उनके साथ भेदभाव कर रहा है. कई स्तरों पर. जैसे किसी 45 साल की महिला ऑफिसर की फिटनेस, 25 या 30 साल के पुरुष अधिकारी के स्टैंडर्ड पर मापी जाती है. उनका प्रेगनेंसी टेस्ट किया जाता है. उनकी अप्रेजल रिपोर्ट को सर्विस के केवल पांचवें और दसवें साल तक ही कन्सीडर किया जाता है. जबकि पुरुष अधिकारियों की आगे की भी रिपोर्ट कन्सीडर की जाती है. ऑफिसर्स ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि बोर्ड में निर्णायक पदों पर बैठे अधिकारी पुरुष ही हैं.

Supreme Court ने साल 2020 में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए महिला अधिकारियों को भारतीय सेना में परमानेंट कमीशन देने का आदेश दिया था.
Supreme Court ने साल 2020 में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए महिला अधिकारियों को भारतीय सेना में परमानेंट कमीशन देने का आदेश दिया था.

न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक आर्मी की 11 महिला अधिकारियों ने इस साल 24 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनकी याचिका पर कोर्ट ने 27 जनवरी को सुनवाई शुरू की थी. सुनवाई करने वाली बेंच में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एम आर शाह शामिल थे. बेंच ने महिला अधिकारियों के आरोपों को सही पाया है और 137 पेज के जजमेंट में कुछ बेहद जरूरी बातें कही हैं. साथ ही कोर्ट ने भारतीय सेना को यह भी निर्देश दिया कि वो 650 महिला अधिकारियों की परमानेंट कमीशन देने के एप्लिकेशन पर फिर से विचार करे. यह काम अगले दो महीने के अंदर होना चाहिए.

और क्या कहा Supreme Court ने?

बेंच ने कहा कि महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने के लिए चयन का जो पैमाना है, वो उनके साथ संस्थागत भेदभाव कर रहा है… और इसमें पुरुषवादी सोच बहुत अंदर तक धंसी हुई है. बेंच ने पाया कि जहां एक तरफ महिला अधिकारियों की अप्रेजल रिपोर्ट को कंसीडर करने का तरीका पक्षपाती है, वहीं उनकी मेडिकल फिटनेस भी मनमाने तरीके से आंकी जाती है. ऐसे कि एकदम फिट विमेन ऑफिसर्स को भी इस पैमाने पर रिजेक्ट कर दिया गया. वहीं उन महिला अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन के काबिल नहीं पाया गया, जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बहादुरी का प्रदर्शन किया, जिन्होंने देश के लिए सम्मान कमाया और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के साथ हेवी कॉन्फ्लिक्ट जोन में काम किया.

बेंच ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह काफी नहीं कि सेना के लोग गर्व से कहें कि हम महिला अधिकारियों को भी भारतीय सेना में सर्विस देने का मौका दे रहे हैं, जबकि सच्चाई अलहदा है. बराबरी का भ्रम पैदा करना और असली बराबरी में बहुत अंतर है. बराबरी का भ्रम संविधान के साथ धोखा है.

कोर्ट ने कहा कि आर्मी 45 से 50 साल की महिला ऑफिसर्स को मेडिकल फिटनेस को ‘शेप वन’ कैटेगरी के तहत आंक रही है. जबकि यह कैटेगरी 25 से 30 साल के पुरुष अधिकारियों पर लागू होती है. यह कितना अन्यायपूर्ण है. कोर्ट ने कहा कि ‘शेप वन’ के तहत महिला ऑफिसर्स को इसलिए आंका जा रहा है क्योंकि सही समय पर आर्मी ने ऐसा नहीं किया, जबकि दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2010 में ही महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने का आदेश दे दिया था. सेना को तभी से यह प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए थी. यहां पर भी बेंच ने जरूरी टिप्पणी की. बेंच ने कहा कि समय पर महिला अधिकारियों की परमानेंट कमीशन पर विचार ना करके सेना ने उन्हें बड़ी मुश्किलों में डाल दिया. उन्हें मानसिक और आर्थिक नुकसान हुआ है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सेना को ‘शेप वन’ केटेगरी के तहत ही महिलाओं को आंकना है, तो यह आंकलन रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू होना चाहिए. यानी जब ये महिला अधिकारी 25 से 30 साल की थीं, उस टाइम की रिपोर्ट के मुताबिक उनका आंकलन होना चाहिए.

महिला ऑफिसर्स की याचिकाओं में इस बात का भी जिक्र किया गया कि बिना परमानेंट कमीशन के रिटायर होने पर उन्हें पेंशन भी नहीं मिलेगी और 40 से 45 साल की उम्र में उनके पास किसी दूसरी सरकारी नौकरी का भी ऑप्शन भी नहीं होगा. प्राइवेट सेक्टर में भी करियर के चांस बहुत कम होंगे.

आर्मी के बोर्ड ने 40 से 45 साल की महिला अधिकारियों की फिटनेस की तुलना 25 से 30 साल के पुरुष अधिकारियों से की.
आर्मी के बोर्ड ने 40 से 45 साल की महिला अधिकारियों की फिटनेस की तुलना 25 से 30 साल के पुरुष अधिकारियों से की.

बेंच ने यह भी ऑब्जर्व किया कि महिला अधिकारियों के परमानेंट कमीशन को लेकर इंडियन आर्मी की 1991 की मेरिट पॉलिसी का भी उल्लंघन किया गया. इस पॉलिसी के तहत मेरिट लिस्ट तभी बनती है, जब परमानेंट कमीशन के लिए 250 से अधिक कैंडिडेट हों.

परमानेंट कमीशन की डिबेट क्या है?

इन सब टिप्पणियों के बाद बेंच ने कुछ निर्देश दिए. मसलन, अप्रेजल रिपोर्ट में 60 फीसदी कट-ऑफ वाली महिला अधिकारी परमानेंट कमीशन के लिए योग्य होंगी. वहीं मेडिकल क्राइटेरिया को महिला अधिकारियों के सर्विस के पांचवे और दसवें साल के आधार पर अप्लाई किया जाएगा. अगले दो महीनों के अंदर सभी महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन के लिए कंसीडर किया जाएगा.

अब बात परमानेंट कमीशन के पूरे संघर्ष की कर लेते हैं. फीमेल ऑफिसर्स ने बहुत पहले ही परमानेंट कमीशन के लिए याचिका डाली थी. साल 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने आर्मी, एयर फोर्स और नेवी की महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने का आदेश दिया था. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. और यह सरकार 6 जुलाई 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई. वो अलग बात है कि जब बीजेपी सरकार ने परमानेंट कमीशन देने का विरोध किया, तो कांग्रेस ने सरकार को पिछड़ी हुई सोच का बताया. यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि 2 सितंबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था वो दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ नहीं है. लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार फिर भी अड़ी रही और परमानेंट कमीशन देने को लेकर प्रक्रिया शुरू नहीं की. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2020 के अपने फैसले में कांग्रेस सरकार के इस लचर रवैये की आलोचना की.

वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार ने कहा कि महिला अधिकारियों को इसलिए परमानेंट कमीशन नहीं दिया जा सकता क्योंकि आमतौर पर उनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां होती हैं और प्रेंगनेंसी की स्थिति में उन्हें लंबी छुट्टी देनी पड़ेगी. साथ ही सेना में काम करने वाले पुरुष सैनिक ऐसे परिवेश से आते हैं, जहां उन्हें महिलाओं से ऑर्डर लेने की आदत नहीं होती. वहीं अगर जंग के दौरान किसी महिला ऑफिसर को  बंदी बना लिया जाए तो ये सेना और सरकार के लिए बड़ी ऊहापोह की स्थिति होगी.

दूसरी तरफ से केंद्र सरकार की इन दलीलों का जवाब दिया गया. कहा गया कि कई महिला अधिकारियों ने सर्वोच्च बहादुरी का परिचय दिया है. कई महिला अधिकारियों को इसके लिए मेडल भी मिले हैं. तब सरकार ने कहा कि वो महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने के लिए तैयार है. लेकिन यह रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू नहीं होगा. मतलब अभी जो महिलाएं 14 साल की ड्यूटी पूरी कर चुकी हैं, उनके ऊपर ये लागू नहीं होगा. हालांकि, उन्हें पेंशन वगैरह के बेनिफिट मिलेंगे.

आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार की दलीलें संविधान के बराबरी के अधिकार का उल्लंघन करती हैं. कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों की योग्यता पर सवाल उठाना ना केवल उनका अप

Justice Dy Chandrachud
Justice Dy Chandrachud ने कहा कि समाज पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए बनाया गया है.

मान है बल्कि सेना का भी. इसके साथ ही कोर्ट ने महिला अधिकारियों को रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से परमानेंट कमीशन देने का आदेश दिया. साथ ही उन्हें कमांड पोस्ट पर भी नियुक्त करने के लिए कहा.

अब बात कुछ आंकड़ों की कर लेते हैं. महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन देने के मामले में आंकड़े अच्छे नहीं हैं. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि केवल 22 प्रतिशत महिला अधिकारियों को ही परमानेंट कमीशन मिलने की संभावना होती है, जबकि पुरुषों के लिए यह 97 फीसदी तक है. साल 2020 में आर्मी के बोर्ड ने कुल 615 महिला अधिकारियों में से 422 अधिकारियों के एप्लिकेशन एक्सेप्ट किए. उसमें भी फिर कांट छांट हुई.

 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कुल 106 महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन के लिए योग्य नहीं पाया गया. 42 अधिकारियों की एप्लिकेशन मेडिकल कारणों की वजह से रिजेक्ट कर दी गई. वहीं 40 अधिकारियों की एप्लिकेशन एडमिनिस्ट्रेटिव आधार पर रिजेक्ट हो गई. 57 महिलाओं ने कुछ कारणों की वजह से परमानेंट कमीशन नहीं लिया. ये कारण साफ नहीं हैं. इन महिलाओं को परमानेंट कमीशन के लिए फिट पाया गया था.

और अंत में सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की टिप्पणी. उन्होंने कहा-

“हमें यह मानना ही पड़ेगा कि यह समाज पुरुषों द्वारा… पुरुषों के लिए बनाया गया है. कुछ ऐसे स्ट्रक्चर मौजूद हैं, जो भले नुकसानदेह ना लगें लेकिन महिलाओं के लिए वो बहुत नुकसानदेह हैं. ये स्ट्रक्चर चुपचाप से पैट्रियार्की को मजबूत करते रहते हैं. अगर इनमें बदलाव नहीं होता है तो महिलाओं को कभी भी समान अवसर नहीं मिल पाएगा.”

वीडियो- बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘पेनिट्रेशन’ को परिभाषित करने वाला फैसला सुनाया!

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

क्राइम

'लव जिहाद' के आरोपों के बीच निकिता तोमर के हत्यारों को हुई सजा

निकिता को गोली मारने वाले तौसीफ का कांग्रेस कनेक्शन क्या है?

UP में सरकारी टीचर ने आत्महत्या की, सुसाइड नोट देखकर लोगों की रूह कांप गई

पढ़ने-पढ़ाने वाले, पेशे से टीचर पड़ोसियों पर गंभीर आरोप लगे हैं.

औरत ने अपने पिता को खूब दारू पिलाई, फिर जलाकर क्यों मार डाला?

आरोपी बेटी तक कैसे पहुंची कोलकाता पुलिस?

यौन शोषण करता था पुलिस वाला, लड़की ने आवाज़ उठाई तो घिनापे की हद ही पार कर दी

एक लड़की का पूरा परिवार बर्बादी की कगार पर आ गया.

आठ साल की बच्ची ने अपने रेपिस्ट को ऐसे पकड़वाया, आप भी बहादुरी की दाद देंगे

घटना के बाद शहर से भागने वाला था आरोपी, लॉकडाउन ने रोक दिया.

दूसरे आदमी से संबंध होने का शक में पति ने तांबे के तार से पत्नी का प्राइवेट पार्ट सिल दिया!

मामला यूपी के रामपुर का है.

महिला ने कहा- रेप का प्रयास किया, इसलिए प्राइवेट पार्ट काट दिया

आरोपी ने कुछ और ही कहानी बताई.

मुस्लिम बच्चे से मिलने पहुंची कांग्रेस नेता को मिया खलीफा की मुंहबोली बहन बता दी धमकी

गाजियाबाद पुलिस ने केस दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू की.

रेप के 17 साल बाद महिला ने फेसबुक से आरोपी को पहचाना, केस दर्ज

मामला मध्य प्रदेश के इंदौर का है.

वॉट्सऐप का खतरनाक स्कैम: वीडियो कॉल कर लड़की उतारने लगती है कपड़े, बचना मुश्किल

इस स्कैम की सच्चाई जान माथा पीट लेंगे.